साक्षात्कार : अगर कुछ लोग गैर-जिम्मेदाराना रवैया नहीं दिखाते तो आज भारत इस जंग में जीत के और करीब होता

    दिनांक 11-मई-2020
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पूरी दुनिया कोविड-19 महामारी की चपेट में है। भारत भी इस संकट से जूझ रहा है। देश के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन का मानना है कि अन्य देशों के मुकाबले भारत की स्थिति संतोषजनक है। अगर कुछ लोग गैर-जिम्मेदाराना रवैया नहीं दिखाते तो आज भारत इस जंग में जीत के और करीब होता। कोरोना के खिलाफ जंग में अब तक के प्रयासों और परिणाम के बारे में डॉ. हर्षवर्धन ने पाञ्चजन्य से विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं साक्षात्कार के संपादित अंश:—
 
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कोरोना संक्रमण को रोकने में लॉकडाउन अब तक कितना कारगर साबित हुआ ?
 
मेरा मानना है कि लॉकडाउन पूरी तरह से कारगर साबित हुआ है। इसने हमें बड़ी से बड़ी चुनौती से निपटने के लिए सक्षम बना दिया है। 14 अप्रैल को राष्ट्र के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट किया कि अगर देश में 21 दिन का पूर्ण लॉकडाउन नहीं लगाया जाता तो भारत की हालत यूरोप के संपन्न देशों जैसी ही खराब होती। हम कोविड-19 से होने वाले नुकसान को काफी हद तक रोकने में सफल रहे हैं। देश में लगभग सभी ने संकल्प के साथ निष्ठापूर्वक सामाजिक दूरी और लॉकडाउन के अधिकांश निदेर्शों का पालन किया। इस दौरान कड़े और बड़े निर्णय लिये गये। सभी राज्यों ने केन्द्र सरकार के साथ तालमेल कायम कर इन निर्णयों का न केवल सम्मान किया, अपितु समय की जरूरत समझ कर पालन भी करवाया।
 
 
भारत में विदेश से आवागमन को रोकने के बाद जिस प्रकार संक्रमण बढ़ा है, उसे देखते हुए जानकारों का मानना है कि देश में सामुदायिक संक्रमण की स्थिति आ गई है, जबकि सरकार का कहना है कि भारत, कोरोना संक्रमण के दूसरे और तीसरे चरण के बीच में है। आपकी नजर में वास्तविक स्थिति क्या है ?
 
मेरी अध्यक्षता में कोविड-19 उच्चस्तरीय मंत्री समूह ने 12 बैठकों में महत्वपूर्ण फैसले किये। समयानुकूल यात्रा परामर्श जारी किये गये। इसी के साथ चीन समेत अन्य देशों में फंसे भारतीय नागरिकों और विद्यार्थियों को सुरक्षित स्वदेश पर पूरा ध्यान दिया गया। 23 मार्च से अंतरराष्ट्रीय विमानन सेवाएं बंद कर दी गयीं। इससे पहले कुछ देशों से आने वाले यात्रियों की थर्मल स्क्रीनिंग शुरू की गई थी, लेकिन बाद में सभी देशों से आने वाले यात्रियों की यूनिवर्सल स्क्रीनिंग शुरू कर दी गयी। इस तरह सभी हवाईअड्डों, 77 बंदरगाहों तथा नेपाल की सीमा से लगे 5 राज्यों के 21 जिलों में प्रवेश स्थलों पर कुल 36 लाख 44 हजार से अधिक लोगों की थर्मल स्क्रीनिंग की गयी। यह सुनिश्चित किया गया कि विदेश से काई भी संक्रमित और संदिग्ध व्यक्ति सीधे भारत न आए। ऐसे लोगों को क्वारंटीन केंद्रों तथा होम क्वारंटीन में रखा गया। कोविड-19 के मामूली लक्षण वालों को घर में अलग—थलग रखने को कहा गया। हमने संक्रमण रोकने के सभी एहतियाती कदम उठा लिये थे, लेकिन कुछ लोगों के गैर-जिम्मेदाराना रवैये, उनके अनियंत्रित व्यवहार, लॉकडाउन तथा सामाजिक दूरी के उल्लंघन से देश के कई प्रदेशों में संक्रमण बढ़ा। मैंने पहले भी स्पष्ट किया है कि देश में न तो अभी और न ही आने वाले समय में तीसरे चरण यानी सामुदायिक संक्रमण में प्रवेश की कोई आशंका दिखाई देती है। कई बार निमोनिया के सैकड़ों रोगियों के नमूनों की जांच की गई, लेकिन तीसरे चरण की स्थिति बनने के आसार दिखायी नहीं दिये। देश के कुल 730 जिलों में से 353 में संक्रमण का असर नहीं है। संतोष की बात है कि उपचार के बाद स्वस्थ होने के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। अब यह संख्या 1992 हो गई, इनमें 76 विदेशी शामिल हैं।
 
