ये भारत है हमें आविष्कार करने में समय नहीं लगता
   दिनांक 07-अप्रैल-2020
जब –जब समय ने पुकारा, भारत की प्रतिभा ने उत्तर दिया. परम सुपर कंप्यूटर, क्रायोजेनिक इंजन, मंगलयान, चंद्रयान... कोरोना की चुनौती का भी ऐसा ही उत्तर दे रहा है देश का उर्वर मस्तिष्क.

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जब देश में कोरोना के मामले आने शुरू हुए, और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से डराने वाले समाचार आने लगे तब भारत के सामने अनेक प्रश्न खड़े थे. कोरोना के सामने इटली जैसे श्रेष्ठ स्वास्थ्य तंत्र लडखडा रहे थे. इटली के पास था बेहतर आधारभूत ढांचा, ज्यादा अच्छी सैनिटेशन व्यवस्थाएं और महज़ 6 करोड़ की जनसंख्या. लेकिन इटली का तंत्र कोरोना के आगे चरमरा गया. भारत में आबादी 136 करोड़ है, और स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियों से हम सब परिचित हैं. आशंका मन को सुलगा रही थी कि यदि भारत में कोरोना बड़े पैमाने पर फैला तो करोड़ों की संख्या में कोरोना टेस्ट किट, कई लाख वेंटिलेटर, लाखों बिस्तर और बीमार लोगों को एकांत में रखने के लिए आइसोलेशन चैम्बर्स (एकांत कक्ष) उपलब्ध करवाना एक गंभीर समस्या बन सकती थी. ऐसे में अनेक प्रतिभाएं, संस्थान और उद्योगजगत की हस्तियां आगे आईं और देश को कुछ राहत भरी ख़बरें सुनने को मिलीं.
साढ़े चार हजार का परीक्षण किट 12 रुपए में

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पुणे की मायलैब डिस्कवरी के वैज्ञानिकों ने डॉ मीनल दखावे के नेतृत्व में स्वदेशी कोरोना परीक्षण किट बना ली है. इस स्वदेशी किट की कीमत 12 सौ रुपए है, और एक किट से सौ लोगों का परीक्षण हो सकता है. यानी एक परीक्षण 12 रुपए में पड़ेगा. ये किट ढाई घंटे में परिणाम दे देती है, जबकि विदेश से आयात की जा रही साढ़े चार हजार की किट 6 से 7 घंटे लेती है. हर सप्ताह एक लाख किट तैयार की जा सकेंगी. आवश्यकता पड़ने पर उत्पादन को और भी तेज किया जा सकता है. मीनल दखावे ने 18 मार्च को इस किट को बनाकर मूल्यांकन के लिए नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ वाइरॉलजी को भेजा और अगले दिन 19 मार्च को एक बेटी को जन्म दिया. 23 मार्च को सीडीएससीओ (सेंट्रल ड्रग्स स्टैंडर्ड कंट्रोल आर्गेनाइजेशन) ने इस किट के व्यसायिक उत्पादन को हरी झंडी दे दी. जब दुनिया चीन में बने परीक्षण किट को केवल 30 प्रतिशत गुणवता का बतलाकर अस्वीकार कर रही है, तब ये स्वदेशी किट 100 प्रतिशत संवेदनशीलता से परिणाम दे रही है.
“जीवन” मिला सांस को

