मौलाना साद का बयान इस्लाम की शिक्षा के विपरीत
   दिनांक 08-अप्रैल-2020
शीराज़ कुरैशी
मौलाना साद के बयान का विश्लेषण करें तो पाते हैं कि उसका बयान इस्लाम के बुनियादी उसूल के खिलाफ है। खुद पैगम्बर ने भी महामारी में एकांतवास की शिक्षा दी है और ऐसे मौकों पर मस्जिदों में आने पर पाबंदी लगाई हुई थी

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ऐसे में मौलाना साद का का बयान उसकी इस्लाम की कम समझ को दर्शाता है। ऐसे में एक बड़ी साजिश का अंदेशा भी होता है कि कहीं मौलाना साद आडियो की आड़ में भारत में जानबूझकर कोरोना वायरस को तो फैलाना नहीं चाह रहा था ?
आज पूरी दुनिया कोरोना वायरस से लड़ रही है और पूरी इंसानियत पर यह कोरोना वायरस अपना कहर बिना किसी भेदभाव के बरसा रहा है। दुनिया के बडे़-बडे़ देश और महाशक्तियां इस कोराना के आगे लाचार नजर आ रही हैं। ऐसे में सोशल डिस्टेंसिंग ही इससे बचने का एक मात्र उपाय है। इसके लिए पूरी दुनिया ने एक तरीका इजाद किया और वह है अपने आप को अलग-थलग रखना। इसी इसंानियत भरे उपाय का अपने भारत देश में भी खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने टीवी पर आकर एलान किया और हम सब भारतवासियों को 21 दिन अपने-अपने घरों से न निकलने के लिए कहा। उनकी बात देशवासी स्वेच्छा से मान भी रहे हैं, जिसके चलते पूरा भारत बंद है। सिर्फ आपतकालीन सेवाओं को छोड़कर, जिसमें रेल, हवाई जहाज तक सभी कुछ बंद है। सरकारी कार्यालय, बाजार, धार्मिक स्थल भी बंद हैं। यानी यूं कहें कि पूरा भारत बंद है। लेकिन इसी बीच एक खबर आई कि दिल्ली में तब्लीगी जमात के मरकज में करीब 2 हजार से ज्यादा लोग एकत्र हुए और उसमें कोरोना वायरस के संदिग्ध भी थे, जिसमें विदेशी भी।
मौलाना ने किया भ्रमित
एक आडियो क्लिप में मरकज के मुखिया मौलाना साद ने मुसलमानों को संबोधित करते हुए कहा कि मस्जिद में आना बंद नहीं करना है। मस्जिद आफत को भगाने के लिए होती है। अगर मस्जिद में नहीं आओगे तो आफतें और आएंगी। साथ ही उन्होंने डाॅक्टरों पर भी भरोसा नहीं रखने का बयान दिया, जिससे साफ हो गया कि मौलाना साद खुलेरूप से इस देशव्यापी बंद का विरोध कर रहे थे तथा अपने अनुयायियों को मस्जिद में आने के लिए उकसा रहे थे। जिसका प्रभाव हुआ कि संक्रमण की स्थिति में भी मुसलमान मस्जिदों में एकत्र होने से नहीं चूके। इसका असर यह रहा कि इन लोगों के चलते कोरोना फैलता चला गया। इस सब बयान और उसके दुष्प्रभाव का विश्लेषणात्मक अध्ययन करके साफ तौर पर कह सकता हूं कि यह बयान इस्लाम के बुनियादी उसूल के खिलाफ है, जिसमें खुद पैंगबर मोहम्मद ने फरमाया है कि जहां भी संक्रमण की बीमारी हो वहां नहीं जाओ और वहां हो तो वहा से कहीं भी बाहर नहीं निकलो। इस बात से यह पता चलता है कि खुद पैगम्बर भी महामारी में एकांतवास की शिक्षा दे रहे थे और मस्जिदों में आने पर भी पाबंदी लगायी हुई थी। फिर मौलाना साद का मस्जिद में आने वाला बयान उनकी इस्लाम की कम समझ का स्पष्ट उदाहारण है। जब यह बात तय हो गई कि मौलाना साद ने इस्लाम की बुनियादी तालीम को ही अपने अनुयायियों को नहीं बताया तब इस बात में बड़ी साजिश का अंदेशा भी होता है कि कहीं मौलाना साद इस आडियो की आड़ में भारत में जानबूझकर कोरोना वायरस को फैलाना तो नहीं चाह रहा था ? इस्लाम में एक शिक्षा और दी गई है कि जिस मुल्क में रहो, जहां के नागरिक हो उस देश के कानूनों का पालन करना है। यानी इसका मतलब यह हुआ कि जब भारत के प्रधानमंत्री ने पूरे देश में लाॅक डाउन कर दिया था तो उस आदेश को नहीं मानना भी इस्लाम की शिक्षा के खिलाफ जाता है। इसे राष्ट्रद्रोह भी कहा जा सकता है। क्योंकि शासक की बात को भी नहीं मानना देश के खिलाफ काम करने जैसा ही होता है।
मौलाना साद ने इस महाविपत्ति की स्थिति में पूरे देश का न ख्याल रखते हुए मात्र कटृटरता फैलाते हुए मुसलमानों को सलाह दी कि वह महामारी के वक्त में भी मस्जिदों में आकर नमाज पढ़ें, जिसका असर यह हुआ कि पूरे देश की जमातें अपने पूर्वनिर्धारित कार्यक्रम के हिसाब से ही चलती गईं। तथा उन्होंने कोरेंटाइन होने के महत्व को नही समझा जो कि एक पाषाण युग में जीने जैसा प्रतीत होता है। यह सब जमातियों के मानसिक स्तर को तो स्पष्ट करता ही है साथ ही हमें सावधान रहने के लिए भी सचेत करता है कि जमात में जाने वाले जुनूनी लोगों को सिर्फ एक दिशा में मोड़कर पूरी दुनिया से काट सा दिया जाता है और वह समाज तथा देशहित से दूर होकर एक कटृटरपंथी की तरह मुल्ला-मौलवी के हर आदेश को मानता चले जाता है। लेकिन यह सब इस्लामिक सिद्धांतों के विपरीत है क्योंकि पैगंबर मोहम्मद ने दुनिया में रहकर पूरी दुनिया का ख्याल रखने की हिदायत अपने संदेशों में दी है, जिसमें कटृटरता को किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जा सकता है। असल में मौलाना साद का संदेश उस जाहिल युग का परिचय कहें जो कि इस्लाम से पहले अरब का हुआ करता था और मौलाना साद ने यह संदेश बहुत सोच समझ कर दिया है। क्योंकि उन जैसा कथित विद्वान बिना सोचे कुछ नहीं बोल सकता है। अब देखना यह होगा कि वास्तव में मौलाना साद को पूरे हिन्दुस्थान से कोई वास्ता नहीं है और वह मरकज में ही अपनी खुद की दुनिया बनाकर उस दुनिया का तानाशाह है जो सरकार और डाॅक्टर की सलाह को मानने को तैयार नहीं है, चाहें दुनिया में कोरोना वायरस जैसी महामारी फैलकर इंसानी नस्ल को बर्बाद ही कर दे। मौलाना साद को हायया अलससल्लाह यानी आओ नमाज की तरफ की जगह यह कहना चाहिए था अलसलातूफिब्युतिकुम यानी अपने घर में नमाज पढ़ो।