 
यह बात सही है कि अन्य देशों की तुलना में भारत में संक्रमण काफी कम है, लेकिन लॉकडाउन के बावजूद संक्रमण लगातार बढ़ रहा है। क्या इसे वायरस की गंभीरता के अनुरूप रणनीति का आक्रामक न होना माना जाए ?
 
तमाम देशवासी मान रहे हैं कि अन्य देशों की तुलना में संक्रमण का स्तर भारत में काफी कम है। इसमें स्वास्थ्य मंत्रालय, सभी संबंधित मंत्रालयों, राज्यों, अन्य एजेंसियों तथा आमजनों के प्रभावी समन्वित प्रयासों का योगदान है। हमें डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की क्षमता और निष्ठा पर पूरा भरोसा है। यह सत्य है कि 25 मार्च को लॉकडाउन लागू करने के समय देश में पुष्ट मामले बहुत कम थे और 12 मौतें ही हुई थीं। पर अब पुष्ट मामले और मौतों के साथ स्वस्थ होने वाले मरीजों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है। फिलहाल देश में कोविड के कुल मरीजों के मुकाबले मृत्यु दर 3.3 प्रतिशत है और स्वस्थ होने वाले 13.6 प्रतिशत हैं। यह भी सर्वविदित है कि 29.3 प्रतिशत से कुछ अधिक नये मामले एक विशेष समुदाय से संबंधित परिस्थितियों के फलस्वरूप सामने आये हैं। देश में 6.8 दिन में मामले दुगने हुए हैं। महाराष्ट्र और दिल्ली में मामले लगातार बढ़ रहे हैं, इनका कारण घनी आबादी, बड़ी झुग्गी बस्तियां और विशेष समुदाय की गैर-जिम्मेदारी है।
 
यह आक्रामक रणनीति का ही नतीजा है कि हमने केंद्र और राज्य सरकारों के साथ मिलकर कोविड-19 के विशेष अस्पताल बनाये हैं। इतने कम समय में 1.65 लाख से अधिक आइसोलेशन बिस्तर, 21 हजार से अधिक आईसीयू बिस्तर और 10,600 से अधिक वेंटिलेटर तैयार किए। सरकार ने आरोग्य सेतु एप शुरू किया है जो कोरोना वायरस से संबंधित जानकारी आप तक पहुंचाता है। संक्रमण के जोखिम का आकलन करने में सक्षम 11 भाषाओं में मदद देने वाले आरोग्य सेतु मोबाइल एप को 5 करोड़ लोगों ने डाउनलोड किया है। दूसरी तरफ दिल्ली में संक्रमित स्थान का पता लगाने और किसी को संक्रमण मुक्त करने के लिये ड्रोन का उपयोग किया जा रहा है। हमने टेलीमेडिसिन पद्धति से घर बैठे इलाज और दवा मंगाने की भी सुविधा शुरू कर दी। कोरोना के बारे में हर तरह की मदद मुहैया कराने के लिये दिल्ली स्थित एम्स में विशेषज्ञों के साथ जुड़ने के लिये 24 घंटे कार्यरत कोविड-19 नेशनल टेलीकम्यूनिकेशन सेटर कॉनटेक की शुरूआत की है। इस हेल्पलाइन पर संचार के किसी भी माध्यम से विश्व के किसी भी भाग से इलाज और परामर्श लिया जा सकता है। दिल्ली में कोविड-19 के 5 विशेष केंद्र भी काम कर रहे हैं। आयुष्मान भारत योजना के तहत देश में 50 करोड़ लोगों को कोविड-19 के निशुल्क उपचार और जांच की सुविधा दी गई है। स्वास्थ्य मंत्रालय में एक केन्द्रीकृत वॉररूम के जरिये संक्रमण के मामलों की विभिन्न स्तरों पर लगातार निगरानी और समीक्षा की जा रही है। इन सब कार्यों से स्पष्ट है कि हमने वायरस की गंभीरता के हिसाब से कहीं अधिक प्रभावी, आक्रामक और परिणामजनक व्यवस्था की है।
 
