राजस्थान: डेढ घंटे तक एम्बुलेंस नहीं पहुंची तो बीमार पिता को ठेले में बिठाकर दौड़ा बेटा, उपचार में देरी से हुई मौत

    दिनांक 01-मई-2020   
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कोरोना संक्रमण के दौर में बेहतर चिकित्सा सुविधाओं का दंभ भर रही राजस्थान की कांग्रेस सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल उस समय खुल गई जब एक बेटे ने अपने बीमार पिता को उपचार हेतु अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस को कई बार फोन किया, लेकिन डेढ घंटे तक एम्बुलेंस नहीं आने पर बेटा बीमार पिता को ठेले पर बिठाकर ही दो किलोमीटर से ज्यादा पैदल अस्पताल के लिए निकल पड़ा।

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कोरोना संक्रमण के दौर में बेहतर चिकित्सा सुविधाओं का दंभ भर रही राजस्थान की कांग्रेस सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं की पोल उस समय खुल गई जब एक बेटे ने अपने बीमार पिता को उपचार हेतु अस्पताल ले जाने के लिए एम्बुलेंस को कई बार फोन किया, लेकिन डेढ घंटे तक एम्बुलेंस नहीं आने पर बेटा बीमार पिता को ठेले पर बिठाकर ही दो किलोमीटर से ज्यादा पैदल अस्पताल के लिए निकल पड़ा। रास्ते में पुलिस बैरिकेटिंग समेत कई लोग भी मिले, लेकिन किसी ने उसकी मदद नहीं की। जैसे-तैसे अस्पताल पहुंचा तो वहां चिकित्सकों ने उसे पर्ची कटवाने के नाम पर अस्पताल में इधर-उधर चक्कर कटवाए, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। उपचार के अभाव में बीमार सतीश अग्रवाल दम तोड़ चुके थे. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ऐसी ही लचर स्वास्थ्य सेवाओं के भरोसे राजस्थान की कांग्रेस सरकार कोरोना काल में भी झूठी वाहवाही लूट रही है ?
दरअसल यह पूरा वाक्या राजस्थान के कोटा संभाग मुख्यालय पर सामने आया है। जहां शहर के सबसे बड़े एमबीएस अस्पताल में वक्त रहते मर्ज की दवा नहीं मिलने से मरीज ने दम तोड़ दिया।
मिली जानकारी के मुताबिक कोटा के रामपुरा फतेहगढ़ी निवासी सतीश अग्रवाल नित्यकार्य जाते समय अचेत होकर गिर गए। यह देख उनकी पत्नी गायत्री और बेटे मनीष अग्रवाल ने 108 नंबर पर एंबुलेंस को फोन किया, लेकिन डेढ़ घंटे तक एंबुलेंस नहीं आई तो मजबूर बेटे ने चोटिल पिता को उठाया और ठेले पर डालकर एमबीएस अस्पताल की और निकल पड़ा। लेकिन लॉकडाउन के चलते उन्हें न तो कोई मदद मिल सकी और न ही वह आपने पिता की जान बचा सका।
मृतक के बेटे मनीष ने मीडिया को बताया कि अस्पताल प्रशासन उसे कभी 125 नंबर कमरे से 104 और तो कभी वहां के चिकित्सक 125 नंबर कमरा से किसी और कमरे में टरकाते रहे। अंत में 104 ओपीडी में भेजा जहां उनकी ईसीजी करने के बाद मरीज को मृत घोषित कर दिया गया।
यकीनन ऐसे हालात में अस्पताल प्रशासन की घोर लापरवाही की बात सामने आई है। दिल को झकझोर कर रख देने वाली इस घटना ने स्वास्थ्य सेवाओं की पोल तो खोली ही साथ में प्रशासन के अमानवीय चेहरे को भी उजागर कर दिया है।
देशभर में शिक्षा नगरी के नाम से प्रसिद्ध कोटा 2019 में उस समय सुर्खियों में आया था जब यहां के जेके लोन अस्पताल में वेंटिलेटर समेत स्वास्थ्य उपकरणों की कमी के चलते करीब 110 मासूम बच्चे काल के ग्रास में समा गए थे। उस वक्त भी राजस्थान में चिकित्सा सुविधाओं की कमी बड़ा मुददा बनकर उभरा था, लेकिन सरकार अपनी फजीती से बचने के लिए झूठी वाहवाही लूटने की चाह में तरह-तरह के आंकड़े पेशकर जनता को भ्रमित करने में लगी रही।