संकट काल में चाल, चरित्र और चेहरा दिखा रहे मोदी विरोधी
   दिनांक 06-अप्रैल-2020
 नताशा राठौर
संकट काल में ही अच्‍छे–बुरे व्‍यक्ति की पहचान होती है। मौजूदा संकट के दौर में देश भी इन्‍हीं परिस्थितियों से गुजर रहा है। इसमें एक ओर मजहबी कट्टरपंथी हैं तो दूसरी ओर तथाकथित बुद्धिजीवी, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रति नफरत की भावना से ग्रस्‍त हैं। इनका काम केवल मोदी विरोध है और कुछ नहीं

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जीन शार्प एक अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने सरकार गिराने के तरीकों के बारे में कई किताबें लिखी हैं। इसमें उन्होंने अहिंसक और लोकतांत्रिक माध्यम से सरकार गिराने और उसे झुकाने के 198 तरीके बताए हैं। वे लिखते हैं कि सरकार के विरुद्ध चलाए जाने वाले आंदोलनों में शांति और लोकतंत्र की बात तो की जानी चाहिए, लेकिन इसके जरिए सरकार को इस हद तक निष्क्रिय किया जा सकता है कि पूरी व्‍यवस्‍था ही ठप हो जाए। अंत में जब सरकार को शक्ति देने वाली व्‍यवस्‍था चरमरा जाएगी तो सरकार गिर जाएगी। मिस्र में तहरीर चौक पर हुए प्रदर्शनों में जीन शार्प द्वारा बताए गए कुछ तरीके प्रयुक्‍त हुए थे। यूक्रेन में रूस के विरुद्ध भी कुछ ऐसा ही हुआ था। इन्हीं तरीकों ने 76 दिनों में हांगकांग में सरकार की नींद उड़ा दी थी। जीन शार्प के कुछ प्रमुख तरीके हैं- पुलिस व सुरक्षा बलों पर पथराव, उनके रास्ते में बाधा पैदा करना, सड़कों जाम करना, दमकल गाड़ियां फूंकना ताकि ये दूसरी जगह मदद के लिए न पहुंचें, प्रदर्शनों में सबसे आगे महिलाओं व बच्चों को रखना, एसिड-पेट्रोल बम फेंकना, फर्जी खबरें फैलाना, नैरेटिव गढ़ने में मीडिया का इस्‍तेमाल करना, लोगों को गुमराह करना और अपने लोगों को सरकार के विरुद्ध भड़काना आदि।
हाल ही में नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध की आड़ में उत्‍तर-पूर्वी दिल्‍ली में जो दंगे हुए, उसमें ऐसे ही हथकंडे अपनाए गए थे। इन्‍हें देखकर लगता है कि सुनियोजित तरीके से सरकार को अस्थिर करने के लिए यह सब किया गया। जब आप इसकी गहराई में जाएंगे तो समझ जाएंगे कि इसके पीछे उन्हीं तथाकथित बुद्धिजीवियों, पढ़े-लिखे और 'जागरूक' लोगों का ही हाथ था। जीन शार्प ने एक सरकार को गिराने के जितने तरीके बनाए हैं, उनमें से दिल्‍ली में कम से कम 70 से 80 तरीके सीधे तौर पर इस्‍तेमाल किए गए।
प्रधानमंत्री मोदी को नीचा दिखाने के लिए जो षड्यंत्र रचा जा रहा है, वह देश के लोकतांत्रिक व पंथनिरपेक्ष ताना-बाना के लिए भी खतरनाक है। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी से कोई इतनी नफरत क्‍यों करेगा?