 
केरल में जनवरी में ही कोरोना के तीन मामले सामने आए और तीनों स्वस्थ भी हो गये। लेकिन मार्च में फिर संक्रमण फैलना शुरू हुआ जो अब तक थमा नहीं है। जनवरी में ही विदेशों से आने वालों पर रोक लगायी जाती या उन्हें थर्मल स्क्रीनिंग के बजाय पूरी तरह से क्वारंटीन किया जाता तो दोबारा संक्रमण नहीं फैलता।
 
सरकार ने बदलती स्थिति के अनुरूप कई यात्रा परामर्श जारी किए। 17 जनवरी, 2020 को जारी पहले परामर्श में देश के 7 हवाईअड्डों पर उतरने वाले यात्रियों के लिए थर्मल स्क्रीनिंग की व्यवस्था की गई। चीन से कोलकाता के रास्ते एक छात्रा केरल पंहुची और बाद में उसके संक्रमित होने की जानकारी मिली। उसके संपर्क में आए सभी लोगों का पता लगाया गया और उनकी जांच की गई। इसके फलस्वरूप केरल में कोरोना से संक्रमित तीन रोगी हो गए और वे स्वस्थ भी हो गए। इसके बाद देश में कई स्थानों पर संक्रमण के मामले सामने आने के पश्चात 6 मार्च को सभी हवाईअड्डों पर स्क्रीनिंग करने का निर्णय लिया गया और यह कार्य बिना किसी रूकावट के चलता रहा। इसीदौरान अप्रैल में केरल में भी मामले बढ़ गए। भारत ने शुरू ने ही सावधानी बरतते हुए कदम उठाए। जैसे ही चीन ने 7 जनवरी को कोरोना वायरस की जानकारी दी, अगले दिन 8 जनवरी को हमने तैयारियां शुरू कर दीं। इसी दिन स्वास्थ्य मंत्रालय में तकनीकी स्वास्थ्य संयुक्त समिति गठित की गई। बाद में प्रधानमंत्री ने मेरी अध्यक्षता में कोविड-19 पर मंत्री समूह का गठन किया। इन निर्णयों के कार्यान्वयन के फलस्वरूप आज हम कोविड-19 पर काबू पाने में विकसित और संपन्न देशों के मुकाबले बेहतर स्थिति में हैं।
 
 
यूरोप और चीन सहित अन्य पड़ोसी देशों में संक्रमण फैलने के बाद भी भारत में इन देशों से लोगों का आना-जाना लगा रहा। इनमें तब्लीगी जमात के लोग भी शामिल हैं, जिनकी वजह से स्थिति इतनी नाजुक हो गयी। क्या इसे सरकार की रणनीतिक चूक न माना जाये ?
 
समस्त विश्व में विषम परिस्थितियों में फंसे भारतीयों को सुरक्षित स्वदेश लाना हमारा कर्त्तव्य था और इसके मद्देनजर सरकार ने यात्रा निर्देश जारी किये। अपने नागरिकों की स्वदेश वापसी के बाद 23 मार्च से भारत में अंतरराष्ट्रीय हवाई सेवायें रोक दी गयीं। दिल्ली के निजामुद्दीन के मरकज में आए लोगों में बड़ी संख्या में ऐसे लोग थे, जिन्होंने विदेश यात्रा की थी और उनसे कोरोना संक्रमण का अधिक जोखिम था। ये लोग वीजा निलंबित किए जाने की तिथि से पहले भारत आए। हमने 11 मार्च, 2020 को यात्रा परामर्श जारी किया। इसमें भारत आने वाले सभी अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए स्व-घोषित प्रपत्र में फोन नंबर, उनके ठहरने का पता देना अनिवार्य किया गया। 28 दिन के भीतर बुखार व खांसी होने पर इन्हें घर से बाहर नहीं निकला था और स्वास्थ्य मंत्रालय को अवगत कराना चाहिये था। यह उनकी जिम्मेदारी थी, परंतु देश में लॉकडाउन के दौरान ये लोग सामाजिक दूरी के निर्देशों की धज्जियां उड़ाते रहे और मरकज में एक साथ रहे। 4 अप्रैल, 2020 तक 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में संक्रमण के 3,032 मामलों का पता चला था, जिनमें से 1095 इस विशेष समुदाय से संबंधित थे। तमिलनाडु में 411 में से 364, दिल्ली में से 445 में 301 और आंध्र प्रदेश में 161 में से 138 मामले इस विशेष समुदाय से जुड़े हुए थे। इस विशेष समुदाय से संबंधित मामले लगभग सभी राज्यों में, यहां तक कि अंडमान निकोबार द्वीप समूह और पुद्दुचेरी भी इससे प्रभावित हुए हैं। वर्तमान स्थिति के अनुसार समूचे देश में 14792 मरीजों में से 4338 मरीज इस समुदाय से हैं। इस तरह इस समुदाय के 29.3 प्रतिशत से अधिक सदस्य न केवल स्वयं संक्रमित हुए, बल्कि उन्होंने देशभर में बड़ी संख्या में लोगों को संक्रमित किया। बहरहाल, केंद्र सरकार नए मामलों की वृद्धि दर को सीमित करने के लिए राज्य सरकारों के साथ मिलकर काम कर रही है। सरकार ने समय-समय पर अपने निर्णयों और निर्देशों को प्रिंट, इलेक्ट्रानिक और सोशल मीडिया पर प्रसारित किया है और हवाईअड्डों पर भी प्रसारित और प्रचारित किया है।
 
