कश्मीर में आतंक की आग दहकाए रखने की कोशिश में पाकिस्तान और आतंकी समूह

    दिनांक 01-मई-2020
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ले. जनरल.(से.नि.) सैयद अता हसनैन 
 
कोरोना महामारी के इस काल में भी पाकिस्तान आतंकवादियों को भारत में घुसपैठ कराने की फिराक में हैं। सदैव सतर्क और सावधानी से ही पाकिस्तान के मंसूबों पर पानी फेरा जा सकता है
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यद्यपि इन अफवाहों की पुष्टि नहीं हो सकी है कि पाकिस्तान चायनीज वायरस से संक्रमित लोगों को पाक-अधिक्रांत कश्मीर के रास्ते भारत भजने की कोशिश कर रहा है, लेकिन यह बात शंका से परे है कि संक्रमण के खतरे के बावजूद पाकिस्तान का कश्मीर के प्रति मोह कम नहीं हुआ है। वास्तव में पाकिस्तानी मीडिया में पिछले कुछ दिनों में आई खबरों को देखकर इस बात की पुष्टि की जा सकती है कि पाकिस्तान का कश्मीर राग बेरोकटोक जारी है। 15 मार्च, 2020 को कोविड-19 के मुद्दे पर सार्क देशों की वीडियो कॉन्फ्रेंस के दौरान पाकिस्तानी स्वास्थ्य मंत्री जफर मिर्जा द्वारा कश्मीर का मुद्दा उठाने की कोशिश करने में भी यह बात साफ दिख रही थी।
अप्रैल के पहले सप्ताह में कुपवाड़ा के उत्तर में शम्सबाड़ी के नजदीक भारतीय सेना और आतंकियों के बीच चली लंबी मुठभेड़ उसी का प्रमाण है, जिसकी इस मौसम में आशंका होती है। इस मुठभेड़ में सीमापार के दुधनिआल ठिकाने के रास्ते घुसपैठ करने वाले संभवत: जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े पांच आतंकी मारे गए, लेकिन सेना के विशेष बल के पांच जवान भी बलिदान हो गए। जिस जगह यह मुठभेड़ हुई वह शम्सबाड़ी पर्वत श्रृंखला पर काफी ऊंचाई पर थी, जहां 10-से 15 फीट मोटी बर्फ पर तीन से चार फीट तक ताजा गिरी बर्फ होने की संभावना थी। इस इलाके में किसी तरह की गतिविधि करना बेहद कठिन है और नियंत्रण रेखा पर लगाई गई बाड़ रूपी बाधा प्रणाली बर्फ में काफी नीचे दबी पड़ी थी। घुसपैठ के प्रयासों के लिए यह सबसे बढ़िया मौसम होता है क्योंकि अब से एक महीने बाद पिछले 15 साल की ही तरह एक बार फिर भारतीय सेना के इंजीनियर घुसपैठ-रोधी बाधा प्रणाली को पुन: सक्रिय कर देंगे। यह बात आतंकी समूहों को भी अच्छी तरह से मालूम है और इसीलिए वे ऐसा होने के पहले मिलने वाले थोड़े से समय में ही बड़े पैमाने पर किसी भी कीमत पर घुसपैठ के प्रयास करते हैं।
5 अगस्त, 2019 को मोदी सरकार द्वारा अनुच्छेद 370 और 35-ए को निरस्त करने और प्रशासनिक व्यवस्था के पुनर्गठन से जुड़े साहसिक और अभूतपूर्व कदम उठाए जाने के बाद से कश्मीर में आमतौर पर हिंसा नहीं दिखी है। प्रभावी सुरक्षा, राजनीतिक और सामाजिक नियंत्रण के बीच स्थिरता उभरती दिख रही है, लेकिन स्थिति अभी सामान्य नहीं है। राजनीतिक रूप से यह समय निश्चित रूप से बेहतर है, लेकिन सुरक्षा विशेषज्ञ इसे ‘कृत्रिम स्थिरता’ मानते हैं जिसे कभी भी आतंकवादियों की मौजूदगी बढ़ाने के प्रयासों से खतरे में डाला जा सकता है। जगह-जगह सड़कों पर विरोध प्रदर्शनों, कश्मीर के विविध संचार माध्यमों में विध्वंसक साहित्य या स्थानीय समर्थकों की गतिविधियों को बढ़ाने जैसे पारंपरिक तरीकों से यहां अलगाववाद को बढ़ावा देना अब आसान नहीं है। लेकिन, आतंकवादियों की मौजूदगी बढ़ा कर आतंकी प्रयासों को तेज करते हुए कश्मीर की आग को दहकाए रखना पाकिस्तान के लिए मददगार होगा। कश्मीर में अलगाववाद और आतंकवाद को सक्रिय रखने वाले पाकिस्तान के नेटवर्क पर भारतीय खुफिया एजेंसियों की गहरी पकड़ बन जाने के बावजूद वह अपने प्रयास छोड़ने के लिए तैयार नहीं है।
कश्मीर में घुसपैठ की तलाश में आतंकी समूह
अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की संभावित वापसी और तालिबान तथा राष्ट्रीय एकता सरकार के बीच संभावित समझौते के शुरुआती संकेत दिखने के साथ ही विश्लेषकों का अनुमान है कि अल कायदा का पाकिस्तान के समर्थन में आने का पुराना खतरा वास्तविकता में बदल सकता है। कश्मीर में अल कायदा और इस्लामिक स्टेट की उपस्थिति नाममात्र की रही है, लेकिन उनकी संभावनाएं हमेशा जीवित रही हैं। ऐसी सूचनाएं हैं कि कश्मीर में कुछ अन्य आतंकी समूह भी घुसपैठ के मौके की तलाश में हैं। यह नहीं पता है कि ये संभावित घुसपैठिए किस गुट के हैं, फिर भी पाकिस्तान की बेचैनी अब साफ दिखाई देने लगी है।
अप्रैल के शुरुआती दिनों में मारे गए दो घुसपैठिए कश्मीर के शोपियां जिले के रहने वाले थे, जो 2016-17 में पाकिस्तान में गए थे। मुठभेड़ से पता चलता है कि उन्हें उच्चस्तरीय प्रशिक्षण मिला था और दक्षिण कश्मीर में कमजोर पड़ते उग्रवाद को सहारा देने के लिए उनकी वापसी अपरिहार्य थी। ऐसे और आतंकवादियों की वापसी की उम्मीद की जा सकती है।
अप्रैल, 2020 में अब तक 25 आतंकियों को खत्म किया जा चुका है। पिछले कुछ महीनों के मद्देनजर यह संख्या काफी बड़ी है। ये रुझान दो बातों की ओर संकेत करते हैं। पहली कि बेहतर खुफिया सूचनाएं मिलने के कारण आतंकियों को तालाबंदी के दौरान आबादी वाले इलाकों में स्थित ठिकानों पर छिपे रहने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। दूसरी कि सुरक्षित ठिकाने बनाने के संसाधन बहुत निचले दर्जे के होने के कारण उनकी संख्या बहुत कम है जिससे आतंकी बेनकाब हो रहे हैं।
आतंकी समूहों में भर्ती के लिए तैयार होने वाले युवाओं पर व्यापक निगरानी रखते हुए आतंकवादियों की संख्या को सीमित रखना भविष्य की रणनीति का महत्वपूर्ण कारक होगा। विदेशी आतंकवादियों के अलावा मारे गए स्थानीय आतंकवादियों के शव किसी को न सौंपने के सरकार के निर्णय का लंबे समय से इंतजार था। इससे सार्वजनिक अंत्येष्टियों में दिखाई देने वाले जुनून और भावनाओं की लहरों को कम करने में मदद मिलेगी। त्राल, शोपियां और कुलगाम जैसे पारंपरिक रूप से उच्च सक्रिय क्षेत्रों में आतंकियों का जमावड़ा और छिपने के नए ठिकाने बनने से रोकने के लिए वहां लगातार दबाव बनाए रखना होगा। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण कारक है पाक-अधिक्रांत कश्मीर से होने वाली घुसपैठ का मुकाबला करना, क्योंकि ऐसे प्रयासों का होना लगभग निश्चित है और कश्मीर में ही 300 किलोमीटर से अधिक लंबी नियंत्रण रेखा पर इसकी बड़ी संभावना बनी रहती है। घुसपैठ की काफी गुंजाइश जम्मू में भी मौजूद है। इस रास्ते से आए घुसपैठिए बाद में जमीनी मददगारों की मदद से घाटी तक पहुंचने के प्रयास करते हैं। जो बात निश्चित है वह यह है कि सेना द्वारा प्रौद्योगिकी का उपयोग उसकी ताकत बढ़ा रहा है और इस दिशा में बड़ा काम कर रहे नए उद्यमों से ज्यादा से ज्यादा नई तकनीक हासिल की जानी चाहिए।
यह बात थोड़ी आश्चर्यजनक लग सकती है कि एफएटीएफ की ओर से भारी दबाव के बावजूद पाकिस्तान कश्मीर में आतंकवाद को प्रायोजित करने की नीति जारी रखे है। भारत के पास इसके सिवाय कोई रास्ता नहीं है कि वह ऐसे प्रयासों को ध्वस्त करने की अपनी क्षमता को दोगुना करे और पाकिस्तान को इस बर्बादी के रास्ते से हटने के लिए मजबूर करने वाली आक्रामक कार्रवाई करे। चायनीज वायरस का प्रभाव खत्म होने के बाद के दौर में पाकिस्तान इस उम्मीद में सभी सावधानियों की अनदेखी कर सकता है कि भारत इस बीमारी के हमले से उबरने की प्रक्रिया पर ध्यान देने के कारण किसी और प्रतिक्रिया के लिए कम तैयार होगा। ऐसे में वे कश्मीर या अन्य जगहों पर कोई बड़ी घटना करने की फिराक में हो सकते हैं। इसके लिए जरूरी व्यवस्थाएं पाक-अधिक्रांत कश्मीर के रास्ते भी आ सकती हैं और ऐसे किसी प्रयास की सफलता सफल घुसपैठ पर निर्भर करेगी। इन संभावित बड़ी घटनाओं के अन्य विकल्पों के साथ ही वे कठिन अंदरूनी इलाकों तक जाने के बजाय 2015-16 का मॉडल अपना सकते हैं, जिसमें नियंत्रण रेखा के पास घुसपैठ पर ध्यान केंद्रित करते हुए आसपास के क्षेत्रों में स्थित प्रतिष्ठानों को लक्ष्य बनाया जाता है। 2015-16 में झेलम घाटी में उड़ी और मोहरा हमले इसी तरह के प्रयासों का परिणाम थे। नियंत्रण रेखा पर वर्तमान में शांति है, लेकिन पाकिस्तानी बॉर्डर एक्शन टीमें कार्रवाई के माध्यम से भारतीय गश्ती व्यवस्था में तैनाती के तरीकों में बदलाव करवाने की कोशिश करती रहती हैं ऐसी हरकतों को रोकने के लिए फील्ड कमांडरों की रणनीति के अनुसार तेजी से प्रतिक्रिया या पहले से सक्रियता बरतनी होगी।
आखिर में, यह शिकायत कि कश्मीर में 4-जी संचार प्रणालियां अब तक सक्रिय नहीं हुई हैं। ऐसा होने का फायदा भी है और नुकसान भी। इस मामले में उचित समय पर निर्णय लिए जाने की जरूरत होगी, लेकिन ऐसा होने तक भारत को सोशल मीडिया और दूसरे माध्यमों से लोगों को प्रभावित करने की क्षमताओं को सुदृढ़ करना होगा।
(लेखक सुरक्षा विशेषज्ञ हैं )