कोरोना महामारी: संकट में संघ ने गढ़े प्रतिमान
   दिनांक 06-अप्रैल-2020
श्याम सहाय
चायनीज वायरस के कारण उत्पन्न संकट की इस घड़ी में दिल्ली में संघ के स्वयंसेवक और सेवा भारती के कार्यकर्ता हर प्रकार की सेवा कर रहे हैं। प्रतिदिन 75,000 से अधिक भोजन के पैकेट वितरित कर रहे हैं, जरूरतमंदों तक दवाई पहुंचा रहे हैं, और लोगों को समझा रहे हैं कि इस संकट का सामना कैसे करना है

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फोन की घंटी बजती है। हेलो, मैं पहाड़गंज से बोल रहा हूं। जी नमस्ते, बोलिए मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूं? जी हमारे दो छोटे बच्चे हैं, हम पति-पत्नी हैं। दो दिन हो गए कुछ खाने को नहीं मिला है। जी आप निश्चिन्त रहें, आपके भोजन की व्यवस्था हम करेंगे। आप अपना नाम पता बताएं।
फोन की घंटी फिर बजती है। हेलो मैं द्वारिका से बोल रहा हूं। जी नमस्ते, बोलिए मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूं? मैं 70 वर्ष का बुजुर्ग हूं। अपने फ्लैट में पत्नी के साथ रहता हूं। बेटे बाहर हैं। मुझे कुछ दवाइयां चाहिए। जी आप निश्चिन्त रहें। अपना नाम, पता बताएं, हम आपकी सहायता करेंगे।
फोन की घंटी बजती है। हेलो मैं मुनीरिका से बोल रही हूं। जी नमस्ते, बताइए मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूं? जी मैं उत्तर प्रदेश के बांदा की रहने वाली हूं। दिल्ली में रहकर आईएएस की तैयारी कर रही हूं। मेरे पास पैसे समाप्त हो गए हैं। ये सभी फोन कॉल प्रतिदिन आने वाले 10,000 से अधिक फोन कॉलों की कुछ बानगी हैं। इन फोन कॉलों में भोजन और दवाई की जरूरतों से लेकर हर तरह की परेशानियां बताई जा रही हैं। चायनीज वायरस के कारण देश में पैदा हुए संकट का जायजा दिल्ली का समाज कुछ इस तरह से कर रहा है। समाज सेवा में अग्रणी भूमिका निभाने वाली संस्था सेवा भारती ने लोगों की समस्याओं का अनुमान लगाते हुए 23 मार्च को देश में एक हेल्पलाइन की शुरुआत की। आज की तिथि में अलग-अलग स्थानों पर बैठे लगभग 130 कार्यकर्ता दिल्ली के विभिन्न स्थानों से आने वाले फोन कॉलों का 24 घंटे उत्तर दे रहे हैं। इस व्यवस्था में एक बड़ी टीम लगी है, जो इन हजारों लोगों की समस्याओं का 100 प्रतिशत समाधान दे रही है।
दिल्ली में लाखों लोग काम की तलाश में बाहर से आकर बसे हैं। विश्वविद्यालयों में पढ़ाई करने वाले और प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी में लगे विद्यार्थियों की संख्या भी बड़ी है। दैनिक मजदूरों, श्रमिकों और कामगारों की तादाद बहुत है। रिक्शा चलाने वाले, रेहड़ी लगाने वाले, छोटे दुकानदारों का मोटा अनुमान भी इस अनुपात को चौगुना कर देता है। दिल्ली में अकेले रहने वाले बुजुर्गों की संख्या भी है। वायरस से पैदा हुई परिस्थिति से जैसे इनके सभी के जीवन को एक झटके में ही रोक दिया। लेकिन दिल्ली के सामाजिक संगठनों ने ऐसा होने नहीं दिया।

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, दिल्ली प्रांत के कार्यवाह श्री भारत भूषण बताते हैं कि संघ की प्रतिनिधि सभा की बैठक के लिए वे लोग बेंगलूरु पहुंचे ही थे कि उन्हें प्रतिनिधि सभा के स्थगित होने की सूचना मिली। चायनीज वायरस संकट के मद्देनजर स्वास्थ्य मंत्रालय के निर्देशों को देखते हुए यह कार्यक्रम स्थगित किया गया। संघ ने ऐसे में समाज सेवा को प्रमुखता दी। दिल्ली प्रांत की इकाई ने बेंगलूरु में ही बैठक कर आगे की योजना पर चर्चा प्रारंभ कर दी। देश में संकट गहरा रहा था। दिल्ली में स्थिति और बिगड़ेगी, इसका आभास भी था। आगे की लड़ाई बड़ी थी।
