तब्लीगी जमात के लोग गांवों में भी फैलाते हैं कट्टरता
   दिनांक 04-अप्रैल-2020
ले. कर्नल (सेनि.) आदित्य प्रताप सिंह
गांवों में बनती हाहाकारी मस्जिदें, मरकज और मदरसे। मुसलमानों के छोटे होते पैजामें, लंबी होती दाढ़ी और काले लबादे से ढकी महिलाएं। छोटे-छोटे गांव-कस्बों में यह नजारा आज आम सा दिखाई पड़ता है। दरअसल इसके पीछे तब्लीगी जमात के मुल्ला-मौलवी ही हैं जो एक साजिश के तहत आम मुसलमानों के मन में कटृटरता का विष भरने में लगे हुए हैं

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भारत के ग्रामीण क्षेत्र जहां सामान्यतः मुस्लिम जनसंख्या विरली थी वहां रहने वाला मुस्लिम समुदाय विभाजन के बाद विशेषकर भारतीय परंपराओं और सांस्कृतिक चाल-चलन को धीरे-धीरे अपनी सुविधानुसार अपनाने लगा था। कारण, उसकी सुविधा और समाज में घुल-मिलकर रहने की चाह। वह एक बृहद समन्वयवादी हिन्दू समाज का ही अभिन्न अंग बनकर रहना चाहता था। मुस्लिम समुदाय की अनेक जातियों में हिन्दू सामाजिक परम्पराओं का चलन शायद तब से चला आ रहा था जब उनके पूर्वज हिन्दू थे। यह सत्य कभी झुठलाया नहीं जा सकता कि भारत के सभी मुसलमान कभी हिन्दू ही थे। जैसा कि मेवाती मुसलमान आज भी बताते हैं कि वह कभी राजपूत थे। उनकी घर वापसी को रोकने के लिए ही तब्लीगी जमात का संस्थापक इलियास कनधालवी इस क्षेत्र में इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए आया था। राजनीतिक इस्लाम के मुल्लों को सदैव ही सनातन धर्म की व्यापकता और स्वीकार्यता से खतरा था कि कहीं भारतीय मुसलमान हिंदुओं के प्रभाव में आकर पुनः घर वापसी न कर लें और इसके लिए वह समय-समय पर अनेक इस्लामिक संगठनों की मदद से मुस्लिम समाज में इस्लामिक कट्टरता का प्रसार करते रहे। कहीं न कहीं मुल्लों की जमात को इस्लाम की मजहबी तालीम पर संदेह था कि वह उनके अनुयायियों को हिन्दुत्व के सम्मुख बहुत लंबे समय तक बांध कर नहीं रख पाएगी। हिन्दुत्व से इसी खतरे को भांपते हुये इलियासी ने हरियाणा के मेवात में तब्लीगी जमात के पित्र संगठन “तहरीक-ए-ईमान” की स्थापना की।
तब्लीगी जमात देवबंदी इस्लाम का प्रचारक है। देवबंदी इस्लाम कट्टर वहाबी इस्लाम का ही दक्षिण एशियाई स्वरूप है। इस्लामिक आतंकी संगठन तालीबान इसी देवबंदी इस्लामिक विचारधारा से जन्मा है। इससे आप आसानी से तब्लीगी जमात की गतिविधियों का अनुमान लगा सकते हैं। भारत में एक वह भी समय था जब मुस्लिम फिल्मी सितारे अपने हिन्दी नाम रखते थे और फिर कैसे वह समय आया जब मुस्लिम सितारे किंग खान और बादशाह खान हो गए ? कैसे आया यह बदलाव मात्र तीन दशकों में ? कैसे गांवों में मुसलमानों के पैजामे छोटे होते गए और दाढ़ी लंबी ? महिलाओं में बुर्के का चलन कैसे आया ? कैसे छोटी मस्जिदों का स्थान हाहाकारी मस्जिदों, मरकज और मदरसों ने ले लिए। 1970 के दशक में तेल निर्यात करने वाले देशों के संगठन ने जब तेलों की कीमतों को बढ़ाया तो देखते ही देखते पश्चिम एशियाई देश मालामाल हो गए और उनकी विश्व पर अपनी प्रभुसत्ता स्थापित करने की ललक जग उठी। परंतु सामरिक और सैन्य परिस्थितियां उनके पक्ष में न थीं। इसका उपाय उनको वहाबी इस्लाम या उस जैसे कट्टर स्वरूप वाले इस्लाम के अन्य संगठनों को आर्थिक सहायता द्वारा प्रोत्साहित किया जाए। यह थी पृष्ठभूमि तब्लीगी जमात जैसे संगठनों की अचानक विश्व पटल पर विस्तार की।
पश्चिमी एशियाई इस्लामिक राष्ट्रों की आर्थिक सहायता से जो मस्जिदें और मदरसे बने वह सब तब्लीगी जमात के प्रचार-प्रसार के केंद्र बन गए। इन्ही इस्लामिक केन्द्रों से यह छोटी-छोटी टोलियां गांव-गांव घूमकर तब्लीगी नारे “ए मुसलमानों, मुसलमान बनो” को बुलंद करने लगे। वह घर-घर जाकर गांवो के निर्धन और पिछड़े मुसलमानों के कानो में इस्लामिक कट्टरता का मंत्र फूंकने लगे। खाने और कपड़ों के लालच में उनके बच्चे तब्लीगी मदरसों में बर्बर राजनीतिक इस्लाम की बर्बरता को आत्मसात करने लगे और फिर इस्लाम के ये नए जिहादी इसी सिलसिले को आगे बढ़ाने में जुट गए। गांवो में फैलता तबलीगी तंत्र राष्ट्र के लिए खतरे की घंटी है। तब्लीगी जमात और इसके जैसे अन्य इस्लामिक संगठनों को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित कर बंद कर देना चाहिए।