जहरीली जमात
   दिनांक 06-अप्रैल-2020
तब्लीगी जमात के बारे में जो खुलासे हो रहे हैं, वे बहुत ही चौंकाने वाले हैं। जमात ने जानबूझकर जलसा किया, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों तक चाइनीज वायरस को पहुंचाया जा सके। यह सब उसने भारत को कमजोर करने के लिए किया

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तब्लीगी जमात के कारण कोरोना महामारी भारत के कोने कोने में फैल गई है। प्रधानमंत्री के लगातार आग्रह के बावजूद जमात ने चाइनीज वायरस को फैलाने में कोई लज्जा महसूस नहीं की। दिल्ली के निजामुद्दीन स्थित जमात के मुख्यालय में जलसे होते रहे, लोग आते-जाते रहे। सूत्रों के हवाले से जो खबरें आ रही हैं वे बहुत ही डरावने हैं। सुरक्षा सूत्रों का मानना है कि जमात ने एक साजिश के तहत देशबंदी के बावजूद हजारों लोगों को एक साथ रखा। इसका उद्देश्य था ज्यादा से ज्यादा लोगों तक वायरस फैलाना। इसलिए जमात के जलसे में लोग आते रहे और वहां से लौटकर पूरे देश में जाते रहे। इसमें विदेशी मुसलमानों का भी सहयोग लिया गया। यही कारण है कि इन दिनों देश के अनेक हिस्सो में बड़ी संख्या में विदेशी मुसलमान मिल रहे हैं।
इस्लाम के प्रचार-प्रसार के लिए 1927 में यानी करीब 93 साल पहले भारत के देवबंद में बनाया गया यह संगठन एशिया में चाइनीज वायरस के प्रसार का सबसे बड़ा कारण बन गया है। भारत सहित कई देश तब्लीगी जमात की मूर्खता की सजा भुगत रहे हैं। बड़ी अजीब स्थिति पैदा हुई जब निजामुद्दीन में स्थानीय प्रशासन को वायरस पीडि़तों की भनक लगी तो संदिग्धों को अस्पताल ले जाने के लिए एंबुलेंस भेजी गई, लेकिन इलाके के लोगों ने पुरजोर विरोध करते हुए एंबुलेंस लौटा दी। जब मामला नियंत्रण से बाहर हो गया तब दुनिया को जमात की जहरीली बातें पता चलीं। केवल भारत ही नहीं, अनेक देशों में जमात ने करोड़ों लोगों के जीवन को खतरे में डाल दिया है।
पाकिस्तान

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12 मार्च को पाकिस्तान के लाहौर शहर में इस महामारी के बीच दुनिया के 80 देशों के लगभग 2,50,000 लोग जमात के जलसे में पहुंचे। 'न्यूयॉर्क टाइम्स' की रपट के अनुसार आयोजन स्थल पर इतनी ज्यादा भीड़ जुटी कि लोगों को खुले में जमीन पर सोना पड़ा। इस बैठक में करीब 10,000 मौलाना भी थे। महामारी को देखते हुए पाकिस्तानी अधिकारियों ने तब्लीगी जमात के नेताओं से यह बैठक रद्द करने की अपील की, लेकिन उन्होंने उनकी बात नहीं मानी। इसका नतीजा यह हुआ कि तब्लीगी जमात की यह बैठक पाकिस्तान में चाइनीज वायरस के प्रसार का बहुत बड़ा जरिया बन गई। पाकिस्तान में जमात के 27 सदस्यों में वायरस की पुष्टि हुई है। यह संख्या और ज्यादा बढ़ सकती है। पाकिस्तान में लगभग 2,000 लोग वायरस से पीडि़त हैं और 23 लोगों की मौत हो गई है। सबसे ज्यादा पंजाब प्रांत प्रभावित है, जहां जमात की बैठक हुई थी। इसके बाद स्थानीय प्रशासन ने जमात से जुड़े कई लोगों को हिरासत में लेकर अस्पताल में भर्ती किया था। 'द डॉन' की एक रपट के अनुसार जब अस्पताल में उन लोगों की जांच की जा रही थी तब एक ने पुलिस पर चाकू से हमला कर दिया और भागने की कोशिश की।
मलेशिया, फिलिस्तीन और किर्गिस्तान
मलेशिया के क्वालालम्पुर में भी 27 फरवरी और 1 मार्च के बीच जमात की एक बैठक हुई थी। इसमें 30 देशों से 16,000 लोगों ने हिस्सा लिया था। इनमें से 620 लोग चाइनीज वायरस से संक्रमित पाए गए। ब्रुनेई के लगभग 73 मामले और थाईलैंड के 10 मामले इसी बैठक से जुड़े हुए थे।
जमात की लाहौर बैठक में फिलिस्तीन से दो लोग पहुंचे थे। ये दोनों चाइनीज वायरस से संक्रमित हुए और इन्हीं के जरिए पहली बार फिलिस्तीन तक यह वायरस पहुंचा। लाहौर बैठक में किर्गिस्तान के भी दो लोग आए थे। ये दोनों भी वायरस से पीडि़त हैं। इंडोनेशिया के सुलावेसी में भी जमात ने एक बैठक आयोजित की थी। इसमें 10 देशों के 8,700 लोग पहुंच चुके थे। इसी बीच इस बैठक का विरोध हुआ और उसे रद्द कर दी गई। लेकिन वहां पहुंचे लोग कई दिन तक एक ही स्थान पर रहे और एक साथ खाना भी खाया।
भारत

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दिल्ली के निजामुद्दीन में 18 मार्च को हुई जमात की बैठक से पूरे भारत में हड़कंप जैसी स्थिति है। इस बैठक में हिस्सा लेने वाले 10 लोगों की चायनीज वायरस से मौत हो चुकी है। वायरस के खतरे के बावूजद बिना इजाजत 18 मार्च को जलसा किया गया। इसमें हजारों विदेशियों के साथ पूरे भारत से लगभग 8,000 लोग शामिल हुए थे। जमात की इस हरकत से भारत में चाइनीज वायरस से पीडि़त होने वालों की संख्या बढ़ रही है। दिल्ली, तेलंगाना, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार, ओडिशा, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर आदि राज्यों में भी जमात के लोगों के कारण खतरा बढ़ गया है। इतना ही नहीं, बहुत लोग सऊदी अरब, मलेशिया और इंडोनेशिया से भी आए थे, जहां पर पहले ही चाइनीज वायरस बुरी तरह से फैला हुआ है। निजामुद्दीन की बैठक को रोक नहीं पाने को लेकर राज्य की अरविंद केजरीवाल सरकार भी घिरती जा रही है। खबरों के मुताबिक, अंदमान निकोबार प्रशासन की तरफ से जमात में शामिल 10 लोगों के वायरस से पीडि़त होने की रपट दिल्ली पुलिस और प्रशासन को भेजी गई थी। बताया जा रहा है कि यह रपट 25 मार्च को ही आ गई थी, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने इस पर टाल-मटोल वाला रवैया अपनाया और कोई कड़ी कार्रवाई नहीं की। जब मामला बढ़ा तब दिल्ली का प्रशासन हरकत में आया और पुलिस को मामला दर्ज करने को कहा। देशबंदी होने के बाद भी इतने बड़े पैमाने पर जमात की बैठक हुई, जो लोगों को चौंका रही है। चाइनीज वायरस के कारण मक्का-मदीना तक बंद है। ऐसे में निजामुद्दीन के मरकज में जमात की बैठक कैसे हुई? इसका जवाब तो दिल्ली सरकार को देना ही होगा।
वीजा नियमों का उल्लंघन

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सरकारी सूत्रों की मानें तो गृह मंत्रालय को पता चला है कि जमात के जलसे में शामिल होने वाले विदेशियों ने वीजा नियमों का उल्लंघन किया है। सरकार के अनुसार मजहबी विचारधारा के प्रचार के लिए किसी को वीजा नहीं दिया जाता है।
वीजा नियमों का उल्लंघन कर भारत में बिना रोक-टोक घूमने वाले सैकड़ों विदेशी मुसलमान पिछले दिनांे अनेक स्थानों पर मिले हैं। 23 मार्च को पटना में कुर्जी स्थित एक मस्जिद में 12 विदेशी मुसलमानों को छिपाने का मामला सामने आया था। ये सभी जमात से जुड़े हैं। उसी प्रकार झारखंड में ऐसे दो मामले सामने आए। पहला मामला रांची के निकट तमाड़ का है। 24 मार्च को तमाड़ स्थित राड़गांव मस्जिद में चीन और अन्य दो देशों के 11 मौलवियों को पकड़ा गया। इनमें चीन के तीन, किर्गिस्तान के चार और कजाकिस्तान के चार मौलवी शामिल हैं। ये सभी यहां 19 मार्च से ही रह रहे थे। वहीं 30 मार्च को रांची की एक मस्जिद से 24 मौलवियों को हिरासत में लिया गया। इनमें कुछ भारतीय हैं। बाकी मलेशिया, वेस्टइंडीज और पोलैंड के नागरिक हैं। ये लोग भी तब्लीगी जमात के लिए काम करते हैं। 31 मार्च को महाराष्ट्र के अहमदनगर जिले के नेवासा नगर स्थित एक मस्जिद से 10 विदेशी मुसलमानों को पुलिस ने हिरासत में लिया। इन सबको देखते हुए भारत सरकार ने इन विदेशियों का वीजा निरस्त कर उन्हें तुरंत भारत से जाने को कहा है।
क्या है तब्लीगी जमात