बेंगलूरु से दिल्ली लौटने के बाद इस संकट से निपटने की तैयारियां प्रारंभ हो गर्इं। इतनी बड़ी दिल्ली में हजारों लोगों तक पहुंचने के लिए फोन का रास्ता अपनाया गया। 23 मार्च, जनता कर्फ्यू वाले दिन दोपहर में सेवा भारती ने 8010066066 का सहायता सेवा जारी किया। पहले ही दिन 2,000 कॉल आई। अंदाजा लगाना कठिन था कि समस्या के समाधान के लिए बड़ी व्यवस्था की जरूरत थी। तकनीक का सहारा लेते हुए आइवीआर सिस्टम लगाया गया। फोन सुनने के लिए 7 लोग लगाए गए। इसमें यह सुविधा होती है कि कॉल स्वत: ट्रॉस्फर हो जाती है। आईवीआर सिस्टम लगाते ही कॉलों की संख्या 9000 हो गई। यह एक अंतहीन सिलसिले की शुरुआत थी।

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एक झलक तो मिल गई थी लेकिन इतनी कल्पना करना इस समय कठिन था कि एक फोन से प्रारंभ किया गया सेवा का यह काम बढ़ता ही चला जाएगा। आज संकट में लोगों के काम आएं जीवन की सार्थकता इससे अधिक क्या हो सकती है। इस अनुभूति ने सेवा को विस्तार दिया, कार्यकर्ताओं को हौसला दिया और इस पूरी व्यवस्था में लगी टोली को संबल दिया।
हेल्पलाइन सेवा में फोन करने या चार विकल्प दिए गए थे। 1 नंबर भोजन और अन्य आवश्यकताओं के लिए, 2 नंबर चिकित्सकों की सलाह और सुविधा के लिए, 3 नंबर सेवा भारती को आर्थिक सहयोग के लिए और 4 नंबर सेवा भारती के साथ जुड़कर कार्यकर्ता के रूप में काम करने के लिए। इन विकल्पों में सबसे अधिक भोजन के लिए लोगों के फोन आ रहे थे। कुछ दूसरी परेशानियों के लिए भी लोग फोन कर रहे थे। इनमें से दैनिक मजदूरों और विद्यार्थियों के फोन भी आने लगे।
चिकित्सकों की सलाह के लिए भी लोगों के फोन आए। समाज से बड़ी संख्या में सेवा भारती को इस कार्य में आर्थिक सहयोग देने के लिए भी लोग फोन कर रहे थे। इस सेवा कार्य को देखकर स्वेच्छा से अपना सहयोग देने के लिए भी लोगों ने फोन किए। संकट बढ़ता गया तो लोगों के अभूतपूर्व समर्थन ने उत्साह भी बढ़ाया। लोग जुड़ते गए तो इस व्यवस्था में लगी टोली भी बढ़ती गई।
परेशानी में फंसे दिल्ली के लोगों की समस्याएं हल होने लगीं तो फोन कॉल की संख्या भी बढ़ती चली गई। अब एक दिन में 5,000 से अधिक लोगों के फोन आ रहे हैं। इन्हें संभालने के लिए फोन सुनने वालों की संख्या 7 से बढ़ाकर 24 कर दी गई। यह सिलसिला यही नहीं रुका। फोन कॉल और लोगों की परेशानियों को देखते हुए फोन सुनने वाले कार्यकर्ताओं की संख्या पहले 51 और फिर 89 की गई। दिल्ली के अलग- अलग स्थानों पर ये सभी कार्यकर्ता 24 घंटे के हिसाब से लोगों की परेशानियों का हल कर रहे थे। सेवा का जुनून और समाज के अपने लोगों के लिए समर्पण इनकी गति को अबाध बनाए हुए था। समाज के इस कार्य के लिए समाज से सहयोग भी भरपूर मिल रहा था।