 

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क्या तब्लीगी जमात की घटना प्रशासनिक स्तर पर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार की नाकामी का नतीजा नहीं है ?
 
नि:संदेह यह घटना दुर्भाग्यपूर्ण है और ऐसी घटना नहीं होनी चाहिए थी। इसमें दो मत नहीं कि इस समुदाय के लोगों के गैर-जिम्मेदाराना व्यवहार के कारण घटना हुई। देश में निगरानी और संपर्कों का पता लगाकर उनकी तलाश की जा रही है। दिल्ली सरकार को भी इस संदर्भ में उचित कार्रवाई करनी चाहिए। जैसा कि मैंने पहले बताया कि केंद्र और राज्य सरकारें तथा इनके तहत सभी एजेंसियां निर्धारित प्रक्रिया का पालन कर रही थीं।
 
 
कोरोना संकट के लिये सरकार पर एक आरोप देर से सक्रिय होने का भी लग रहा है, जिसका नतीजा चिकित्सा उपकरणों की कमी के रूप में आज देखने को मिला। इस आरोप में कितनी सच्चाई है ?
 
हमें पक्का विश्वास है कि इस अनबूझ और जटिलतम चुनौती का हम अटल और मजबूत इरादों तथा सुनियोजित पुख्ता तैयारियों के बल पर धैर्य, संयम और संकल्प के साथ सामना कर लेंगे, विजय हमारी होगी। चीन ने 7 जनवरी को जब दुनिया को कोरोना वायरस की जानकारी दी तो हमने अगले दिन से ही अपनी तैयारियों को मूर्तरूप देना शुरू कर दिया। परामर्श जारी कर स्वास्थ्य क्षेत्र की अचूक तैयारियां शुरू करने के साथ हवाईअड्डों, बंदरगाहों से देश में प्रवेश स्थलों पर थर्मल स्क्रीनिंग शुरू कर दी गयी। प्रवेश स्थलों पर आइसोलेशन वार्ड बना कर बिस्तर और वेंटिलेटर उपलब्ध कराये गये। यह सारी व्यवस्था 30 जनवरी को विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा इस बीमारी को अंतरराष्ट्रीय चिंता की आपात स्थिति का दर्जा दिये जाने से पहले कर ली गयी थी। चाक- चौबंद इंतजाम किये गये ताकि कोई कमी न आए और जंग लड़ने वाले योद्धाओं का कारवां रुकने न पाये। ऐसे में चिकित्सा उपकरणों की कमी की न तो कोई गुंजाइश थी और न ही इनकी कोई कमी हुई।
 
 
कोरोना संकट गहराने के एक महीने बाद भी अस्पतालों में पीपीई और वेंटिलेटर की कमी है जिसका सबूत 9 अप्रैल शाम चार बजे तक आपूर्ति शुरू नहीं हो पाना है। क्या यह देरी सरकार की समूची रणनीति को नकारात्मक रूप से प्रभावित नहीं करेगी ?
 
