श्रीश्री रविशंकर- "अभी धीरज रखें, आगे जीवन उत्सव होगा"
   दिनांक 08-अप्रैल-2020
एक बीमारी महामारी के रूप में पूरी दुनिया में तबाही मचा रही है। साधन संपन्न देश तक हताश-विवश दिख रहे हैं। भारत में भी लोग घरों में बंद हैं। तनाव, आशंका व निराशा के भाव भी आ घेर रहे हैं। आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक और आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर ऐसे मौके पर कहते हैं- ‘हर मुश्किल के बाद हम पहले से अधिक मजबूत और सार्मथ्यवान होकर निकले हैं। अभी हमारे गलत कार्यों से तंग आ चुकी प्रकृति चाहती है कि हम कुछ समय विश्राम में रहें।’ मौजूदा समय को केंद्र में रखते हुए आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर से बात की अजय विद्युत ने। प्रस्तुत हैं बातचीत के प्रमुख अंश-

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अनुपात कम ज्यादा होगा लेकिन इस समय की सचाई है कि हर किसी के मन में कोरोना का एक खौफ-डर है। हल्का सा अवसाद भी है कि हम इतने दिन से घर में बंद हैं, आगे पता नहीं और कितने दिन ऐसे ही रहना पड़े। ऐसे में क्या करें ?
इस समय ऐसी परिस्थिति है कि हर किसी को घर में रहना ही पड़ेगा। घर में रहते हुए जब उन्हीं चंद लोगों के साथ हम बातें करते रहेंगे तो कहीं-कहीं संघर्ष बढ़ेगा और कुछ मनमुटाव भी संभव है। हम इस समय का सदुपयोग करें। घर वाले सब मिलकर अपने स्वास्थ्य पर ध्यान दें। योग करें। थोड़ी देर आसन-प्राणायाम करें। इसके साथ-साथ ध्यान करना बहुत आवश्यक है। मान लीजिए कि कोई व्यक्ति अपने स्वास्थ्य या किसी अन्य कारण से योगासन नहीं कर पा रहा है पर ध्यान हर व्यक्ति कर सकता है। मन को सकारात्मक रखना बहुत जरूरी है। मन नकारात्मक चीजों की तरफ आसानी से फिसल जाता है, उसे संभालना पड़ेगा। यह जो समय मिला है उसमें कुछ सृजनात्मक चीजें करें। कोई कहानी लिखें, गीत रचें या जो भी आप करना चाहें। यह भीड़ में नहीं होता, एकांत में ही हो पाता है। हम कुछ सृजनात्मक चीजें करते रहेंगे तो लॉकडाउन का यह समय आनंद से कटेगा।
मन चंचल है और कई बार उसे लगता है मानो हम हाउस अरेस्ट (अपने घर में कैद) हो गए हैं। इस सोच में परिवर्तन कैसे लाएं ?
सोच में परिवर्तन यह सोचकर लाना होगा कि घर के बाहर जाएंगे तो मृत्यु है और घर के अंदर रहेंगे तो स्वर्ग। यह अवसर मिला है कि हम अपने घर में स्वर्ग सृजित करें। अपनी कुशलताओं को बढ़ाएं, भाषाओं को सीखें। घर बैठे-बैठे सीखने-करने को बहुत कुछ है। मनोरंजन के लिए आपको बाहर नहीं जाना है, घर में टीवी है, इंटरनेट है- उस पर काफी कुछ मिल जाएगा। भोजन घर में मिल जाएगा, उसके लिए रेस्टोरेंट जाने की जरूरत नहीं है। सोशल मीडिया के जरिए आप लोगों के संपर्क में रहते ही हैं। हां, अगर पच्चीस साल पहले यह होता तो लोग तिलमिला जाते। तब सोशल मीडिया नहीं था, सेलफोन नहीं थे। अब हम ऐसे युग में हैं कि घर पर बैठे हुए भी सबके साथ संपर्क में रह सकते हैं। घर में आप सामूहिक रूप से कुछ कर सकते हैं। घर के सदस्यों के काम में मीन मेख निकालने के बजाय साथ बैठें और आनंदित हों। मैं कहूंगा कि आप अपनी मां, सास या पत्नी को उनके रोज के कामकाज से थोड़ा विश्राम दें। आप उन्हें आराम से बैठने को कहें और उनसे भोजन बनाना सीखें। फिर भोजन बनाकर उनके सामने रखें और उनके चेहरे पर आने वाले भावों को धैर्यपूर्वक देखें। जब उनके चेहरे पर मुस्कान आए वे भोजन की प्रशंसा करें तो समझो आपको परीक्षा में उत्तीर्ण होने का प्रमाण पत्र मिल गया।
यह कहा जा रहा है कि कुछ लोगों के कारण यह बीमारी फैली है जिसका शिकार निर्दोष लोग हुए हैं। ऐसा क्यों ?