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सबसे बड़ी चुनौती थी सेवा के इस हर पल विस्तृत होते दुरूह कार्य को सुचारू और व्यवस्थित बनाना। यह कैसे संभव हो पाया, इसे श्री भारत भूषण ने विस्तार से समझाया। सहायता नंबर पर आने वाली कॉल को सबसे पहले प्रथम स्तर पर लगे कार्यकर्ता सुनते थे। फोन करने वाले का नाम, उनका क्षेत्र और उनकी समस्या पूछकर आगे बढ़ाते थे। आगे काम ठीक-ठीक हो इसके लिए पूरी दिल्ली को आठ क्षेत्र में बांटा गया था। हर क्षेत्र में लिए 3 कार्यकर्ता निश्चित किए गए थे। सबसे पहले कॉल सुनने वाले कार्यकर्ता प्राथमिक जानकारी लेकर क्षेत्र के हिसाब से तय तीन कार्यकर्ताओं को आगे भेजते थे। इस क्रम को आगे बढ़ाते हुए क्षेत्र के कार्यकर्ता परेशानी में पड़े इन लोगों की सूची को जिला स्तर पर तैनात 4-4 कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ाते थे।
सूचना मिलने के बाद कार्य प्रारंभ होता था लोगों तक भोजन, चिकित्सकीय सुविधा और दूसरी आवश्यकताओं की पूर्ति का। इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, सेवा भारती और समाज के दूसरे संगठनों के कार्यकर्ता नगर और बस्ती स्तर पर मौजूद थे। जानकारी आते ही 4 घंटे के अंदर भोजन और दूसरी परेशानियों का हल यह टोली निकाल रही थी।
हजारों हजार लोगों तक दिन-रात भोजन पहुंचाना कोई आसान कार्य न था। पहली आवश्यकता थी सहयोग और सामग्री की और दूसरी थी कार्यकर्ताओं के बड़े तंत्र की। वैसे कार्यकर्ता जो स्वेच्छा से समर्पण भाव से अपना धन और अपना समय लगाकर बिना किसी अपेक्षा के सेवा के काम में लगे रहें। सौभाग्य से परंपरागत भारतीय समाज ऐसे मौकों पर निराश नहीं करता। संघ के संस्कारों में निर्मित स्वयंसेवक तैयार थे। समाज के लोग भी सेवा देने को तत्पर थे। आर्थिक सहयोग देने वालों की भी कमी नहीं थी।
इनके सहयोग से दिल्ली के अलग-अलग 84 स्थानों या सामुदायिक रसोई चलाई गई, जहां 500 से लेकर 5000 लोगों का भोजन बनना प्रारंभ हुआ। इनमें से झण्डेवाला माता मंदिर रसोई की खूब चर्चा हुई, जहां 10,000 से अधिक लोगों का भोजन प्रतिदिन बन रहा था।
भोजन बनाकर देने के लिए समाज आगे आया। समाज के अन्य परिवारों और 9,000 स्वयंसेवक परिवारों से भोजन बनवाकर उनके पैकेट बनाकर बांटने का काम भी किया गया। प्रत्यक्ष रूप से सेवा करने में, घर- घर जाकर भोजन उपलब्ध कराने में लगभग 4,000 स्वयंसेवक दिन-रात लगे रहे। इन कार्यों को करते समय सबसे बड़ी चुनौती थी स्वयं के बचाव की। इसे ध्यान में रखते हुए कार्यकर्ता मॉस्क, ग्लप्स, सेनिटाइजर का प्रयोग करते रहे। सामान बांटते समय सामाजिक दूरी का ध्यान रखना अनिवार्य था।
समस्या सिर्फ भोजन की नहीं थी। 24 मार्च को पूरे देश में घोषित तालाबंदी के बाद समस्याओं के प्रकार भी बढ़े और उनकी संख्या भी। उद्योग, व्यापार, बाजार, दुकानें बंद होने से लोगों की हर तरह की समस्या एकाएक बढ़ी। सभी को यह पता था कि चाइनीज वायरस से बचाव का यही एक उपाय था लेकिन परेशानियां कहां मानती हैं। कुछ समस्याओं और कुछ अफवाहों के कारण दिल्ली में काम करने वाले हजारों मजदूरों, श्रमिकों और कामगारों ने अपने-अपने राज्यों के लिए पलायन प्रारंभ कर दिया। 28 मार्च की रात आनंद विहार बस अड्डे पर हजारों की संख्या में ये लोग इकट्ठा हो गए। सामाजिक दूरियां और बचाव के तमाम उपायों को धता बतातीं इनकी तस्वीरें डरावनी थीं। स्थिति को कैसे संभाला जाए यह किसी की समझ में नहीं आ रहा था। प्रशासन के हाथ-पांव फूले हुए थे।
