कोरोना के खिलाफ यदि दुनिया में कोई कायदे से लड़ रहा है तो वह भारत है

    दिनांक 05-अप्रैल-2020   
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जब आपत्तिकाल आता है तो परिवार, समाज, देश, सबकी परीक्षा हो जाती है। ऐसे में जो ऊपर से कुछ होते हैं और भीतर से कुछ और, छिटक जाते हैं, टूट जाते हैं। जहां संस्कार, मजबूती और समझ होती है, वे और मजबूत हो जाते हैं और फिर तभी विपत्ति से निकलने का रास्ता भी दिखता है 

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कोरोना जैसे महामारी के बीच सेवा कार्य करते स्वयंसेवक
चीनी वायरस आपदा ने भी बता दिया है कि किसी व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का चरित्र क्या हो सकता है। अभी यह त्रासदी का समय है, गुजर जाएगा। समय के गुजरने के बाद जो निशान रह जाएंगे, वे बताएंगे कि इस समय से कौन कैसे निपटा। तब शायद यह भ्रम टूट जाएगा कि दुनिया में सबसे शक्तिशाली देश कौन है। आज यह संक्रमण फैलाने के संदेह में जिधर उंगलियां उठ रही हैं, वो इसमें कितना सफल, कितना असफल रहा, इसका आकलन भी सामने आ जाएगा। किन्तु विश्व व्यवस्था में इस सब से जो भी उथल-पुथल हो, उसके अलावा हमारे लिए देखने की बात यह होगी कि भारत ने समाधान की खोज में विकल्पों को कैसे मथा और इस मंथन से अंततः क्या निकला!
इस समय हमने दुनिया में अगर किसी को कायदे से लड़ते हुए देखा है तो वो भारत ही है। भारत के ऐसा कर पाने के अंतर्निहित कारण हैं। बाकी जगह पर जो ओढ़ा हुआ समाजवाद या फिर पूंजी, पूंजी और सिर्फ लाभ केंद्रित स्वार्थ-निर्देशित व्यवस्थाएं है, वहां उनका टूटना-चटखना तय था क्योंकि ऊपरी चमक-दमक कुछ भी हो, वे स्व-केंद्रित थीं इसलिए परस्पर सहयोग के भाव का अभाव था। पश्चिम में आफत के समय लोग सरकार की तरफ ताकते रहे और सरकार सीमित संसाधनों का रोना रोती रही तो चीन जैसे देशों में सूचनाओं और मानवाधिकार बेरहमी से कुचले जाते रहे। चाहे मृतकों की संख्या के आंकड़े की बात हो, चाहे अपर्याप्त वेंटिलेटर की बात हो या अस्पतालों की सब जगह यही देख रहा था। मगर भारत में सरकार सक्रियता और समाज की संवेदनशीलता के अलग ही आयाम दिखे। समाज सरकार के साथ अपनी भूमिका के निर्वहन में जुट गया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सेवा भारती और ऐसे अनन्य छोटे-बड़े संगठनों ने बताया कि मुसीबत के समय समाज का चरित्र क्या होता है। विपत्ति काल में एक आह्वान पर वह उत्साह, एकजुटता दिखाने के लिए निकलता है। थाली बजाने के लिए भी निकलता है और अंधेरा खत्म करने को रोशनी करने के लिए भी। यही रोशनी पूरे देश की एकता की प्रतीक है। सरकार के साथ समाज का यह सहभाग दुनिया में हर जगह नहीं दिखता। परंतु यहां चिंता की भी कुछ बातें दिखीं। जहां रोशनी होती है, वहां निसंदेह कुछ अंधेरा भी होता ही है। सो, यहां आफत सिर्फ जैविक वायरस की त्रासदी नहीं थी। कुछ व्यवस्था के छेदों से पैदा हुए वायरस, कुछ समाज में सड़न पैदा कर रहे वायरस भी उभरकर सामने आए। एक राज्य सरकार लाखों-लाख लोगों को बेहद असुरक्षित तरीके से आनंद विहार