"प्रधानमंत्री ने संकट में बदला व्यक्ति और देश का मनोविज्ञान"
   दिनांक 07-अप्रैल-2020
विश्वव्यापी महामारी कोरोना ने स्वास्थ्य सेवाओं और संसाधनों में अग्रणी अमेरिका, इटली, स्पेन जैसे देशों को घुटनों पर ला दिया है। वहीं सीमित संसाधनों और बड़ी जनसंख्या के बावजूद भारत इस चुनौती का दृढ़ता व एकजुटता से मुकाबला कर रहा है। 21 दिन का लॉकडाउन की स्थिति पहली बार अनुभव में आई है। घरों में बंद लोगों में थोड़ी बेचैनी स्वाभाविक है। लोग अपने मानसिक स्वास्थ्य को कैसे बेहतर रख सकते हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के देशवासियों को प्रोत्साहित व उत्साहित करने वाले उपाय कितने कारगर हैं, इस पर देश के जाने माने मनोचिकित्सक डॉ. समीर पारेख से बात की अजय विद्युत  ने।  प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश-

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घरों में इतने दिन बंद होने का अनुभव कभी नहीं रहा। लोगों में थोड़ी बेचैनी और तनाव के लक्षण दिखने लगे हैं ?
कोई भी ऐसी चीज जो अचानक होती है और जिसके लिए हम पहले से तैयार नहीं होते-हमें तनाव देती है। अभी की स्थिति तो और जटिल है। हमें अपने और अपने प्रियजनों को लेकर बीमारी का तनाव है। आर्थिक चिंता भी है कि आगे हमारे नौकरी-रोजगार का क्या होगा, पैसे कैसे आएंगे वगैरह। अचानक हमारी जीवन लाइफ स्टाइल में भी बदलाव आ गया है। स्वाभाविक है यह स्थिति हमें तनाव देगी और ऐसा सभी के साथ होगा। हां, अपने-अपने व्यक्तित्व, परिस्थिति और पृष्ठभूमि के लिहाज से यह तनाव किसी को कम और किसी को ज्यादा हो सकता है। हमें वास्तविकता को स्वीकारना होगा। समझना होगा कि इस समय का तनाव सामान्य है, थोड़ी देर के लिए है...और अगर 80 साल के जीवन में 20-25 दिन हमें कुछ अलग ढंग से गुजारने पड़ रहे हैं तो यह हम क्यों कर रहे हैं ? इसलिए कि हम अपना, अपने परिवार, बच्चों-बुजुर्गांे का ध्यान रख सकें। हमारे लिए जरूरी है कि जो भी हो रहा है उसे हम सकारात्मक तरीके से समझें, अपनी सामूहिक जिम्मेदारी को समझें और सामूहिक प्रयत्न करें।
क्या करें कि बोरियत, निराशा का तमस न जकड़े ?
अपना दिन अच्छी तरह से बिताएं। कुछ समय काम में लगाएं, कुछ समय परिवार के साथ गपशप करें, बुजुर्गांे के साथ बात करें। बच्चों के साथ खेल खेलें, टीवी देखें, अपनी पसंद का संगीत सुनें। कोई पुस्तक पढ़ सकते हैं, जिसे आप पढ़ना तो चाहते थे लेकिन व्यस्तता के चलते नहीं पढ़ पा रहे थे। परिवार के साथ ताश, लूडो, कैरम, अंताक्षरी या अन्य खेल खेल सकते हैं। घर के कामकाज में एक-दूसरे की मदद करें। कोई ऐसा शौक जिसके लिए अभी तक समय नहीं मिला उसे पूरा कर सकते हैं। जरा स्मृति पर जोर डालिए, ऐसे कई रिश्तेदार, मित्र होंगे जिनके सालों से हालचाल नहीं लिए...उनको फोन कर सकते हैं। जो अंतरंग रहे हों उनको वीडियो कॉल कीजिए। ये सारी चीजें हमें व्यस्त रखती, अकेलापन दूर करती, निराशा से बचाती और जीवन में सकारात्मकता लाती हैं। आप जितना सकारात्मक रहेंगे उतना ही आपका जीवन बेहतर चलेगा। लॉकडाउन के इस समय में आप परेशान न हों। मुख्य बात हमें यह समझ लेना है कि इस समय जिन समस्याओं का सामना हम कर रहे हैं, दुुनिया में सभी लोग उनका सामना कर रहे हैं। यह केवल मेरे या आपके अकेले के साथ नहीं हो रहा है। थोड़ा समय, संवेदनशीलता और विश्रांति (रिलैक्सेशन) से हम निराशा और ऊब से बाहर निकल सकते हैं। कुछ समय व्यस्त रह लेते हैं। अध्यात्म, योग, प्राणायाम कर लिया, रामायण सीरियल देख लिया। फिर खाली बैठते ही आशंकाएं आ धमकती हैं। ऐसे समय में तमाम किस्म के भय और आशंकाएं हमें घेर लेती । डिप्रेशन यानी अवसाद का असर हम सब पर है। अपने-अपने हालात के अनुसार कम या ज्यादा होगा- यह स्वाभाविक है। लेकिन यह सोचते ही आप काफी हद तक इससे उबर जाते हैं कि अभी मेरा यही कर्तव्य है कि मैं अपनी संवेदनशीलता, परिवार के प्रति जिम्मेदारी और अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को निभाऊं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पांच अप्रैल को रात 9 बजे 9 मिनट तक घर के दरवाजे या बालकनी में खड़े होकर मोमबत्ती, दीया, टार्च या मोबाइल की फ्लैश लाइट जलाने का आह्वान कितना कारगर कदम रहा ?
मैंने इसी विषय पर एक कार्यशाला भी ली। उसमें मैंने यही कहा कि अगर हम सारे लोग एक समय पर एक ही चीज करते हैं तो उसका प्रभाव होता कि हम सबको लगता है कि हम साथ में हैं। कोई अकेला नहीं है। इससे एक दूसरे के प्रति हमारा जुड़ाव बढ़ता है। जब हमें लगता है कि हम सब साथ हैं तो इससे एक नई सकारात्मकता और जोश आता है। एक लड़ाई को लड़ने में व्यक्ति और समाज के मनोविज्ञान में अभूतपूर्व निश्चिंतता और दृढ़ता आती है। एक दीया हमें निराशा, नकारात्मकता के अंधेरे से बाहर निकालता है। और 130 करोड़ दीयों का एक साथ जलना-विज्ञान की भाषा में कहें तो सेल्फ साइकोलॉजी, सोशल साइकोलॉजी और कलेक्टेड साइकोलॉजी का एक अनुपम उदाहरण है। प्रधानमंत्री ने स्वयं इसे 130 करोड़ देशवासियों की महाशक्ति का जागरण बताया। हम देखें कि हममें नकारात्मकता कब आती है ? जब हमें लगता है कि हम अकेले हैं और हमारे साथ कुछ खराब होने वाला है। जैसे ही हमें लगता है हम इतने सारे लोग एक साथ जुड़े हुए हैं तो यह ‘खराब लगने’ वाला भाव गायब हो जाता है और उसके स्थान पर ‘एकजुट’ होने वाला भाव आ जाता है। इससे प्रोत्साहन आता है और हम सकारात्मक महसूस करते हैं। यह बहुत जरूरी था। इसने देशवसियों को प्रोत्साहित और एक दूसरे से संबद्ध कर कोरोना से लड़ाई में एक अलग स्तर के उत्साह का संचार किया है।