कोरोना महामारी: तब्लीगी जमात पर सवाल को ममता ने बताया सांप्रदायिक
   दिनांक 08-अप्रैल-2020
जब देशभर में सर्वाधिक केस तब्लीगी जमात से जुड़े हैं, तब ममता बनर्जी ने इससे जुड़े सवाल को ही सांप्रदायिक करार दे दिया है। वो यह बताने को तैयार नहीं हैं कि पश्चिम बंगाल में तब्लीगी जमात से जुड़े कितने लोग हैं और उनके चीनी वायरस के टेस्ट की क्या स्थिति है ?

mamta _1  H x W
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तुष्टीकरण की राजनीति चीनी वायरस (कोरोना) को लेकर भी जारी है। ममता बनर्जी न तो राज्य में संक्रमितों के सही आंकड़े बता रही हैं और न ही तब्लीगी जमात से जुड़े लोगों को लेकर कोई जानकारी दे रही हैं। जब देशभर में सर्वाधिक केस तब्लीगी जमात से जुड़े हैं, तब ममता बनर्जी ने इससे जुड़े सवाल को ही सांप्रदायिक करार दे दिया है। वो यह बताने को तैयार नहीं हैं कि पश्चिम बंगाल में तब्लीगी जमात से जुड़े कितने लोग हैं और उनके चीनी वायरस के टेस्ट की क्या स्थिति है? पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री जिस तरह से स्थिति पर रहस्य का पर्दा डाल रही हैं, उससे स्पष्ट हो गया है कि राज्य में हालात विस्फोटक हो सकते हैं।
दिल्ली की निजामुद्दीन मरकस से निकले 2100 से ज्यादा तब्लीगी जमाती अब तक देश के विभिन्न राज्यों में चीनी वायरस से संक्रमित मिल चुके हैं। तब्लीगी जमातियों से जुड़े 25 हजार से ज्यादा लोगों को या तो क्वारंटाइन किया गया है या फिर होम आइसोलेशन में रखा गया था। तमिलनाडु, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड समेत 19 राज्यों में ये जमाती फैले थे। पश्चिम बंगाल में भी ये बड़ी तादाद में हो सकते हैं, लेकिन पश्चिम बंगाल की सरकार इनकी संख्या केवल 73 बता रही है। ममता बनर्जी का रवैया सहयोग का नहीं है। दुनिया में जिस चीनी वायरस से हाहाकार मचा हुआ है, उसकी गंभीरता को समझने के बजाय ममता का ध्यान राजनीति पर लगा हुआ है। उन्हें डर सता रहा है कि कहीं तब्लीगी जमात से जुड़े आंकड़े उनके मुस्लिम वोट बैंक को नाराज न कर दें।
दरअसल, ममता बनर्जी की राजनीति की धुरी मुस्लिम तुष्टीकरण पर टिकी हुई है। वो मुस्लिम वोट बैंक को लुभाने का कोई अवसर नहीं छोड़ती हैं। पश्चिम बंगाल में जब से ममता बनर्जी की सरकार बनी है, तभी से वो राज्य के करीब 28 प्रतिशत मुस्लिम वोटर्स को लुभाती चली आ रही हैं। वो वोट बैंक की राजनीति के लिए किसी भी हद तक जा सकती हैं। ममता बनर्जी ने साल 2011 में वामपंथी सरकार को हटाकर राज्य की सत्ता पर कब्जा किया था। तब आशा यह बनी थी कि वामपंथियों ने राज्य को जिस जर्जर स्थिति में पहुंचाया है, उससे ममता बनर्जी उबारेंगी। लेकिन, तुष्टीकरण की राजनीति में ममता वामपंथियों से दो कदम आगे निकल गईं। वो मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने में जुट गईं। साल 2012 से वो राज्य के इमामों और मुअज्जिनों को 2500 और 30 हजार रुपए प्रतिमाह वेतन देती आ रही हैं। उन्होंने इमामों को घर बनाने के लिए जमीन देने का ऐलान किया था।
मुस्लिम वोटर्स को खुश करने के लिए ममता बनर्जी नागरिक संशोधन कानून (सीएए), राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (एनआरसी) और राष्ट्रीय जनसंख्या रजिस्टर (एनपीआर) के विरोध में खुद सड़कों पर उतर गईं थीं। उन्होंने सीएए को लेकर विधानसभा में प्रस्ताव पारित कराया और एनपीआर को लेकर दिल्ली में हुई बैठक में शामिल नहीं हुई थीं।
जहां एक ओर ममता बनर्जी मुस्लिमों को खुश करने में जुटी रहती हैं, वहीं हिंदुओं से घृणा का कोई अवसर छोड़ती नहीं हैं। हिंदुओं के प्रति ममता की दुर्भावना का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने राज्य के पाठ्यक्रम में रामधनु (इंद्रधनुष) को रंगधनु करा दिया, क्योंकि उन्हें राम नाम पर आपत्ति है। पश्चिम बंगाल में इंद्रधनुष रामधनु के नाम से ही प्रचलित है। पूर्व में कई बार ममता बनर्जी ने राज्य में रामनवमी, दशहरा जैसे हिंदू पर्वों पर कार्यक्रमों को अनुमति नहीं दी है। बीमभूम जिले के कांगलापहाड़ी गांव में जिला प्रशासन ने दुर्गा पूजा पर इसलिए पाबंदी लगा दी थी कि वहां के 25 मुस्लिम परिवारों को इस पर आपत्ति थी, जबकि गांव में हिंदू परिवारों की संख्या 300 के आसपास थी। ऐसे ढेरों उदाहरण हैं।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत कांग्रेस पार्टी से की थी, लेकिन अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षों के चलते उन्होंने कांग्रेस से अलग होकर अपनी खुद की पार्टी बना ली। कभी राजग का हिस्सा और अटल सरकार में रेल मंत्री रहीं ममता बनर्जी को अब सर्वाधिक खतरा भाजपा से लग रहा है। पश्चिम बंगाल में भाजपा के बढ़ते ग्राफ ने ममता की नींद उड़ा दी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में ममता को भाजपा ने कड़ी टक्कर दी थी। राज्य की 42 लोकसभा सीटों में से ममता की तृणमूल कांग्रेस 22 सीटें जीत पाई थी, जबकि 2014 में उसके पास 34 सीटें थीं। भाजपा ने 18 सीटों पर कब्जा जमाया था, जबकि 2014 में पार्टी ने केवल 2 सीटों पर विजय पाई थी।
पश्चिम बंगाल में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ममता बनर्जी को केवल मुस्लिम वोटों का सहारा है। वो किसी भी सूरत में मुस्लिम वोटों को अपने पाले से छिटकने नहीं देना चाहती हैं, भले संकट चीनी वायरस का खतरा ही क्यों न हो? सत्ता में बने रहने के लोभ और वोटों की राजनीति ने ममता बनर्जी की आंखों पर पट्टी बांध दी है। मुस्लिमों के प्रति अंध प्रेम के चलते जिस तरह से ममता चीनी वायरस (कोरोना) के आंकड़ों को छिपाने की कोशिश कर रही हैं, उसके लिए देश की जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी।