भारतीय जीवनशैली को अपनाकर जिया जा सकता है सुखी जीवन
   दिनांक 08-अप्रैल-2020
निधि मिश्रा
हिन्दू संस्कृति की परंपराएं वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित हैं। ऐसे में उसके अनुसार जीवन व्यतीत करना हर पक्ष से वैज्ञानिकता एवं तार्किकता से परिपूर्ण है। लेकिन आधुनिकीकरण एवं मशीनीकरण ने धरती को बहुत अस्त व्यस्त किया। उसी का परिणाम है कि समय-समय पर दुष्परिणाम के रूप में भयानक महामारियां और त्रासदी हमारे सामने आती हैं

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आज विश्व भर में फैले कोरोना वायरस के कहर ने लोगों को हिन्दू संस्कृति में निहित मान्यताओं की ओर उन्मुख किया है। वे जाने-अनजाने भारतीय संस्कृति से वह सबक ले रहे हैं, जिनके माध्यम से उन्हें लगता है कि वे स्वयं को इस भयानक संक्रमण से बचा सकते हैं। कोरोना के चलते आज स्थितियां ऐसी बनी हैं कि लोग अपने सारे काम छोड़कर घरों में बैठने के लिए मजबूर हुए हैं। प्राथमिक रूप से इसका जो इलाज निकलकर आया है वह है सामाजिक दूरी।
इसके माध्यम से इससे बचा जा सकता है। लेकिन इस दौरान ध्यान देने वाली बात यह है कि कोरोना के डर से लोग जिन नियमों का पालन कर रहे हैं, वे हमें हमारी प्राचीन वैदिक संस्कृति की याद दिलाते हैं। हिन्दू धर्म में परस्पर नमस्ते करने का प्रचलन रहा है। हाथ मिलाना व गले मिलने का कल्चर पश्चिम से आया। सनातन हिन्दू धर्म सादा जीवन, उच्च विचार जैसी मान्यताओं को प्रश्रय देता है। लेकिन पाश्चात्य सभ्यता एवं जीवनशैली की चकाचैंध में लोगों ने अपनी संस्कृति को छोड़कर पश्चिम की संस्कृति को अपनाया था। लोग हाथ जोड़कर नमस्ते करने के बजाए हाथ बढ़ा कर हाथ मिलाने एवं गले लगाने को ज्यादा सभ्य समझने लगे थे। जबकि हाथ जोड़ने के वैज्ञानिक पहलू पर उनका कभी ध्यान नहीं गया। हाथ जोड़कर नमस्ते करने पर जब दोनों हाथ की उंगलियां एक साथ मिलती हैं तब नसों में आपस में एक दबाव बनता है, जो एक्यूपंचर का काम करता है।
इससे स्मरण शक्ति तीव्र होती है तथा यह आंख, नाक एवं कान के लिए भी लाभप्रद होती है। हिन्दू परिवारों में सदैव बाहर से आने के बाद हाथ पैर धो कर ही घर के भीतर घुसने और जमीन पर सुखासन में बैठकर खाने की परंपरा रही है। सुखासन में बैठ कर खाने से पाचन संबंधित परेशानियां कम होती हैं। आज के समय में कोरोना से बचाव के लिए बार-बार साबुन से हाथ धोने की बात की जा रही है। जबकि पहले के समय घरों का निर्माण भी कुछ इस प्रकार होता था कि दरवाजे से घुसते ही नल और पानी की व्यवस्था रहती थी जिससे व्यक्ति हाथ, पैर व मुुंह अच्छे से धोकर ही घर में प्रवेश करता था। लेकिन आज के आधुनिक समाज में कन्क्रीट के जंगल तैयार हो रहे हैं। ऊंची इमारतें की वजह से धूप और शुद्ध हवा की बहुत कम गुंजाइश बची है। आधुनिक जीवनशैली का अनुसरण कर लोग जूते चप्पल पहन कर ही भोजन आदि करने बैठ जाते हैं। हाथ धोने की जगह टिशू का प्रयोग करते हैं। ऐसे में इस तरह की आदतें व्यक्ति को बीमार बनाने के लिए काफी हैं।
यज्ञ-हवन से होती शुद्धि

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शहरों में बढ़ती आबादी के कारण, जहां एक ओर मोटर गाड़ियों की संख्या बढ़ रही है, वहीं तेजी से पेड़ों को काटा जा रहा है। इससे वायु प्रदूषण की दर, साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। जबकि हमारी परंपरा में दैनिक यज्ञ को अत्यधिक महत्व दिया गया है। हवन में आहुति देने के लिए जिस हवन सामग्री का प्रयोग होता है उसमें गुग्गुल, लोबान, कपूर आदि का सम्मिश्रण रहता है जो वातावरण को शुद्ध करने और उसमें उपस्थित हानिकारक कीटाणुओं एवं जीवाणुओं को नष्ट करने में सहायक सिद्ध होता है। पूजा-अर्चना के समय नियमित रूप से घी का दीपक जलाना एवं आरती करना धार्मिक क्रिया के साथ ही वैज्ञानिक तथ्यों की पुष्टि भी करती है। यह प्रक्रिया भी हानिकारक जीवाणुओं को नष्ट करने मंे सहायक होती है। सनातन धर्म में प्रातः एवं सायंकाल मंदिरों तथा घरों में घण्टे और शंख बजाने की परम्परा रही है। ये ध्वनियां वातावरण में उपस्थित अनेकानेक विषाणुओं को खत्म करने में सहायक सिद्ध होती हैं।
रोग प्रतिरोधक क्षमता को जगाने की जरूरत
आज कोरोना वायरस के संक्रमण से लोग भयाक्रांत हैं। पाश्चात्य जीवनशैली से खोखले हो चुके मनुष्य शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता क्षीण सी हो गयी है। भारतीय संस्कृति को भूलकर लोग आधुनिक बनने की होड़ में लगे हुए हैं। जबकि हमारे यहां सूर्योदय पूर्व जागरण के पश्चात स्नान कर, उदय होते सूर्य को जल देने का नियम था। उदित होते सूर्य की किरणों का शरीर पर पड़ना स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। मशीनी जीवनशैली को जीने वाले ज्यादातर लोग या तो सुबह देर से उठते हैं या फिर उठकर योग-व्यायाम करने की अपेक्षा जिमखाना जाना अधिक पसन्द करते हैं। प्रातःकाल खुले वातावरण में बैठ कर योग-व्यायाम एवं ध्यान करने से शरीर, मन, बुद्धि तथा आत्मा की शुद्धि होती है। व्यक्ति स्वस्थ एवं निरोगी रहता है। सकारात्मकता का अनुभव करता है। बन्द जिमखानों में एक ही मशीन पर तमाम लोग पसीना बहाते हैं और अशुद्ध हवा का सेवन करते हैं। इससे कई तरह की बीमारियों और संक्रमण का खतरा पैदा हो जाता है। पश्चिम की ये नकल कितनी नुकसानदायक है ये समझना बहुत आवश्यक है।
( लेखिका दिल्ली विश्वविद्यालय में शोधार्थी है )