दरअसल, भारत दशकों से भ्रष्टाचार और वंशवाद की राजनीति के चंगुल में फंसा रहा। लंबं समय तक भारत को ऐसा नेता नहीं मिला, जिसे आमजन की भावनाओं की समझ हो और जो देश की बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्‍व करता हो। लंबे समय बाद भारत को नरेंद्र मोदी जैसा प्रधानमंत्री मिला है, जिसमें ये सभी गुण हैं। मोदी का मानना है कि भारत में किसी भी बदलाव के लिए कानून की नहीं, बल्कि आंदोलनों की जरूरत है। प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी ने देश में जो योजनाएं लागू कीं, उससे काफी कुछ बदला है। यही नहीं, जिस तरह उन्‍होंने परिस्थितियों और लोगों के साथ व्‍यवहार किया है, वह सराहनीय है। अर्थव्‍यवस्‍था को लेकर भी उन्‍होंने कठोर उपाय किए हैं। इसका असर भी आने वाले समय में अवश्‍य दिखेगा।
हाल ही में मुझे एमबीबीएस, एमडी चिकित्‍सक एवं लेखक डॉ. शरद ठाकर की एक ऑडियो क्लिप मिली। यह गुजराती में है और कोरोना संकट से पूर्व की है। इसमें वह प्रधानमंत्री मोदी से पूछते हैं, "इन दिनों क्या हो रहा है?" डॉ. शरद कहते हैं कि ऐसे में किसी की भी सामान्य-सी प्रतिक्रिया होती कि “मैं ठीक हूं।” पर मोदी ने कुछ क्षण रुक कर बड़ी गंभीरता के साथ कहा, “साधना”। तब डॉ. शरद ने पूछा, "किस तरह की साधना?" जवाब में मोदी ने कहा, "नींद पर नियंत्रण पाने के लिए साधना।" तब डॉ. शरद ने कहा, "मैंने सुना है कि आप पहले से ही बहुत कम सोते हैं। आप अपनी नींद के और कितने घंटे कम करना चाहते हैं?" मोदी ने गंभीरता से जवाब दिया, "मैं बिल्कुल नहीं सोना चाहता।” लोगों को शायद इस पर यकीन नहीं होगा। लेकिन वे कहते हैं, "मैं इसे समझता हूं, क्योंकि मैं स्वयं साधना करता हूं और साधना के माध्यम से नींद पर नियंत्रण हासिल करना संभव है। कहा जाता है कि हनुमानजी कभी सोये नहीं थे।" डॉ. शरद ने उनसे एक और सवाल पूछा, "लेकिन आप ऐसा क्यों करना चाहते हैं? किसके लिए करना चाहते हैं?" मोदी ने कहा, "इस राष्ट्र के लिए और गरीबों के लिए। यह एक महान राष्ट्र है, लेकिन हमें लूट लिया गया है और इसे ठीक करने की आवश्यकता है। इसके लिए 20 घंटे बहुत कम हैं। मुझे पूरे 24 घंटे चाहिए।" यह कहते हुए मोदी की आंखों में आंसू थे और यह सुनते हुए डॉ. शरद की आंखों में भी आंसू थे।
डॉ. शरद ने मोदी से हिमालय में उनके बिताए गए दिनों और उनके विजन के बारे में बात की। मोदी बताते हैं कि वे साधु बनने गए थे, लेकिन उन्हें देश सेवा का आदेश मिला और उन्‍हें लौटना पड़ा। डॉ. शरद ने उनसे पूछा, "बहुत सारे लोग आपके पीछे पड़े हैं। उनकी हिट लिस्‍ट में आप सबसे ऊपर हैं। क्‍या आपको डर नहीं लगता है?’’ मोदी ने कहा, "यह मेरे जीवन का उद्देश्य है कि मैं इस राष्ट्र की सेवा करूं। जब तक मेरा उद्देश्य पूरा नहीं होता है, कोई भी मुझे मार नहीं सकता। एक बार मेरा उद्देश्य पूरा हो जाए, तो कोई मुझे बचा भी नहीं सकता। मैं मृत्यु से नहीं डरता। मैं यहां अपने उद्देश्य को पूरा करने के लिए हूं।"
डॉ. शरद कहते हैं, "मैं आंख मूंद कर किसी का अनुसरण नहीं करता हूं। जब हम मटका खरीदने के लिए बाहर जाते हैं, तो हम यह ठोक कर जांचते हैं कि यह कच्चा है या पक्का। यह मटका नहीं है, ये एक व्यक्ति है। जिसे कई बार जांचा गया है, आजमाया गया है। उन्‍हें एक व्यक्ति द्वारा नहीं, बल्कि 130 करोड़ लोगों द्वारा आजमाया गया है और वे अभी भी मजबूती के साथ खड़े हैं।”
