संघ और तब्लीगी जमात: संकट से साफ हुआ नेतृत्व का अंतर
   दिनांक 05-अप्रैल-2020
कोरोना का संकट पहले से ही पहचानते हुए रा.स्व. संघ के नेतृत्व ने न सिर्फ अपनी वार्षिक प्रतिनिधि सभा रद्द की अपितु समाज जागरण का काम शुरू कर दिया। दूसरी तरफ कट्टर सोच फैलाने वाली तब्लीगी जमात ने निजामुद्दीन में मरकज में हजारों लोगों को इकट्ठा किया जिन्होंने पूरे देश में कोरोना का संक्रमण फैलाया

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दिल्ली की निजामुद्दीन दरगाह से सटे तब्लीगी जमात के मरकज में जो प्रकरण घटा है वह अत्यंत निंदनीय है। पूरे देश में ऐसा लग रहा था कि अब हम वैश्विक महामारी कोरोना की शृंखला को तोड़ने में कामयाब हो रहे हैं और संक्रमण की संख्या लगातार घटने लगी थी, जनता में एक विश्वास भी जगने लगा था। परंतु अचानक जमात के मरकज की दुर्घटना सामने आयी।
प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी ने हाथ जोड़कर अपने दिल की बात कही थी कि इंसानियत के लिए आप अपने घरों में रहें। इस अपील के पहले ही फरवरी के अंत में कोरोना की खतरे की घंटी सुनाई पड़ने लगी थी। इसलिए जो मार्च के पहले हफ्ते में आयोजन होने वाले थे या हो रहे थे और लोग इकट्ठे होने लगे थे, इस पर उन लोगों ने विचार किया और वे रोक दिए गए। इसके दो उदाहरण बिल्कुल स्पष्ट हैं। बेंगलूरू में 15 मार्च से राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ की वार्षिक प्रतिनिधि सभा होने वाली थी। इसमें विभिन्न स्तरों पर बैठकें होती हैं जिसमें कुल मिलाकर लगभग 3000 कार्यकर्ता आते हैं। इस सभा में नेतृत्व पहले जाता है और फिर एक एक करके प्रत्येक श्रेणी के कार्यकर्ता एकत्रित होते हैं। नेतृत्व करने वाले कुछ लोग तो एक दिन पहले वहां पहुंच गए थे। फिर उसी दिन पता चला कि प्रतिनिधि सभा स्थगित कर दी गयी है। मीडिया में भी इसकी खबर आने लगी। जो लोग रास्ते में थे या जो वहां पहुंच गए थे, वे लौटने लगे। दूसरी तरफ मरकज की घटना सामने आई। इसको नासमझी की घटना कहें या क्या कहें? निजामुद्दीन मरकज में करीब 3000 लोग इकट्ठे हुए। मालूम यह भी पड़ा है कि 27 फरवरी से 1 मार्च 2020 तक मलेशिया में भी इसी तरह का जलसा हुआ था, वहां से करीब 600 लोग कोरोना के संक्रमण को लेकर यहां आए थे। उसी तरह पाकिस्तान में लाहौर के पास लगभग तब्लीगी जमात के 6 हजार लोग इकट्ठे हुए। पाकिस्तान में कोरोना फैलने के पीछे यही लोग हैं।
भारत में भी अचानक संक्रमण की संख्या बढ़ी है तो उसका दोष इन्हीं जमात के लोगों का है। एक तरफ सरकार की ओर से सभी देशवासियों को सावधान करने का, उनके विवेक को जाग्रत करने का प्रयास हो रहा था। जो मानवता को धर्म का पर्याय मानते हैं और उसी आधार पर जीवन जीने का प्रयास करते हैं वे इसके प्रति सजग भी हो गए, जैसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ। आश्चर्य इस बात का है कि तब्लीगी जमात के लोग सजग नहीं हुए।