इस संसार में एक व्यक्ति भला या बुरा जो भी करता है उसका असर सब पर पड़ता है। जब कोई व्यक्ति अच्छा करता है और उसका असर सब पर पड़ सकता है तो जब कोई व्यक्ति बुरा करेगा तो उसका असर भी सब पर पड़ेगा। तो कुछ दुष्ट लोगों की वजह से या उनकी नासमझी की वजह से- नासमझी इसलिए कि उन्हें पता नहीं कि इससे उनके परिजन भी प्रभावित होंगे- तो जो भी क्रिया विश्व में होती है उसका किसी न किसी अंश तक सब पर असर पड़ता ही है। दो विश्वयुद्ध हुए। युद्ध में सैनिक ही नहीं मारे जाते, राजनेता नहीं मारे जाते। सबसे ज्यादा मारे जाते हैं निर्दोष आम आदमी वे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। यह विश्वव्यापी महामारी भी इसी प्रकार एक तीसरा विश्वयुद्ध है। मैं कहता हूं कि आप यह मानकर चलें कि ईश्वर हमें बहुत प्यार करता है और यह लड़ाई समाप्त होगी। हमें कहीं अधिक सजग रहने की जरूरत है और प्रकृति का ऐसा विधान है कि वह हर क्षति की पूर्ति कर लेती है। ऐसा क्यों हुआ, किसकी वजह से हुआ- यह समय इसका विश्लेषण करने का नहीं है। इस समय हमें अपनी रोग निरोधक शक्ति को बढ़ाना है। हमने कुछ ऐसी जीवनशैली-खानपान अपनाया, जिसके कारण हम शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से कमजोर होते गए। उससे तमाम नकारात्मक बातें क्रोध, कटु वचन बोलना हमारी जीवनशैली बन गई थी। अब प्रकृति ने ऐसा कुछ खेल खेला कि हम सबको थोड़ा शांत रहना पड़े। प्रकृति ने यही कहा कि थोड़ा रुको, बैठ जाओ और सोचो कि तुम कौन हो- कहां से आए- क्यों आए- तुम्हें क्या चाहिए। इन सबको हम दार्शनिक, सैद्धांतिक विषय मानते आए हैं, आज उन सब पर दृष्टि डालने का समय आ गया है।
विश्व के शक्तिशाली और संपन्न देश इस बीमारी के आगे लाचार नजर आ रहे हैं। भारत जिस तरह इसका सामना कर रहा है, उससे क्या उम्मीद आप कर रहे हैं ?
अब तक तो भारत ने काफी अच्छे ढंग से कोरोना महामारी का सामना किया है। मगर यह काफी नहीं है। इससे हमें संतुष्ट नहीं रहना है। यह अभी कई जगह फैल चुकी है और फैल रही है- मुंबई की झुग्गी बस्तियों में इसका फैलाव हुआ है। दिल्ली के तब्लीगी मरकज से लोग जहां-जहां गए वहां-वहां इसके फैलने की आशंका हो गई। इसलिए अभी सावधानी बरतनी बहुत आवश्यक है। यह नहीं सोचना है अब हमने युद्ध जीत लिया और सब लोग सड़कों पर आ जाएंगे और पहले जैसी स्थिति चलाते रहेंगे। ऐसा कभी नहीं करना। अभी हम सही रास्ते पर हैं लेकिन जीत अभी काफी दूर है। हमने सावधानी नहीं बरती तो भारत में इसे फैलने में बहुत कम समय लगेगा। बाहर के देशों में यह जैसे फैला है उससे दस गुना तेजी से इसके भारत में फैलने की आशंका है। यह अच्छा हुआ कि सही समय पर संयम से हम सब अपने अपने घरों में बैठ गए। इससे बीमारी पर रोक लगाने में हम अब तक सफल हुए हैं।
लोग महामारी की खबरें देखकर चिंता और तनाव में हैं ?
आपको चिंतित नहीं रहना है, सचेत रहना आवश्यक है। दोनों अलग बातें हैं। चिंता में डूबेंगे तो हमारी रोग निरोधक शक्ति घटने लगती है जबकि अभी हमें उसकी बहुत अधिक आवश्यकता है। इसलिए चिंता न करें। अपने में तीन प्रकार के विश्वास को मजबूत करें। एक- आत्मविश्वास यानी अपने पर विश्वास, दूसरा- ईश्वर पर विश्वास और तीसरा- यह विश्वास कि दुनिया में अच्छे लोग हैं और एक दूसरे की मदद के लिए सब लोग तैयार रहेंगे। हमें चिंता इस बात की होती है कि आगे क्या होगा, काम धंधा कैसे चलेगा, जो पैसा था वह खर्च कर डाला अब आगे हमारी देखभाल कौन करेगा, बीमारी ने पकड़ लिया तो क्या करेंगे... ऐसा सोचने की कोई आवश्यकता नहीं है। हर मुश्किल के बाद हम पहले से अधिक मजबूत और सामर्थ्यवान होकर निकले हैं। अभी धीरज रखें और आगे देखिए- जीवन उत्सव होगा।