देश को अराजकता की ओर धकेलने का षड्यंत्र
   दिनांक 07-अप्रैल-2020
तब्लीगी जमात की हरकतों से पूरा देश चिंतित है, लेकिन मीडिया का एक बड़ा वर्ग उसका बचाव कर रहा है। आजतक समेत कई मीडिया घरानों ने झूठ फैलाया कि मरकज से लोगों को निकालने के लिए पुलिस को बहुत पहले अर्जी दी गई थी, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। जबकि सारा सच सबूतों के साथ सामने आ चुका था

markaz_1  H x W
चायनीज वायरस के साथ देश में अराजकता फैलाने का प्रयास अलग स्तर तक पहुंच चुका है। देसी-विदेशी समाचार माध्यमों से गलत सूचनाओं का चौतरफा हमला जारी है ताकि लोगों में भ्रम व डर फैलाया जा सके। साथ ही, सरकार पर भी दबाव बने और वह एक ‘लॉबी’ के मनमुताबिक काम करने को मजबूर हो जाए। इसके कुछ लक्षण स्पष्ट देखे जा सकते हैं। पहला, मीडिया का एक वर्ग वायरस के भावी फैलाव को लेकर तरह-तरह की कयासबाजी कर रहा है। दूसरा, यह बात भी फैलाई जा रही है कि भारत में जांच सुविधाओं की भारी कमी है। तीसरा, संकट काल में जो बातें करोड़ों भारतीयों का मनोबल ऊंचा बनाए रखने में सहायक हो सकती हैं, उनका भी विरोध किया जा रहा है। हो सकता है कि मीडिया के जरिए लोगों तक जो पहुंचाया जा रहा है, उसके पीछे कुछ स्?वार्थी तत्?व हों। अत: सूचनाओं के कुचक्र को समझना जरूरी है।
बीमारी के फैलाव पर भविष्यवाणी
कुछ दिन पहले एनडीटीवी ने जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के हवाले से दावा किया था कि अप्रैल-मई तक भारत में 25 करोड़ लोग कोरोना वायरस से संक्रमित होंगे। इसकी पड़ताल करने पर पता चला कि जॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी ने ऐसा कोई अध्ययन ही नहीं किया। इसी तरह ‘द क्विंट’ ने झूठ फैलाया कि भारत में महामारी तीसरे चरण में पहुंच चुकी है। यह क्रम अब पत्रिका ‘द वीक’ तक चुका है, जिसका दावा है कि भारत में जल्द ही 30-50 करोड़ लोग चाइनीज महामारी की चपेट में होंगे। पत्रिका की राय में भारत में 20 लाख लोग इससे मर सकते हैं। फिर बड़ी सफाई से पूरे मामले को अनुसूचित जातियों पर अत्याचार की घटनाओं से जोड़ दिया गया। ऐसी ही कोशिश नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के दौरान भी दिखी थी, जब अनुसूचित जातियों के बीच यह अफवाह फैलाने का प्रयास किया गया कि इस कानून से उनकी नागरिकता छिन जाएगी।
सरकारी प्रयासों पर पानी फेरने का खेल
एक ओर लोगों को डराने की कोशिश हो रही है, दूसरी ओर सरकार द्वारा वायरस के संक्रमण को नियंत्रित रखने के लिए किए प्रयास जा रहे प्रयासों को विफल करने की कोशिश चल रही है। तब्लीगी जमात की हरकतों से पूरा देश चिंतित है, लेकिन मीडिया का एक बड़ा वर्ग उसके बचाव में उतर आया है। आजतक समेत कई मीडिया घरानों ने झूठ फैलाया कि मरकज में रह रहे लोगों को निकालने के लिए दिल्ली पुलिस को बहुत पहले अर्जी दी गई थी, लेकिन पुलिस ने कुछ नहीं किया। जबकि सारा सच सबूतों के साथ सामने आ चुका था। कांग्रेस नेता के चैनल ‘न्यूज 24’ ने तो इस घटना को हिंदू मंदिरों से जोड़ने का घृणित प्रयास शुरू कर दिया। ‘वैष्णो देवी मंदिर में 400 भक्तों के होने’ और ‘रामनवमी पर मंदिरों में भारी भीड़’ जैसी फर्जी खबरों की बाढ़ सी आ गई। फर्जी खबरें फैलाने में पीटीआई, इंडिया टुडे और इंडियन एक्सप्रेस जैसे बड़े मीडिया घराने शामिल थे। इस तरह की झूठी खबरें जानबूझ कर फैलाई गईं ताकि आम मुसलमानों के मन में डाला जा सके कि उन्हें मस्जिद में जाने से रोककर प्रशासन उनके साथ अन्याय कर रहा है। सोशल मीडिया न होता तो ऐसी ढेरों अफवाहें सच मान भी ली जातीं।
चिकित्सा सुविधाओं की कमी का रोना
बेशक भार में चिकित्सा सुविधाओं की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। कुछ इलाकों तक तो प्राथमिक चिकित्सा भाी नहीं पहुंची है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में सुधार एक सतत प्रक्रिया है, जिस पर सरकारें काम करती रहती हैं। लेकिन जब अचानक यह दबाव बनाया जाता है कि जांच किट कम है, तो संदेह होता है कि कहीं किसी कंपनी की ओर से ऐसा तो नहीं कहा जा रहा। भारत में संक्रमण के अब तक जितने भी संदिग्ध मामले आए, उनकी जांच की गई है। साथ ही, जांच किट बनाने के काम में भी तेजी आई है। फिर भी अचानक इसकी कृत्रिम आवश्यकता पैदा करने के प्रयास भी दिखाई दे रहे हैं। यह सबको पता है कि दुनिया भर में ऐसे जांच किटकेवल चीन बेच रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि आपदा की इस चीनी जांच किट की मार्केटिंग की जा रही है? कई यूरोपीय देश, नेपाल और श्रीलंका चीन से जांच किट खरीद कर पछता रहे हैं। इसी तरह, वेंटिलेटर के नाम पर भी गलत सूचनाएं फैलाई जा रही हैं। दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है, जहां हर व्यक्ति के लिए वेंटिलेटर की व्यवस्था हो। जरूरत के हिसाब से सरकार इसकी खरीदारी कर रही है, लेकिन दबाव बनाने का तरीका आशंकाएंपैदा करती हैं।