पिछले एक सप्ताह से सेवा के कार्य में लगे संघ के स्वयंसेवकों के लिए यह नई चुनौती थी। मजदूरों का बड़ी संख्या में इकट्ठा होना। अपने-अपने शहरों-गांवों के लिए पैदल निकल जाना। यह एक अप्रत्याशित स्थिति थी। आनंद विहार पूर्वी दिल्ली इलाके में पड़ता है। इस क्षेत्र के स्वयंसेवकों ने स्थिति की गंभीरता को समझते हुए इसे संभालने का अपनी ओर से पूरा प्रयास किया। उनकी लाइनें लगवाना, उनको भोजन देना, मॉस्क, सेनिटाइजर देना, बसों से रवाना करना, ये सारे काम स्वयंसेवकों ने अपने हाथ में ले लिए। पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को स्वयंसवकों की प्रशंसा करनी पड़ी। डीसीपी जसमीत सिंह ने कहा कि स्वयंसेवकों ने स्थिति को बिगड़ने से बचा लिया। आनंद विहार पर अगले तीन दिन तक स्वयंसेवकों ने हजारों लोगों को दिन-रात भोजन कराया, व्यवस्था को बनाए रखने में प्रशासन का सहयोग किया और दिल्ली के संकट को गहराने से रोका।
समस्याएं अभी और भी थीं। धीरे-धीरे यह पता चला कि दिल्ली में ऐसे बुजुर्गों की संख्या काफी है, जिनके बच्चे बाहर रहते हैं। सेवा भारती और संघ के स्वयंसेवकों ने इस समस्या की गंभीरता को समझा। ऐसे बजुर्गों से संपर्क किया। उनके ही आसपास के परिवारों को तैयार किया और बहुत कम समय में दिल्ली के अलग- अलग क्षेत्रों में ऐसे कोई 5,000 बुजुर्गों की देखभाल का जिम्मा समाज के ही सहयोग से कर एक अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया।
इसी तरह एक समस्या दिल्ली में रह रहे पूर्वोत्तर क्षेत्र के लोगों के साथ दुर्व्यवहार भी सामने आई। उसे देखते हुए सेवा भारती ने नार्थ-ईस्ट हेल्पलाइन सेवा जारी किया। एक अनुमान के अनुसार राजधानी में पूर्वोत्तर के 5-7 लाख लोग रहते हैं। सेवा भारती की तरफ से जारी 9650530531 नंबर इन लोगों की समस्याएं सुनी जाने लगीं। उनकी सहायता का क्रम भी प्रारंभ हो गया।
दिल्ली में उच्च शिक्षा और प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी के लिए रह रहे दूसरे प्रदेशों के लाखों विद्यार्थियों के लिए भी यह संकट की घड़ी थी। किसी के पास पैसे नहीं, किसी को भोजन उपलब्ध नहीं तो किसी को और कोई समस्या। इसे देखते हुए एक यूथ हेल्पलाइन नंबर अलग से जारी किया गया। यह हेल्पलाइन नंबर उनके लिए राहत की सांस की तरह था।
संकट के ऐसे मौकों पर सबसे अधिक परेशान होते हैं समाज के दिव्यांग। कोई सुनने में अक्षम, कोई देखने में अक्षम तो किसी को और तरह की अक्षमता। सामान्य समाज स्वयं संकट में हो तो इनकी ओर लोगों का ध्यान कम ही जाता है। इसे देखते हुए सक्षम प्रकल्प ने एक दिव्यांग हेल्पलाइन प्रारंभ की। कार्यकर्ताओं ने उनकी समस्याओं का समाधान निकालना प्रारंभ किया। आज की तिथि में दिव्यांग हेल्पलाइन पर प्रतिदिन 700-800 कॉल आ रही है।
संघ के स्वयंसवकों और सेवा भारती की इस टोली ने गोशालाओं के लिए और स्वतंत्र विचरण करने वाले पशु-पक्षियों के लिए भी अपनी बांहें पसारीं। दिल्ली में ऐसी कई गोशालाएं हैं जहां 4,000-8,000 गोवंश हैं। इनके लिए चारे की व्यवस्था की गई। पर्यावरण संरक्षण की गतिविधि से जुड़े कार्यकर्ताओं ने स्वतंत्र विचरण करने वाले पशु-पक्षियों के लिए दाना और चारे की व्यवस्था की।
देखा गया है कि ऐसे मौकों पर सामाजिक सद्भाव बड़ी तेजी से बिगड़ता है। इसे ध्यान में रखते हुए संघ के स्वयंसेवकों ने एक अलग मोर्चा थामा। पलायन कर रहे मजदूरों से संवाद कर पहले तो उन्हें भरोसा दिलाया कि समाज उनकी चिंता करेगा। यह कार्य दिल्ली के लगभग 200 जगहों पर चला जहां हर जगह या 15-20 हजार मजदूर पलायन को तैयार बैठे थे। न सिर्फ उन्हें समझाया गया, बल्कि उनके मालिकों से उन्हें अंतिम पैसा देने की बात भी कही गई। वे जहां रह रहे थे उन मकान मालिकों से भी उनसे ऐसे समय में मकान किराया नहीं मांगने का आग्रह किया गया। मजदूर यूनियनों और दूसरे ऐसे संगठनों से भी आगे आकर श्रमिकों, कामगारों और दैनिक मजदूरों से संवाद कायम करने का आग्रह किया गया। उसका परिणमा भी सामने आया। विश्वास कायम हुआ, पलायन रुका।
समाज पर आश्रित रहकर कुछ छोटे-छोटे काम कर अपना जीवन चलाने वाले घुमंतू जातियों के लिए यह समय परेशानी पैदा करने वाला था। इनकी स्थिति ऐसे भी अच्छी नहीं रहती। सेवा भारती का ध्यान इनकी ओर भी गया। दिल्ली की अलग-अलग 56 बस्तियों में इनकी सहायता का काम प्रारंभ हुआ। उन्हें भोजन उपलब्ध कराना और दूसरी कोई समस्या हो तो उसका भी समाधान करना। सेवा के इन कार्यों में लगे स्वयंसेवकों को ध्यान आया कि जिन घरों में छोटे बच्चे हैं वे कुछ अलग तरह की समस्याओं से जूझ रहे हैं। ऐसा ध्यान आते ही, दूध पिलाने वाली जरूरतमंद मांओं के लिए दूध, बच्चों का साबुन, बिस्कुट के पैकेट और कॉर्नफ्लेक्स के पैकेट घरों में आवश्यकतानुसार बांटे जाने लगे। यह सुखद संयोग था कि मिड डे मील बनाने वाली एक कंपनी ने कार्नफ्लेक्स के हजारों पैकेट सहयोग स्वरूप उपलब्ध करवाए।
सेवा के कार्यों का एक आयाम लोगों को बचाव के तरीकों के प्रति जागरूक करना भी रहा। दिल्ली के बड़े इलाके में छोटी-छोटी जगहों में अधिक संख्या में लोग रहते हैं। सामान्य दिनों में तो ये दिन में बाहर काम पर और रात को ही घर पर सोने आते हैं। इस संकट के समय 24 घंटे उसी छोटे से स्थान पर बिताना सभी सावधानियों का पालन करते हुए दुरुह था। लोग घरों से बाहर गलियों में आ जाते थे। इन्हें सामाजिक दूरी के बारे में बताया गया। धीरे-धीरे लोगों को बात समझ आने लगी, उन्होंने पालन करना भी प्रारंभ कर दिया।
इन सभी कार्यों के लिए स्थापित किए आईवीआर (इरोक्टिव वॉयस रिस्पांस) सिस्टम के प्रयोग ने एक मिसाल कायम कर दी। एक फोन से बढ़ती हुई यह व्यवस्था 130 फोन तक गई। इतने ही कार्यकर्ता लगे और रिपोर्ट लिखे जाने तक प्रतिदिन 10,000 से अधिक की संख्या में लोगों की कॉल आती रही।
इस पूरी व्यवस्था के प्रबंधन का भी कई स्तर तय किया गया था। सभी कार्यों के समन्वय के लिए 5 लोगों की टोली थी। आने वाली कॉलों के निरीक्षण के लिए 25 लोगों की टीम थी। कॉलर की समस्याएं हल हुई या नहीं इसकी प्रतिपुष्टि के लिए 11 लोगों की टीम थी। एक टीम छूट गई कॉलों को देखने के लिए भी थी। लोगों के फोन सुनने वाली 130 लोगों की टोली इनसे अलग थी।
निरीक्षण फोन सुनने वालों की बातचीत का निरीक्षण कर उन्हें बातचीत करने को और प्रभावी और उपयोगी बनाने का सुझाव देती थी। कोई कार्यकर्ता उस जगह पर उपयुक्त न लग रहा हो तो उसे दूसरे कामों में लगाया जाता था। ‘फीडबैक टीम’ का काम लोगों को फोन कर यह पूछना था कि उनके पास भोजन पहुंचा था या नहीं, उनकी दूसरी समस्याएं हल हुई या नहीं।