बस अड्डे पर जमा कर देती है। एक सरकार जिसने कहा था कि जो प्रवासी मजदूर दिल्ली में ही रुकेंगे उन्हें 5-5 हजार रुपये दिए जाएंगे। फिर लोग रुके क्यों नहीं? इसलिए कि सरकार पल्ला झाड़ने को तैयार थी जिसे लोग अच्छी तरह समझ रहे थे और इसके साथ ही उन्हें डराने राज्य से भगाने के लिए तरह-तरह की फोन कॉल जा रही थी, तरह-तरह की मुनादी हो रही थी। ऐसा आचरण रहा सरकार का। उधर, व्यवस्था में अनास्था और समाज में अराजकता को हितसिद्धि का साधन बनाने वाले ट्विटर-बहादुर नामी–गिरामी सितारों ने आग में पेट्रोल डालने की अपनी भूमिका संभाली। इससे दिक्कतें बढ़ीं। समाज ने तो समझा कि प्रवासी मजदूर पूरे समाज की जिम्मेदारी हैं, मगर क्या पलायन को रोकना राज्य सरकारों की भी जिम्मेदारी नहीं थी? फिर कुछ राज्य इस जिम्मेदारी से कैसे भाग सकते हैं ? कैसे विज्ञापन और प्रचार पर टिकी सरकार झूठी खबरों का सहारा लेती है कि वह रोज लाखों लोगों के लिए भोजन बनवा रही है परंतु इन खबरों के प्रमाण में एक फोटो या वीडियो तक सरकार या मीडिया के पास नहीं होता?
सरकार के झूठ की कलाई तो चंद घंटों के भीतर खुल ही गई इसके साथ यह बात भी सामने आई कि भारत कट्टरवाद का नया गढ़ बन रहा है। विपदा के समय ही हमने अफगानिस्तान में सिखों का कत्लेआम देखा। वहां जो कातिल था, वो केरल का था। फिर जेहाद का चेहरा दिखा। दिखा कि ऐसे असंवेदनशील लोग आखिर तैयार कहां होते हैं। निजामुद्दीन मरकज का घटनाक्रम केवल उपद्रव का उजागर होना नहीं था, इसने एक अंतर भी बताया। लगभग एक ही समय पैदा हुए दो संगठनों में से कौन समाज को जोड़ने वाला होगा और कौन तोड़ने वाला, यह इस बात से तय हो जाता है किसकी लाइन क्या है। यही सबसे बड़ा फर्क होता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा बेंगलुरू में 16-17 मार्च को होनी थी। उसमें करीब उतने ही लोग इकट्ठो होने थे, जितने मरकज में हुए। मगर संघ ने समाजहित में निर्णय लिया, लोगों को आने से रोक दिया। उसकी सोच संगठन और इसके फैलाव की संकीर्णता में नहीं उलझी। दूसरी ओर तब्लीगी जमात की निजामुद्दीन की मरकज के पीछे दूरदृष्टि नहीं थी, समाज की चिंता नहीं थी, संविधान-सम्मत जवाबदेही का भान भी नहीं था। विज्ञान के लिए तिरस्कार था। उस सोच ने चीनी वायरस को बढ़ाया और पूरे समाज को खतरे में डाला। इस घटना ने पुनःस्थापित किया कि आत्मघाती बम केवल आतंकवादी ट्रेनिंग कैंप में नहीं बल्कि ज्ञान-विज्ञान और संविधान की उपेक्षा करके समाज के भीतर भी बनाए जा सकते हैं।
भारत के लिए उम्मीद की बात है कि यहां सरकार सक्रिय है, समाज संवेदनशील है और दोनों परस्पर सहयोग के लिए कदमताल कर रहे हैं। मगर संक्रमण की स्थिति में ये उपद्रवी तत्व संक्रमण कितना बढाते हैं, अभी नहीं कह सकते। दिल्ली में मजदूरों को पलायन के लिए उकसाने वाले, बीमारियों के फैलाव को बढ़ाने वाले ये लोग कितनी दिक्कत बढ़ाते हैं, यह आने वाला वक्त बताएगा। समाज के शरीर को कमजोर करने वाले इस वायरस का तो इलाज होगा ही, आत्मा को बीमार करने वाले वायरस का इलाज भी जल्द ही करना होगा तभी राष्ट्र स्वस्थ हो सकेगा।