कोरोना वायरस और तब्लीगी जमातियों का जाहिलपना
   दिनांक 06-अप्रैल-2020
शरद कुमार यादव
मोहम्मद साद का एक ऑडियो है जो उनकी जाहिलियत को दर्शाता है, वह कहता है कि कोरोना से डरने की जरूरत नहीं है, 70 हजार फरिश्ते हमारे साथ हैं। अगर वे मुझे नहीं बचा सकते है, तो कौन बचाएगा

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नोवेल कोरोना वायरस आज पूरी दुनिया में दहशत का पर्याय बन चुका है। जहां एक ओर, इस भयावह त्रासदी से उबरने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केन्द्रीय सरकार और सभी राज्य सरकारे हर संभव प्रयास कर रही है, वहीं दूसरी तरफ देश में ऐसे असामाजिक व जिहादी तत्व भी हैं जिन्होने न केवल धार्मिक जलसे का आयोजन कर तमाम प्रयासों पर पानी फेर दिया बल्कि सम्पूर्ण भारतवासियों के जीवन को भी असुरक्षित किया है। जैसा कि हम सभी जानते हैं शुरुआत में, केरल व अन्य राज्यों में करोना के बिगड़ते हालातों के मद्देनजर देश में सामाजिक दूरी बनाने का आह्वान किया गया था। किसी भी प्रकार के सामाजिक, धार्मिक जलसों की मनाही के साथ स्कूल और कॉलेज भी बंद कर दिए गए थे। ताकि बिगड़ते हालातों पर समय रहते काबू किया जा सके। लेकिन इस गंभीरता के बावजूद दिल्ली के निज़ामुद्दीन इलाक़े में तब्लीगी जमात ने न केवल धार्मिक जामतियों की भीड़ जुटाई बल्कि बल्कि हजारों की संख्या में कोरोना संक्रमित लोगो को मस्जिदों में छिपा कर भी रखा। हालांकि , स्थिति की संजीदगी को देखते हुए इसके मुखिया और सात लोगो पर एफ़आईआर दर्ज की जा चुकी है, परंतु इस प्रकार के धार्मिक जलसे का आयोजन अपने आप में एक गंभीर राष्ट्रीय अपराध है।

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चूंकि इस जलसे में भाग लेने हेतु कई ऐसे देशों के मुसलमानों को भी बुलाया गया था जहां करोना वायरस का कहर अपने चरम पर था। इस पूरे जलसे का खुलासा तब हुआ, जब दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों में कोरोना संक्रमितों की संख्या अचानक बढ़ने लगी और तेलंगाना में छ: और जम्मू में एक मरीजों की मृत्यु हुई। इन मरीजों में यह रोग कहां से आया जब इसकी पड़ताल हुई तो पता चला कि ये सभी तब्लीगी जमात के जलसे में शामिल हुए थे। जलसे से निकले जमातियों के कारण आज देश करोना के ‘सामुदायिक प्रसार’ के खतरे तक बढ़ चुका है। इस भयावह स्थिति का बानगी इस तथ्य से लगाई जा सकती है कि स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार देश में कोरोना के नए मामलों में एक तिहाई मामले मरकज़ में शामिल जमातियों के ही हैं। अभी तक 17 राज्यों में हजारो नए मामले इस जमात के लोगो के आए है और लगभग 22000 जमातियों को क्वारंटाइन किया गया है।
  ये लोग न तो इस बीमारी की गंभीरता समझ रहे हैं और न ही प्रशासन और स्वास्थ्य कर्मचारियों को सहयोग कर रहे हैं।
हद तब हो जाती है जब मरकज के प्रमुख मौलाना मोहम्मद साद का एक कथित आडियो सामने आता है जो उनकी जाहिलियत को दर्शाता है, वह कहता है कि कोरोना से डरने की जरूरत नहीं है, 70 हजार फरिश्ते हमारे साथ है। अगर वे मुझे नहीं बचा सकते है, तो कौन बचाएगा। डॉक्टर की बातों में आकार नमाज छोड़ने की जरूरत नहीं है। इस बात पर यकीन करने की जरूरत नहीं है कि हम लोग मिलेंगे तो बीमारी फैलेगी, बल्कि हम मस्जिदों में जमा होंगे तो अल्लाह ताला इस समय में फरिश्तों को हाज़िर करेंगे। यकीनन मौलाना साद वायरस के दुष्परिणाम को भलीभांति जानता था। लेकिन फिर भी ऐसे कुतर्की बातों को मज़हब से जोड़ कर उसने ऐसा कहा।