चीन के हुबेई प्रांत में लॉकडाउन के दौरान हिंसक विरोध प्रदर्शन के वीडियो और ट्वीट को चीनी सरकार द्वारा हटा दिया गया, जबकि भारत में हजारों प्रवासी कामगारों के वीडियो और भारत सरकार की आलोचना करने वाले ट्वीट्स बड़ी संख्या में आज भी इंटरनेट पर मौजूद हैं। यदि मोदी सरकार उतनी ही फासीवादी है जितना कि लोग दावा करते हैं तो उन्‍हें यह सब करने की आजादी होती? अगर उन्‍हें फासीवादी एजेंडा लागू करना होता तो इन छह वर्षों में लागू हो चुका होता। अमेरिका के एक दोस्त मुझसे कहते हैं, "नताशा मैंने देखा है कि लोग हर जगह सरकार की आलोचना करते हैं। लेकिन भारत में लोग ट्विटर पर सरकार के विरोध में जिस नीचता पर उतर आते हैं, वह कहीं नहीं दिखाई देता है।" भारत में ट्विटर पर जबरदस्त नकारात्मकता है। दुनिया में लगभग 4.5 अरब लोग इंटरनेट का इस्‍तेमाल करते हैं। यदि आप इन्‍हें गुमराह करने या नैरेटिव गढ़ने में सफल हो गए कि ‘सरकार अक्षम’ है तो समझिए आपका आधा काम हो गया।
जीन शार्प लिखते हैं कि कुछ ऐसे तंत्र हैं जो सरकार को मजबूती देते हैं। उन्‍हें कमजोर करने के लिए मीडिया की आवश्‍यकता पड़ती है। अब लोगों ने सद्गुरु जग्‍गी वासुदेव और अन्य आध्यात्मिक संगठनों को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। लेकिन आप सद्गुरु के तर्कों और उनके कार्य को झुठला नहीं सकते हैं, इसलिए एक खास गुट उनके खिलाफ दुष्‍प्रचार में जुटा है।
ट्विटर पर ऐसे लोगों की तादाद काफी है, जो बिना पढ़े मशीन की तरह किसी के ट्वीट को इसलिए रिट्वीट कर देते हैं, क्‍योंकि दुर्भावना से ग्रसित होते हैं। वहीं, कुछ लोगों को रिट्वीट करने के लिए पैसे मिलते हैं। ट्विटर पर सनसनी फैलाने के लिए भी एक गुट सक्रिय है। कुल मिलाकर किसी भी ट्वीट ट्रेंड कराने के लिए ट्विटर पर 25 लोगों ग्रुप काफी होता है। इस तरह, जब सुबह से शाम तक कोई नकारात्‍मक ट्वीट ट्रेंड करता है तो उस पर चर्चा शुरू हो जाती है और फिर झूठे नैरेटिव को बल मिलने लगता है। बुद्धिजीवी और देर तक जागने वाले कॉलेज के छात्र इनके आसान लक्ष्य होते हैं।
अब कोविड19 को ही लीजिए। इस महामारी का फैलाव रोकने के लिए देश में 21 दिन का लॉकडाउन लागू है। लेकिन इसी लॉकडाउन में दिल्‍ली सरकार ने हजारों-लाखों प्रवासी श्रमिकों को डीटीसी बसों में भरकर उत्‍तर प्रदेश की सीमा पर बेसहारा छोड़ दिया। यह देखकर दूसरे राज्‍यों में भी लोग लॉकडाउन का उल्‍लंघन कर सड़कों पर निकलने लगे। एक ओर सरकार कोविड19 का प्रसार रोकने के लिए प्रयासरत है, दूसरी ओर पूर्वाग्रह से ग्रसित बुद्धिजीवी और शातिर नेता व्‍हाट्सएप पर अफवाहें फैला रहे हैं, जिससे स्थिति बिगड़ गई। यह लॉकडाउन की घोषणा करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने हाथ जोड़कर लोगों से आग्रह किया था, ‘कृपया सामाजिक दूरी बनाए रखें और जो जहां है, वहीं रहे।’ इसके बावजूद दिल्ली और यूपी की सीमाओं पर जनसैलाब इकट्ठा किया गया। जो लोग कहते हैं कि लॉकडाउन की घोषणा से पहले सरकार को इसके नतीजों के बारे में विचार करना चाहिए था, उन्‍हें यह समझना होगा कि हमारे पास इतना समय ही नहीं था। तत्‍काल लॉकडाउन की घोषणा करना बेहद जरूरी था। केंद्र सरकार ने बिल्‍कुल सही समय पर लॉकडाउन का फैसला लिया।
