भारतीय जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष की 87 वर्षीय बहू ने हज के पैसे कोरोना से लड़ने को किए दान
   दिनांक 05-अप्रैल-2020
ये फर्क हैं संस्कारों का. देशभक्त मायका, और राष्ट्रभक्त ससुराल वाली खालिदा बेगम मिसाल बन सकती हैं उस फसादी भीड़ के लिए, जिसने देश की नाक में दम कर रखा है. सच्ची आध्यात्मिकता मज़हबी संकीर्णताओं से परे होती है, ये सिखा रही हैं एक बुजुर्ग मां

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संस्कारों का फर्क है. तबलीगियों की हरकतें सारी दुनिया स्क्रीन पर देख रही है. जुमे की नमाज़ के नाम पर लॉकडाउन के उल्लंघन और पुलिस पर पथराव की घटनाएं भी सामने आ रही हैं. उधर जम्मू की 87 वर्षीय खालिदा बेगम ने हज पर जाने के लिए रखे 5 लाख रुपए कोरोना की रोकथाम के लिए सेवा भारती को दान कर दिए. देशभर में सेवाभारती के लाखों कार्यकर्ता कोरोना की रोकथाम और लॉकडाउन से प्रभावित ओगों तक राहत पहुँचाने के लिए रात-दिन कार्य कर रहे हैं. खालिदा बेगम के बेटे हैं, पूर्व आईपीएस फारुक खान, जो वर्तमान में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल जीसी मुर्मू के सलाहकार हैं. खालिदा बेगम बहू हैं,जम्मू-कश्मीर के जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष कर्नल पीर मोहम्मद की. उनका मायका एक सैनिक परिवार है. उनके पिता कर्नल अब्दुल रहीम खान जम्मू-कश्मीर महाराज की सेना में अधिकारी रहे हैं.
व्यक्ति अपने परिवार में, अपने आस-पास जो देखता-अनुभव करता बड़ा होता है, उसके मानस पर वैसा प्रभाव पड़ता है. जैसे किस्से कहानियां और उदाहरण वो अपने बुजुर्गों से सुनता है, वैसा उसका मन बनता है. खालिदा बेगम अपने पिता और ससुर को उन्होंने देश की सेवा करते देखा. बेहद कठिन दौर में चुनौतियों का सामना करते देखा.
जम्मू कश्मीर राज्य आज़ादी के पहले से ही षड्यंत्रों का शिकार हो गया था. नेहरु की कृपा पाकर शेख अब्दुल्ला ने राज्य का सुलतान बनने के ख्वाब पाल लिए थे, और मज़हबी उन्माद को हवा देना शुरू कर दिया था. जब पाकिस्तान बनना तय हो गया तब शेख ने जिन्ना और नेहरु दोनों पर डोरे डालने शुरू कर दिए. नेहरु शेख के मोह में जकड़े हुए थे. महाराजा कश्मीर हरिसिंह से उन्हें व्यक्तिगत चिढ़ थी. इसलिए जब जिन्ना ने कश्मीर पर कबायली आक्रमण करवा दिया तब भी नेहरू सेना भेजने में आनाकानी करते रहे. विलय के बाद भी सेना तब तक नहीं भेजी गई जब तक महाराजा कश्मीर वहाँ से बाहर नहीं निकल आए. भारत की सेना के पहुंचने तक उनकी सेना ने पाकिस्तान से लोहा लिया. महाराज हरिसिंह की सेना की अनेक मुस्लिम अधिकारी आक्रमणकारी पाकिस्तानियों से जा मिले थे. तब महाराज के स्वामिभक्त सैन्य अधिकारियों ने कश्मीर की रक्षा के लिए प्राणपण से युद्ध किया था.
बाद में शेख के कहने पर नेहरु ने संविधान में विभाजक धारा 370 को जोड़ा. भारतीय जनसंघ ने शुरू से ही इसका विरोध किया था. जनसंघ का नारा था- देश में दो विधान, दो प्रधान, दो निशान – नहीं चलेंगे. जनसंघ ज़ोर देकर ये सच कहता था कि जम्मू कश्मीर भारत का अविभाज्य अंग है, और विभाजनकारी धारा 370 को तत्काल समाप्त किया जाना चाहिए. स्वाभाविक रूप से ये बात नेहरू को पसंद नहीं थी, और राज्य की सत्ता में बैठे शेख अब्दुल्ला को तो जनसंघ के लोग कांटे की तरह खटकते थे. इसी का परिणाम हुआ कि जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष डॉ श्यामाप्रसाद मुखर्जी को कश्मीर की रक्षा और देश की अखंडता के लिए अपना बलिदान देना पड़ा. उस काल –परिस्थित में जनसंघ के कार्यकर्ताओं का जीवन कितना चुनौती भरा रहा होगा इसका आज अंदाज़ लगाना कठिन है. एक तरफ दिल्ली में बैठे सत्ताधीश नाराज़, दूसरी तरफ राज्य का मुख्यमंत्री और उसके पीछे की उन्मादी भीड़ जानी दुश्मन. घाटी में बैठे पाकिस्तान के एजेंट घात करने की फिराक में, और देश में आम आदमी की इन सब बातों से अनभिज्ञता. फिर उन दिनों जनसंघ कोई बड़ी राजनैतिक शक्ति भी नहीं था. सारे देश में कांग्रेस पार्टी और नेहरु परिवार की तूती बोलती थी. मीडिया बहुत सीमित था, और जितना भी मीडिया था वो समाजवाद के उस दौर में सरकारी विज्ञापनों की खुराक के बिना ज़िंदा नहीं रह सकता था. ऐसे में जम्मू कश्मीर में रहकर जनसंघ के अध्यक्ष के रूप में काम करना और “काफिर” कहलाना, कर्नल पीर मोहम्मद के लिए आसान नहीं रहा होगा. ये सब देखकर जीवन के वसंत को पार करने वाली खालिदा बेगम ने अपने कुल का नाम रोशन किया है और प्रेरणा बनी हैं करोड़ों भारतीयों के लिए.
सड़क, बाजार , अस्पताल में जगह-जगह अपना थूक मल रहे, नर्सों और महिला चिकित्सकों के सामने नंगे घूम रहे, उनको अश्लील इशारे कर रहे, जाहिलों के सामने बुजुर्ग खालिदा बेगम का धवल उदाहरण सामने रखने की ज़रूरत है. खालिदा बेगम सबक हैं शाहीनबाग़ की उन “दादियों-नानियों” के लिए, जो पाकिस्तानी पिट्ठुओं के इशारे पर अपने देश में बवाल काट रही थीं. वो “शेरनियां” जो आज कोरोना की पालक बनकर गर्व महसूस कर रही हैं. खुद गलती करके पुलिस की कॉलर पकड़ने वाली, बच्चों को लॉकडाउन का पालन करवाने की जगह उन्हें रोकने वाली पुलिस पर पत्थर बरसाने वाली और “कोरोना कुरआन से निकला है” जैसी मूर्खता को सरेआम बांचने वाली महिलाओं के सामने श्रद्धेय खालिदा बेगम का उदाहरण रखा जाना आवश्यक है.