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इतना ही नहीं संक्रमित जमातियों का जाहिलपना तब ज्यादा उजागर होता है जब इनके द्वारा कोरोना योद्धाओं (मसलन, पुलिस और स्वास्थ्य कर्मचारियों) पर थूकना और उनके साथ बदसलूकी जैसी गतिविधियां की जा रही है। और तो और बिहार एवं मध्य प्रदेश में वायरस संदिग्ध लोगों के जांच के लिए गए डॉक्टर दल को पीटने की घटना भी इन जमातियों द्वारा की गई। अस्पतालों में नर्सों के साथ बदसलूकी बढ़ते मामलों के कारण गाजियाबाद अस्पताल में महिला स्वास्थ्यकर्मियों के स्थान पर पुरुष स्वास्थ्यकर्मियों को रखने का फैसला लिया गया। ये सभी घटनाएं न केवल दुखद है बल्कि बेहद निंदनीय भी है।
इस विकट परिस्थिति में जहां सम्पूर्ण भारतवासी अनुशीलन और अनुशासन का परिचय देते हुए अपने स्तर पर राष्ट्र सेवा कर रहे हैं, एकजुटता और मानवता का संदेश दे रहे हैं पर वहीं मजहब की आड़ में ये लोग ऐसी हरकतों से अपनी अशिक्षा, संकीर्णता, और जाहिलपने का बार-बार प्रमाण दे रहे हैं।
दरअसल, तब्लीगी जमात का इतिहास ही विवादास्पद है। वैश्विक स्तर पर यह जमात हमेशा ही अपने आपराधिक कुकर्मों और आतंकवादी जेहादी गतिविधियों में शामिल रहने के लिए चर्चित रही है। इसी वजह से विश्व के कई इस्लामिक देश जैसे सऊदी अरब और ईरान ने इस पर प्रतिबंध लगाया हुआ है। यहां तक कि कई ऑनलाइन वहाबी फतवों की सूची में तब्लीगी जमात को "पथभ्रष्ट" समूह के रूप में सूचीबद्ध किया है। ऐसी तमाम रपटें और अकादमिक लेखन हैं जो बताते हैं कि विश्व में हुए कई आतंकी हमलों में पाए गए आतंकवादियों का संबंध तब्लीगी जमात से है।
यह दुर्भाग्य ही है कि भारत में जन्में इस जमात का मुख्यालय दिल्ली में स्थित है। भारत में भी इस पर पूरी तरह प्रतिबंध लगना चाहिए। प्रसिद्ध इतिहासकार सीता राम गोयल ने अपने लेख ‘द तब्लीग मूवमेंट ऑर मिलियन्स ऑफ बेयरडेड मिलिटेंट्स ऑन द मार्च’ में बताया है कि तब्लीगी जमात अपनी पहली महान बड़ी उपलब्धि सोची समझी रणनीति के तहत 'शुद्धि आंदोलन' के प्रेणता आर्य समाजी स्वामी श्रद्धानन्द स्वामी श्रद्धानंद का किया कत्ल को मानता है। वह आगे भी बताते हैं कि जमात द्वारा 1992 में हुए दंगो में मेवात में कई मंदिरों को भी जलाया गया था।

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इस्लामी पुनरुत्थानवादी आंदोलन के नाम पर कई देशो में यह तब्लीगी कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा है। यहा तक कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी एफबीआई भी मानती है कि तब्लीगी जमात दुनिया भर में जिहादी नेटवर्क तैयार करने वाला संगठन है। वहीं, इस्लामिक विद्वान मुहम्मद खालिद ने भी अपनी पुस्तक ‘ट्रेवेलेर्स इन फेथ’ में कहा है कि तब्लीगी जमात के जमातियों और आतंकी गतिविधियों के बीच अटूट संबंध रहा है। मसलन, 1998 में दार-ए-सलम, तंजानिया, नैरोबी, केन्या में ऐसे कई आतंकी हमले हुए, जिसमें तब्लीगी जमात का हाथ था।
कई अन्य साक्ष्य भी हैं जिनमें इसके संस्थापक इलियास ने खुद स्वीकार किया है कि वह जिहादी सैनिक तैयार कर रहे थे। गहराई से देखें तो यह जमात धर्म के आड़ में जिहादी मानसिकता को बढ़ावा देने का काम कर रही है।
आज जरूरी है कि जहां एक तरफ करोना के कहर को बढ़ाते इन जमातियों को नियंत्रित किया जाए। वहीं दूसरी तरफ इस प्रकार की करतूतों पर पर्दा डालने वाले कथित उदारवादी-वामपंथी वर्ग को भी नियंत्रित करना जरूरी है। बढ़े ही आश्चर्य की बात है कि हर छोटी बड़ी बात पर अपनी कलम उठाने वाले तथाकथित उदारवादी-वामपंथी वर्ग जामतियों के इस उपद्रव पर मौन धारण किए हुए है।
वे केवल मोदी सरकार, दिल्ली पुलिस और प्रशासन को जिम्मेदार ठहराकर गंगाजमुनी तहजीब, भाई चारा, अमन और शांति का धर्म बताकर इन जामतियों के जघन्य अपराध पर लगातार पर्दा डाल रहे है। दुर्भाग्य से अगर यही मामला किसी हिन्दू धार्मिक स्थल पर होता तब निश्चित ही इसकी कलम कुछ और कहती।
नि:संदेह, सम्पूर्ण मानवजाति का असल धर्म मानवता है। अगर मानवता ही नहीं बचेगी तो सम्पूर्ण सृष्टि का नाश हो जाना तय है। यह नहीं भूलना चाहिए कि संक्रमण का कोई धर्म नहीं होता है। यह लड़ाई सम्पूर्ण मानव समाज को एकजुट होकर लड़नी पड़ेगी। धर्म के अनुयायियों और मुस्लिम बौद्धिक वर्ग को मजहबी जाल से निकलकर मानवता, अहिंसा, प्रेम, सद्भाव, संविधान और कानून को आगे रख कर इस भयावह बीमारी से लड़ने मे सहयोग देने की शिक्षा देनी चाहिए न की अंधविश्वास, कुतर्क, अविवेक और जाहिलपन को बढ़ावा देना चाहिए।
( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति विज्ञान के असिस्टेंट प्रोफेसर हैं )