सीमित संसाधन और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी केंद्र सरकार ने चिकित्‍सा सुविधाओं, आर्थिक पैकेज की घोषणा से लेकर उपचार के उपकरण जुटाने के साथ कानून-व्‍यवस्‍था बनाए रखने में कोई कसर नहीं छोड़ी। 1,000 बिस्‍तरों वाला अस्‍पताल बनाने में चीन को 10 दिन लगे, जबकि भारत ने रातों-रात रेल डिब्‍बों को 6,000 बिस्‍तरों वाले अस्‍पताल में बदल दिया। सीमित संसाधनों के बीच भारत में इस महामारी से निपटने के लिए जिस तरह का प्रबंधन किया गया, जैसी योजना बनाई गई, वह अपने-आप में अभूतपूर्व है, ऐतिहासिक है।
इतनी तैयारियों और प्रबंधन के बीच फर्जी खबरें फैलाकर प्रवासी मजदूरों में भय फैलाया गया। उन्‍हें गलत सूचना दी गई कि आनंद विहार से अपने गंतव्य तक जाने के लिए उन्हें सुविधा मुहैया कराई जाएगी। यह सब 'जीन शार्प 101' की तर्ज पर हुआ! अफवाहें फैलाई गईं और अराजकता फैलाने के लिए दहशत पैदा की गई। सच तो यह है कि देश के आकार, जनसंख्या के घनत्व और जनता की समझ को ध्यान में रखते हुए जो कुछ भी किया जा सकता था, केंद्र सरकार ने वह सब कुछ किया। लेकिन दुर्भाग्य से चर्चा उन बातों की ज्यादा हो रही है, जो सच नहीं हैं। दिल्ली की घटना ने इस बात को फिर साबित किया है कि कुछ राजनीतिक ताकतें नहीं चाहतीं कि मोदी अपने उद्देश्‍य में सफल हों। इसलिए उनके हर नेक कार्य की आलोचना की जाती है।
भारतीय राजनीति में आज जो कुछ भी हो रहा है, वह घटिया तो है जी, मानवता के लिए भी त्रासदी से कम नहीं है। भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की खराब स्थिति, अपर्याप्त परीक्षण किट, गरीबी, अनुशासनहीन, अव्यवस्थित और अवैज्ञानिक सोच वाली आबादी जैसी तमाम चुनौतियों के बावजूद मोदी ने बीते एक हफ्ते के दौरान जो किया है, वह अकल्पनीय, अविश्वसनीय और अभूतपूर्व है। उनका मानना है कि अर्थव्‍यवस्‍था के मुकाबले मानव जीवन अधिक महत्‍वपूर्ण है। इसके बावजूद ट्विटर पर #ModiMadeDisaster ट्रेंड कर रहा है। कहा जा रहा है कि अकेले मोदी ने भारत को कोरोना वायरस संक्रमण के तीसरे चरण में धकेल दिया है।
भारत में आज जो कुछ भी हो रहा है, वह इस बात का गवाह है कि विपक्ष हताश है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि विपक्ष मोदी की उपलब्धियों को निरर्थक साबित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यहां तक कि वे मोदी की छवि को धूमिल करने के लिए लोगों की जिंदगी से खिलवाड़ भी कर सकते हैं।
यह समय देश के साथ खड़े होने का समय है। ऐसे समय में भी विपक्ष मोदी को नीचा दिखाने के लिए देश के सबसे कमजोर तबके को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने से नहीं चूक रहा है। मैं राष्ट्रवादी होने का मतलब क्या है, मैं समझ चुकी हूं। यह भी समझ गई हूं कि असल में राष्ट्र विरोधी कौन हैं! आज मुझे अपने नेता पर गर्व है। विपरीत स्थितियों में संयम, हिम्मत, धैर्य बनाए रखना और विजयी होना हर किसी के बस की बात नहीं होती। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हर उस कदम की आभारी हूं जो इस महामारी से निपटने और हम सभी भारतीयों की सुरक्षा के लिए उन्‍होंने उठाया। साथ ही, शर्मिंदा भी हूं कि मैं मोदी जी के पक्ष में यह सोचकर पहले खड़ी नहीं हुई कि मेरे लेफ्ट-लिबरल मित्र क्या सोचेंगे? लेकिन आज मैं सार्वजनिक रूप से मोदी सरकार के लिए अपने समर्थन की घोषणा कर रही हूं। आप मुझे भक्त कह सकते हैं। सोशल मीडिया पर मुझसे अलग हो सकते हैं- मुझे इसकी कतई परवाह नहीं है।
( लेखिका बॉलीवुड से जुड़ी हैं )