भारतीयों का मनोबल तोड़ने का षड्यंत्र
पूरे देश में लगभग दो हफ्ते से लोग अपने घरों में बंद हैं। अधिकांश लोग इस लॉकडाउन में सहयोग कर रहे हैं। करोड़ों लोगों के समक्ष खाने का संकट है। काफी लोग रोजगार और चिकित्सा जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। ऐसी स्थिति में देशवासी, सामाजिक संस्थाएं और राज्य सरकारें अपनी क्षमता के हिसाब से हर व्यक्ति की सहायता करने की कोशिश कर रही हैं। संकट की घड़ी में मनोबल बनाए रखना पड़ता है, नहीं तो काफी संख्या में लोग भय और हताश में डूब सकते हैं। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने दूरदर्शन पर रामायण, महाभारत जैसे कई लोकप्रिय धारावाहिक शुरू करवाए हैं। लेकिन मीडिया का एक वर्ग ऐसे हर प्रयास की खिल्ली उड़ाने में जुटा है। जब स्वास्थ्य और सेवा कर्मियों के लिए करोड़ों लोगों ने ताली बजाई तो उसे अंधविश्वास करार देने की कोशिश हुई। इसी तरह, रात 9 बजे 9 मिनट के लिए घर की बिजली बंद करके प्रकाश पर्व की मनाने की अपील पर भी ऐसे हंगामा मचाया गया, मानो कोई आफत आ जाएगी। मीडिया एक एक वर्ग ने फर्जी खबर फैलाई कि ऐसा करने से पावर ग्रिड काम करना बंद कर सकते हैं। ये सारे प्रयास हास्यास्पद हैं, लेकिन ऐसे नाजुक मौकों पर इनके परिणाम खराब भी हो सकते हैं। यह जनता की भी जिम्मेदारी है कि वह ऐसे निराशावादी पत्रकारों, मीडिया समूहों की पहचान करे और उनके छिपे हुए एजेंडे को उजागर करे।
सोशल मीडिया की सहायता से लोग यह काम बखूबी कर भी रहे हैं।
मीडिया की ‘पॉकेट संस्थाओं’ का विचित्र रवैया
पूर्ण तालाबंदी के बाद दिल्ली से लाखों लोगों के पलायन पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई हुई। इसमें पाया गया कि इसके पीछे समाचार माध्यमों का भी बड़ा हाथ था। भ्रामक खबरें फैलाई गईं, जिससे लोगों में भय का माहौल बना। अपने रवैये को सुधारने के बजाय मीडिया इसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना रहा है। कांग्रेस के लिए निष्ठावान संपादकों के समूह एडिटर्स गिल्ड आॅफ इंडिया ने तो बाकायदा बयान जारी करके सर्वोच्च न्यायालय की इस नसीहत का विरोध किया कि ‘कोरोना वायरस को लेकर समाचार केवल सरकार से औपचारिक पुष्टि और प्रमाणीकरण के बाद ही चलाए जाएं।’ एडिटर्स गिल्ड में ज्यादातर ऐसे पत्रकार हैं, जो खुद फर्जी खबरें फैलाने के लिए कुख्यात हैं। उन्हें देश की सर्वोच्च न्यायालय का निर्देश भी अपनी अभिव्यक्ति का हनन लग रहा है। ऐसे समय में जब देश एक बड़े संकट से गुजर रहा है, करोड़ों लोगों की रोजी-रोटी और जीवन खतरे में है, मीडिया का बड़ा वर्ग सहयोग करने के बजाय टकराव चाहता है। इसीलिए इस समय न्यूयॉर्क टाइम्स में एक रिपोर्ट छपवाकर दावा किया गया कि मोदी सरकार के तहत भारत में मीडिया की स्वतंत्रता का गला घोंटा जा रहा है। इस रिपोर्ट में सारी वही बातें हैं जो मीडिया के ये स्वयंभू पिछले छह साल से बोल और लिख रहे हैं। संभवत: यह समय उन्होंने देश और सरकार को ब्लैकमेल करने के लिए चुना है।
एक राष्ट्रीय आपदा के समय ऐसा उद्दंड व्यवहार चिंताजनक है। इन्हीं कारणों से अधिकांश लोगों की नजर में मीडिया का यह तथाकथित निष्पक्ष वर्ग अपनी विश्वसनीयता खो चुका है। अगर कुछ लोग यह सोचते हैं कि झूठी खबरें उड़ाना और चीन के हितों की बात करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में आता है, तो वे इसे भूल जाएं। सरकार और सरकारी एजेंसियां तो बहुत बाद में आती हैं। पहले उन्हें करोड़ों आम भारतीयों का सामना करना होगा, जो सूचनाओं के इस अनैतिक हमले में प्रथम रक्षा पंक्ति की तरह खड़ी है। उनके पास सोशल मीडिया का जरिया है जिससे वे हर झूठ और नैरेटिव को ध्वस्त करने में सक्षम हैं। भारत न सिर्फ़ इस महामारी को हराएगा, बल्कि महामारी को लेकर अफवाहों को भी परास्त करके दिखाएगा।