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तब्लीगी का मतलब होता है अल्लाह की कही बातों का प्रचार करने वाला, वहीं जमात का मतलब होता है समूह। यानी अल्लाह की कही बातों का प्रचार करने वाला समूह। मरकज का मतलब होता है बैठक के लिए जगह। दरअसल, तब्लीगी जमात से जुड़े लोग वहाबी विचारधारा को मानते हैं और इसी का प्रचार-प्रसार करते हैं। इस संगठन के बनने के पीछे का सबसे बड़ा कारण यह था कि मुगल काल में कई लोगों ने इस्लाम कबूल तो कर लिया था, लेकिन वे सभी हिंदू परंपरा और रीति-रिवाजों को भी मानते थे। कुछ तो वापस हिंदू बन रहे थे। आर्य समाज ने उन्हें दोबारा से हिंदू बनाने का शुद्धिकरण अभियान शुरू किया था। इस कारण मौलाना इलियास कांधलवी (जमात के संस्थापक) ने ऐसे लोगों को वहाबी शिक्षा देने का काम प्रारंभ किया। इस काम के लिए इलियास ने हरियाणा के मुस्लिम-बहुल मेवात को चुना। वहां के मेव मुसलमान अपने पुराने धर्म हिंदू के रीति-रिवाजों को भूल नहीं पा रहे थे और वापस हिंदू धर्म में लौट रहे थे। इसलिए इलियास ने मेवात के मुसलमानों को कट्टर बनाने के लिए वहाबी विचारधारा की शिक्षा देनी शुरू की और बाद में तब्लीगी जमात की स्थापना की।
आतंकवाद से संबंध
दुनिया के कई देशों ने तब्लीगी जमात को प्रतिबंधित सूची में रखा है। इनमें प्रमुख हैं रूस, उज्बेकिस्तान, तजाकिस्तान और कजाकिस्तान। इन देशों का मानना है कि जमात मुसलमानों को कट्टरवादी बनाने का काम करती है। 2011 में विकीलिक्स द्वारा जारी एक दस्तावेज के अनुसार अल-कायदा तब्लीगी जमात के निजामुद्दीन मुख्यालय का इस्तेमाल यात्रा के कागजात बनाने और ठहरने के लिए करता है। उल्लेखनीय है कि जमात का कोई संविधान और पंजीकरण न होने से आने और जाने वालों का लेखा-जोखा नहीं रखा जाता है।
30 जून, 2007 को ग्लासगो हवाई अड्डे पर हमला करने वाला आतंकवादी कफील अहमद जमात से ही जुड़ा था। वह मूल रूप से बेंगलूरू का रहने वाला था। वहीं 7 जुलाई, 2005 को हुए लंदन के बम हमलों में शामिल दो आतंकवादी शहजाद तनवीर और मोहम्मद सिद्दिकी खान के संबंध भी जमात से थे। इस कारण उन दिनों यह बात कही जाती थी कि लंदन हमले में जमात भी शामिल थी।
सूडान में लश्कर-ए-तोयबा के आतंकवादी हामिर मोहम्मद ने तब्लीगी जमात के सदस्य के नाते पाकिस्तान का वीजा लेने का प्रयास किया था। उसी प्रकार सोमालिया का कुख्यात आतंकवादी मोहम्मद सुलायमान बर्रे ने भी तब्लीगी जमात के माध्यम से ही पाकिस्तान में घुसने का प्रयास किया था। अल-कायदा के मुजाहिद्दीन बटालियन का कमांडर अबु-जुबैर-अल-हलीली ने भी बोस्निया से पाकिस्तान जाने के लिए तब्लीगी जमात का ही इस्तेमाल किया था। सऊदी नागरिक अब्दुल बुखारी, जो दुनिया के कई देशों में वांछित था, ने निजामुद्दीन स्थित मरकज में अपनी जगह बना ली थी।
भारतीय जांच एजेंसियों की जांच से यह भी पता चला था कि आतंकवादी संगठन हरकत-उल-मुजाहिद्दीन, जिसने 1999 में इंडियन एयरलाइंस के जहाज का अपहरण किया था, से जुड़े एक आतंकवादी ने सोवियत संघ के खिलाफ जंग में 6,000 तब्लीगियों को आतंकी प्रशिक्षण देकर अफगानिस्तान भेजा था। हरकत-उल-मुजाहिद्दीन, लगातार कश्मीर में कई हमलों और हत्याओं में शामिल रहा। बाद में वह मसूद अजहर के संगठन जैश-ए-मोहम्मद में मिल गया।
कहां से आता है पैसा
ऐसे तो कहा जाता है कि तब्लीगी जमात के लोग अपना पैसा लगाकर मजहब के लिए काम करते हैं, लेकिन यह बात पूरी तरह सत्य नहीं है। सूत्रों के अनुसार जमात के पास पैसा जकात से और विदेशी चंदे से आता है। सऊदी अरब के कुछ संगठन दुनियाभर के मुस्लिम संगठनों और यहां तक कि आतंकवादी संगठनों को पैसा देते हैं। इसमें तब्लीगी जमात भी शामिल है।
ऐसे संगठन से केवल भारत को ही नहीं, पूरी दुनिया को खतरा है। इसलिए इस पर प्रतिबंध लगना चाहिए और इसकी हरकतों की जांच बहुत ही गहराई से होनी चाहिए। यही समय की मांग है।
( लेखक वरिष्ठ स्तंभकार हैं )