यह भी कम आश्चर्य का विषय नहीं कि परेशानी में पड़े ऐसे लोगों में से बड़ी संख्या में लोगों ने गूगल फार्म भरकर भेजा। कुल मिलाकर एक ऐसी व्यवस्था कायम हुई जिसमें जिस किसी ने भी फोन किया उस तक सहायता पहुंचाई गई, उसकी समस्या का निराकरण किया।
चायनीज वायरस संकट और संपूर्ण तालाबंदी के बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने जो प्रयोग किया वह उनकी राष्ट्रनिष्ठा, समर्पण और सेवाभाव को दर्शाता है। ‘सामाजिक दूरी’ का ध्यान रखते हुए दिल्ली प्रांत में लगने वाली 1,900 शाखाओं में से 900 शाखाएं आॅनलाइन लगीं। तकनीक का प्रयोग कर स्वयंसेवक निश्चित समय पर वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से एक साथ आते रहे। इसमें प्रारंभ के 10-15 मिनट व्यायाम, फिर 15-20 मिनट परिचर्चा और प्रार्थना से पूर्व एक संकल्प कि अपने-अपने क्षेत्र में किसी को भूखा नहीं रहने देंगे। इस दौरान संघ की विभिन्न स्तर की बैठकें भी जूम और दूसरे एप पर होती रहीं।
इस रिपोर्ट के लिखे जाने तक सेवा भारती, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और दूसरे सामाजिक संगठनों की तरफ से चलाया जा रहा सेवा और सहायता का कार्य अनवरत जारी है। 4,500 हजार से अधिक कार्यकर्ता दिल्ली की गली-गली में घूमकर 75,000 से अधिक भोजन के पैकेट प्रतिदिन वितरित कर रहे हैं। बुजुर्गों की देखभाल हो रही है।
गोमाता और पशु-पक्षियों को भी दाना और चारा खिलाया जा रहा है। तकनीक की सहायता से इस विशाल कार्य को व्यवस्थित अवश्य किया लेकिन उसके पीछे की प्रेरणा सनातन भारतीय विचारों से अनुप्राणित राष्टÑीय स्वयंसेवक संघ ही है। संकट राष्ट्रीय चरित्र गढ़ता भी है उसके प्रकाशन का अवसर भी देता है। समाज समवेत रूप से संकल्पित है तो यह संकट अवश्य हारेगा लेकिन इस दुरुह काल में सेवाभावी समाज ने जो प्रतिमान गढ़े हैं उसका सुवास अनंतकाल तक फैलता रहेगा। (लेखक लोकसभा टी.वी. के संपादक हैं
सहयोग में समाज आगे
संकट के इस मौके पर समाज के सह्रदय लोगों ने दिल खोलकर सहायता की। एम्स और सफदरजंग के पास पूरे वर्ष प्रतिदिन हजार से अधिक लोगों को भोजन कराने वाले परफेक्ट फाइनेंस कंपनी के रामअवतार किला ने सेवा भारती के आह्वान पर 50,000 लोगों के भोजन का जिम्मा लिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने दूसरे लोगों को प्रेरित कर दो लाख भोजन के पैकेट और वितरित करवाए। ग्रेट वैल्यू कंस्ट्रक्शंस के मनोज अग्रवाल भी ऐसे मौकों पर संबल बनकर सामने आए। उन्होंने एक लाख लोगों के भोजन का संकल्प लिया। ऐसे ही बालाजी एक्शन हॉस्पिटल के सुभाष अग्रवाल ने 10 लाख रुपए मूल्य के सामान का सहयोग दिया। राजधानी रोलिंग फ्लोर मिल्स के श्याम बागड़ी ने 20,000 लोगों के भोजन की व्यवस्था की और छोटे बच्चों के लिए एक ट्रक कॉर्नफ्लेक्स के पैकेट भिजवाए। इसी कड़ी में सीए परिवार के संजीव सिंघल और सुरुचि फूड्स प्राइवेट लिमिटेड के गणेश गुप्ता ने 1-1 लाख लोगों के भोजन का प्रबंध कराया। उद्योगपति राकेश बिंदल ने प्रतिदिन 3,000 लोगों के भोजन का प्रबंध किया। दिल्ली में सेवा कार्यों के लिए 8 स्थानों पर स्टोर बनवाए गए थे। विद्या भारती सहित अन्य दूसरी संस्थाओं ने इन स्टोरों के लिए स्वेच्छा से स्थान मुहैया कराया।