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भारत में यदि कोरोना का कम्युनिटी ट्रांसमिशन शुरू हो गया तो एक अनुमान के मुताबिक़ मई 15 तक सवा दो लाख वेंटिलेटर चाहिए होंगे, लेकिन देश में लगभग 47 हजार वेंटिलेटर उपलब्ध हैं, जिनमे से ज्यादातर पहले से ही उपयोग में हैं. सारी दुनिया में वेंटिलेटर की कमी है. और एक वेंटिलेटर 8 से 12 लाख तक का पड़ता है. ऐसे में भारतीय रेलवे ने देश को बड़ा सहारा दिया, और चंद ही दिनों में 10 हजार कीमत का वेंटिलेटर बनाकर दे दिया. वर्तमान में रेलवे प्रतिदिन 100 वेंटिलेटर का उत्पादन करने की स्थिति में है. इसे “जीवन” नाम दिया गया है. उधर भारत के ऑटोमोबाइल दिग्गज मारुती सुजुकी और महिंद्रा एंड महिंद्रा भी मिलकर सस्ते वेंटिलेटर बनाकर देश को उपलब्ध करवाने के लिए काम प्रारंभ कर चुके हैं.
भारतीयों के “जुगाड़” को लेकर बहुत मजेदार किस्से और सोशल मीडिया मीम्स बनते हैं. नागपुर के डॉ आनंद संचेती ने सहजबोध याने कॉमनसेंस का उयोग किया और वेंटिलेटरों की कमी देखते हुए वेंटिलेटर स्प्लिटर (विभाजक) बना डाला. युक्ति ये कि एक वेंटिलेटर में स्प्लिटर की मदद से चार नलियों को जोड़कर चार मरीजों को सांस दी जाए. दरअसल एक मरीज वेंटिलेटर की 20 से 30 प्रतिशत क्षमता का ही उपयोग करता है. एक वेंटिलेटर 280 किलोग्राम के व्यक्ति को 2 हजार मिलीलीटर ऑक्सीजन प्रति मिनिट देने की क्षमता रखता है. एक व्यक्ति का औसत वजन यदि 70 किलोग्राम माना जाए तो एक वेंटिलेटर चार लोगों के लिए पर्याप्त है. इसी गणित का उपयोग करके आनंद संचेती ने साधारण से प्लास्टिक स्प्लिटर से ये शानदार “जुगाड़” तैयार कर लिया. इनका निर्माण करके अन्य अस्पतालों को भी आपूर्ति प्रारंभ हो गई है. जब ये समाचार फैला तो चंडीगढ़ के यूसीआरडी विश्वविद्यालय ने थ्रीडी प्रिंटर से इन स्प्लिटर का निर्माण प्रारंभ कर दिया.
रेलवे कोच बने रोगियों का आसरा

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आइसोलेशन वार्ड कोरोना के इलाज के लिए बहुत आवश्यक संसाधन है, क्योंकि ये बेहद संक्रामक बीमारी है. अस्पतालों में पहले से भर्ती मरीजों को भी इस बीमारी से बचाकर रखना एक गंभीर समस्या है. इसके लिए रेलवे मंत्रालय ने पहल की और रेलवे के खाली कोचों को आइसोलेशन वार्ड में बदलने के मुहिम प्रारंभ की. 2500 कोच आइसोलेशन वार्ड में बदल भी चुके हैं. अर्थात 40 हजार मरीजों के लिए आइसोलेशन बेड तैयार हैं. अन्य 2500 कोच याने अगले 40 हजार पर कार्य जारी है. प्रतिदिन 375 कोच आइसोलेशन वार्ड में बदले जा रहे हैं. देश में 133 स्थानों पर ये काम जारी है.
कार्मीबोट : काम पर रोबोट

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महामारी की स्थिति में कोरोना मरीजों की देखभाल में दो चुनौतियां हैं. एक इतना मानव संसाधन याने प्रशिक्षित नर्स व अन्य स्टाफ, दूसरा संक्रमण का ख़तरा. हर बार मरीज के पास जाने के लिए पूरे सुरक्षा उपाय करने होते हैं. और मरीज जब तब्लीगियों जैसे हों तो कहना ही क्या. ऐसे में केरल के एक स्टार्टअप ने एक रोबोट उपलब्ध करवाया है जो मरीजों को खाना, पानी और दवाई आदि देता रहे. असिमोव रोबोटिक्स ने इस रोबोट को कार्मीबोट नाम दिया है. यह रोबोट स्वयं को सैनेटाइज़ भी करता है. इसमें वीडियो कांफ्रेंसिंग की सुविधा भी है, जिससे चिकित्सक, नर्स आदि मरीज से बात कर सकते हैं. केरल का ही एक और स्टार्टअप शरीर का ताप मापने के लिए एक स्वचालित स्कैनर बना रहा है. इससे सार्वजनिक स्थानों पर एक-एक व्यक्ति का ताप परीक्षण करने के लिए व्यक्ति तैनात करने की आवश्यकता नहीं रहेगी. यह स्कैनर घूम-घूमकर लोगों के शरीर के ताप को स्कैन करता रहेगा और सामान्य से ज्यादा ताप मिलने पर नियंत्रण कक्ष को सूचना भेजेगा. नियंत्रण कक्ष से बैठकर इसका संचालन हो सकेगा.
इस बीच भारत सरकार और देश के अलग-अलग संस्थानों ने अनेक एप लांच कर दिए हैं जिनसे कोरोना से लड़ने के लिए देशवासियों को सचेत और प्रशिक्षित किया जा सके.
मास्क, सैनेटाइज़र और दवा उद्योग ने खोले नए आयाम
जब मास्क को लेकर मारामारी और उपयोग किए गए मास्क को फेंकने से कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका से भरे समाचार आ रहे थे तब योगी आदित्यनाथ सरकार ने तीन तहों वाले 66 करोड़ ‘खादी’ मास्क बनाने का आदेश दिया. ये मास्क गरीबों के लिए निशुल्क होंगे, शेष नागरिक इन्हें अत्यंत सस्ते में खरीद सकेंगे. इन्हें धोकर बार-बार उपयोग किया जा सकेगा. महिलाओं के लिए सैनिटरी पैड (प्रतिदिन 50 हजार) बनाने वाली सुहानी मोहन ने मास्क का अध्ययन किया और पाया कि मास्क और सैनिटरी पैड बनाने का तरीका एक सा है. अब समस्या थी लॉकडाउन के कारण हुई संसाधनों की कमी को कैसे पूरा किया जाए. सुहानी ने आनंद महिंद्रा को ईमेल करके सहायता माँगी. कुछ ही घंटों में महिंद्रा का जवाब आ गया. महिंद्रा ने सुहानी को उनका कांदीवली प्लांट उपयोग करने का प्रस्ताव भी दे दिया. कुछ ही दिनों में कांदीवली प्लांट मास्क उत्पादन करने लगा.
जब सैनेटाइज़र की सब तरफ कमी हो गई तो बाबा रामदेव ने एक वीडियो जारी करके घर पर सैनेटाइज़र कैसे बना सकते हैं, देशवासियों को सिखाया. इस लड़ाई में भारत का दवा उद्योग भी पीछे नहीं है, और भारत के साथसाथ दुनिया की भी जरूरतें पूरी कर रहा है. एशिया, अफ्रीका, अमेरिका और यूरोप में भारत से दवाओं का निर्यात होता है. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने प्रधानमंत्री को फोन करके हाइड्राक्सीक्लोरोक्विन दवा भेजने का अनुरोध किया जिसे मोदी ने स्वीकार किया.
जब जब समय ने पुकारा

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जब –जब समय ने पुकारा, भारत की प्रतिभा ने उत्तर दिया . जब देश को सुपर कंप्यूटर की ज़रुरत पड़ी और अमेरिका के जॉर्ज डब्ल्यू बुश प्रशासन ने भारत को सुपर कंप्यूटर हासिल करने से यह कहकर रोक लगवा दी कि भारत उसका उपयोग परमाणु हथियार विकसित करने में कर सकता है, तब देश के वैज्ञानिकों ने मात्र 3 वर्षों में सुपर कंप्यूटर परम विकसित करके दिखा दिया. भारत का ये सुपर कम्प्यूटर इतना उम्दा था कि 1990 में ज्यूरिख के सुपर कम्प्यूटिंग दुनिया के अधिकांश विकसित देशों के सुपर कंप्यूटरों को पछाड़कर दूसरे स्थान पर रहा. प्रथम अमेरिका था.1991 में रूस ने भारत से करार करके आईसीएडी मॉस्को में इसका प्रतिरूप लगवाया. आज भारत दुनिया में 50 से अधिक सुपर कम्प्यूटर बेच चुका है. इसके खरीददारों में रूस, सिंगापुर, जर्मनी और कनाडा जैसे देश शामिल हैं. अंतरिक्ष मिशन के लिए भारत को शक्तिशाली क्रायोजेनिक इंजन की आवश्यकता थी. एक बार फिर अमेरिकी प्रतिबंध बाधा बना क्योंकि इस इंजन का इस्तेमाल अंतरमहाद्वीपीय मिसाइल बनाने के लिए हो सकता है. भारत के वैज्ञानिकों ने दिन-रात मेहनत करके अपना स्वयं का क्रायोजेनिक इंजन बना लिया. चंद्रयान और मंगलयान की कहानी सबके ध्यान में है ही.
दुनिया का पहला सार्वजनिक माइक्रोवेव संचार डॉ जगदीश चंद्र बासु ने कोलकाता में करके दिखाया था. आज दुनिया में संचार क्रांति को रॉकेट की गति से आगे बढ़ा रहा फाइबर ऑप्टिक्स डॉ नरेंदर सिंह कपानी का अविष्कार है. सूची बहुत लंबी है, और देश को आगे बढ़ने का आत्मविश्वास दिलाती है. जैसा कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा है कि “न थकना है, न उदास होना है. सिर्फ जीतना है.”