मेवात के एक मुसलमान मौलाना मोहम्मद इलियास ने 1926 में हज से लौटने के बाद 1927 में तब्लीगी जमात की शुरुआत की थी। निजामुद्दीन दरगाह के पास इस जमात का अंतरराष्ट्रीय मुख्यालय है, जहां ये दुर्घटना हुई है। यह दुर्घटना हुई है आजकल के वातावरण से कटे रहने के कारण। हजरत मोहम्मद की सीख को इन लोगों ने मानने से इनकार कर दिया। अरुण खोले की पुस्तक ‘धर्मों की कतार में इस्लाम’ में लिखा है कि ‘हजरत मोहम्मद को गुजरे हुए लगभग 1400 वर्ष हो गए। उस वक्त जहां तक जमाना पहुंचा था उसके बारे में मोहम्मद नहीं जान पाये थे इसलिए उन्होंने बड़ी ईमानदारी से कहा था-कोई भी जमात न अपने वक्त से आगे जा सकती है और न पीछे आ सकती है। इस तरह की बात उन्होंने दो मौकों पर कही थी और दो बार दुआ मांगी थी कि मेरे परवरदिगार मुझे और इल्म मिले।’ मेरा कहना यह है कि अगर सचमुच इस तब्लीगी जमात के इस्लामवादी हजरत मोहम्मद पर विश्वास करते तो उन्होंने जो कहा था कि ‘मुझे और इल्म दे’ यानी मुझे और बुद्धि दे, तो फिर ये लोग प्रधानमंत्री की अपील पर ध्यान देते और तत्काल जैसे रा.स्व.संघ के नेतृत्व ने अपनी सभा स्थगित की थी और लोगों को समझाया था कि मानवता की सुरक्षा के लिए यह हमारी पहली प्राथमिकता है, उसी तरह अपना कार्यक्रम रद्द कर देते। लेकिन इसके ठीक उलट जमात में मौलवी ने जो व्याख्यान दिया वह बहुत ही खतरनाक है। उसने कहा कि ‘मस्जिद में कोरोना हो जाएगा, यह विचार मुसलमानों को मस्जिदों में जाने से रोकने के लिए है। अगर हम यहां मर भी गये तो इससे बेहतर निजात कहां मिलेगी।’ उस मौलवी साद ने तकरीर की कि ‘इस तरह से मस्जिद में इकट्ठा होना हमारा फर्ज है।’ इस तरह का बयान ही प्रमाण है कि वे न तो हजरत मोहम्मद को जानते हैं, न ही इस्लाम को जानते हैं। तब्लीगी जमात और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की तुलना तो नहीं की जा सकती, परंतु जैसे, उदाहरण के लिए रा.स्व.संघ ने अपनी प्रतिनिधि सभा को स्थगित कर संवैधानिक मर्यादा का पालन किया तो दूसरी तरफ तब्लीगी जमात ने कट्टरपन और नासमझी का परिचय दिया है।
जो मरकज के लोग वहां से निकले हैं, उन्हें चिकित्सा के लिए ले जाया गया, वहां इन लोगों चिकित्सकों पर पत्थर फेंके और उनसे अभद्र व्यवहार किया है। मुझे लगता है यह वही सोच है जो उनके दिमाग में बैठायी गयी है। मौलाना साद ने जो व्याख्यान दिया, उसमें कहा था कि ‘डाक्टर से बड़ा है अल्लाह।’ इस तरह के दूषित मन का ही नतीजा है जो सामने दिख रहा है। उनका मन निर्मल होना चाहिए। वहां से संक्रमित लोगों को निकालकर एकांतवास में भेजकर चिकित्सा करवानी चाहिए थी, जिससे और लोग संक्रमित न हों। इसके बजाय इन लोगों ने विभिन्न जगहों पर संक्रमण फैलाने का कार्य किया है। इनकी प्रवृत्ति को समझना जरूरी है।
1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हुई थी तो संघ संस्थापक डाक्टर हेडगेवार ने यह महसूस किया था कि लाल—बाल—पाल के पैदा किये राष्ट्रीयता के प्रवाह को समयानुसार पूरे भारत में फैलाना है। वह प्रवाह तब कई कारणों से क्षीण हो गया था। जब भारत आजाद हुआ तो राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने खुद को संवैधानिक राष्ट्रवाद, संवैधानिक राष्ट्रीयता में रूपांतरित किया। मुझे याद है जब 1949 में संविधान बनकर तैयार हुआ और उस समय चर्चा चल रही थी कि इस संविधान को स्वीकार करें कि न करें, तब पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने लिखा था, ‘ये संविधान जैसा बन गया है वैसा स्वीकार करो।’ पिछले महीने सरसंघचालक श्री मोहनराव भागवत ने कहा था कि संविधान स्वीकार करो। इसका मतलब यह है कि देश में जो जनतांत्रिक व्यवस्था चल रही है उसको स्वीकारें और सरकार का सहयोग करें, जो नागरिकों के हितों में कार्य कर रही है। यही हमारा कर्तव्य है, यही दृष्टि रही है और अभी भी है, जिसके कारण राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ ने कोरोना संक्रमण के खतरे को भांपते हुए संपूर्ण तालाबंदी से 10 दिन पहले ही अपने सभी कार्यकर्ताओं को सूचना दे दी कि हमको सावधान रहना चाहिए। सावधान करने का मतलब यह है कि अपने से ज्यादा समाज की चिंता करनी है। इस भयावह रोग को समझने में संघ ने एक क्षण की भी देर नहीं की। इसलिए देर नहीं कि क्योंकि संघ के नेतृत्व में समय को भांपने की क्षमता है।
दूसरी तरफ तब्लीगी जमात की घटना प्रतिक्रिया का प्रतिफल है। जब स्वामी श्रद्धानंद जी ने शुद्धि यज्ञ किया था तब उसकी प्रतिक्रिया में ये तब्लीगी जमात शुरू हुई थी, जिसमें उन्होंने जो कार्यपद्धति चुनी है उसमें खास बात यह है कि यह कोई लिखित पद्धति नहीं है, ज्यादातर मौखिक ही है। इसमें नर—नारी में बहुत असमानता है। ये लोग 5-10 लोगों की टोली बनाकर जो हजरत मोहम्मद के समय में इस्लाम था वैसा ही इस्लाम स्थापित करने के लिए काम कर रहे हैं। मेरा मानना है कि तब्लीगी जमात हजरत मोहम्मद और इस्लाम का भी अपमान कर रही है। यदि उन्हें हजरत मोहम्मद का थोड़ा भी ख्याल होता तो इस कोरोना के वक्त कट्टरपन न दिखाते। जो इस्लामी उलेमा हैं वे वक्त में आज भी वहीं ठहरे हुए हैं जबकि दुनिया के दूसरे मजहब वक्त के साथ बदले हैं, जैसे, यहूदी। यहूदी को सबसे ज्यादा परंपरावादी, कट्टरवादी माना जाता था। लेकिन यहूदियों ने भी अपने को बदला। उनका विचार इस हद तक बदला कि उनके बीच में से कार्ल मार्क्स पैदा हुए, अलबर्ट आइंस्टीन पैदा हुए। इसी तरह से तिब्बती बौद्धों ने भी अपने को बदला। उनमें दलाई लामा को ईश्वर माना जाता हैं, लेकिन वर्तमान दलाई लामा ने यहां तक कहा है कि जो बौद्ध मान्यताएं विज्ञान के तथ्यों के आधार पर भिन्न हैं, उन्हें बदलना है। यह बात उन्होंने मैसाचुसेट्स में अमेरिकन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी में कही। मेरा कहना यह है कि हिन्दू धर्म मानवता का पर्याय है। तब्लीगी जमात इस्लाम की एक शाखा है। इसको भी अपने को बदले की कोशिश करनी चाहिए।
2002 में पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने एक बयान दिया था कि तब्लीगी जमात ने जितने लोगों को मुसलमान नहीं बनाया उससे ज्यादा को काफिर करार दे दिया। यानी तब्लीगी जमात ‘काफिरों’ को मुसलमान बनाने का मिशन लेकर चलती है। मुशर्रफ जैसे आदमी ने यह कहा कि तब्लीगी जमात ने मुसलमानों से ज्यादा लोगों को ‘काफिर’ यानी इस्लाम विरोधी बनाया है। तब्लीगी जमात का दावा है कि वे ‘गैर मुसलमानों को मुसलमान से जोड़ते हैं और मुसलमानों को सच्चा मुसलमान बनाते हैं।’ निजामुद्दीन मरकज की घटना से तब्लीगी जमात का यह दावा ध्वस्त हो जाता है। सच बात तो यह है कि तब्लीगी जमात देश—दुनिया में जहां-जहां उनका काम है वहां—वहां वह लोगों को अतीत के अंधेरे में धकेलने की कोशिश कर रही है।
लेखक इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के अध्यक्ष