हमने शुरुआत में ही सभी पक्षों से कहा है कि इस लड़ाई में किसी उपकरण की कमी नहीं आनी चाहिये। कमी का अंदाजा लगते ही संबंधित अधिकारी को तुरंत सूचित करने को कहा गया है ताकि उपकरण समाप्त होने से पहले पर्याप्त मात्रा में मौके पर उपलब्ध रहें। इन निर्देशों का अब तक कड़ाई से पालन किया गया है। इस बीमारी के खिलाफ शीघ्र जंग जीतने के लिये ल़ॉकडाउन और सामाजिक दूरी का पालन भी जरूरी है। चूंकि इसकी कोई दवा और टीका नहीं है, इसलिये ‘सोशल वैक्सीन’ से ही इसे हराया जा सकता है। ऐसी जंग को शीघ्र जीतने के लिये उपकरणों का भंडार होना जरूरी होता है और इसे हरदम बरकरार रखा जाता है। इस पर नजर रखने के लिये एक नहीं अनेक प्रकार की व्यवस्था की गयी है। जहां तक वेंटिलेटर की बात है, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि बहुत कम प्रतिशत लोगों को ही इसकी जरूरत होती है। इस समय बड़ी संख्या में वेंटिलेटर की जरूरत नहीं है और कोविड-19 के विशेष अस्पतालों में पर्याप्त मात्रा में वेंटिलेटर उपलब्ध हैं। 55,884 वेंटिलेटर की खरीद के आर्डर दे दिये गये हैं। इस समय राज्यों के पास लगभग 4 लाख 54 हजार पीपीई हैं, जबकि एक करोड़ 80 लाख की खरीद के आर्डर दे दिये गये हैं। 4 लाख 16 हजार पीपीई किट मिल गये हैं और 4 लाख 12 हजार राज्यों को जारी किये गये हैं।
 
 
मास्क पहने की अनिवार्यता को लेकर काफी समय तक भ्रम बना रहा। पहले सरकार और डब्ल्यूएचओ के मुताबिक मास्क का उपयोग स्वस्थ व्यक्ति के लिये अनिवार्य नहीं था, लेकिन अब राज्य सरकारें सभी के लिये मास्क पहनना अनिवार्य बता रही हैं ?
 
वैज्ञानिकों और चिकित्सकों का मानना है कि सर्जिकल एवं एन-95 मास्क केवल चिकित्सा पेशेवरों के लिए के लिए जरूरी है। कोरोना के रोगी दो-तीन परत वाले मास्क का इस्तेमाल करें ताकि दूसरे लोगों तक संक्रमण नहीं पहुंचे। इसके अलावा, जो खांसी, जुकाम से पीड़ित हैं, उन्हें इसलिए मास्क लगाना जरूरी है कि वो दूसरों को संक्रमण ना दे सकें। स्वस्थ लोगों के लिए घर या कार्यस्थल से बाहर जाते समय घर में बने फेस कवर या गमछे का इस्तेमाल उपयुक्त होगा। उन्हें अपने पास दो फेस कवर रखने चाहिए। कई देशों का अनुभव है कि बाहर जाते समय फेस कवर फायदेमंद साबित हुआ है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय ने चेहरे और मुंह ढकने के लिए घर में बने सुरक्षा कवर के उपयोग के लिए परामर्श जारी किए हैं। इसमें सुरक्षा कवर बनाने का तरीका भी है।
 
 
कोरोना के कारण दिल्ली एम्स से लेकर देश के सभी अस्पतालों में अन्य बीमारियों, खासकर हृदय और कैंसर रोगियों का नियमित इलाज बंद हो गया। गैर-कोविड मरीजों का इलाज बंद होना, कितनी सही रणनीति है ?
 
कोविड-19 का संकट अभूतपूर्व और जटिल है और पूरी मानवता के लिये खतरा बना हुआ है। इस समय सरकार की प्राथमिकता संक्रमणग्रस्त लोगों की जीवन रक्षा करना है। हमने विकसित और संपन्न देशों के मुकाबले वर्तमान संक्रमण पर काफी हद तक नियंत्रण किया है और हजारों लोगों का जीवन बचाया है। कोरोना से इतर अन्य मरीजों को अस्पतालों में उपचार करने से मना करने का मुद्दा है तो इस विषय में केंद्र सरकार ने 14 अप्रैल को देश के सभी अस्पतालों के लिये मातृ और नव शिशु देखभाल, डायलिसिस, टी.बी., एचआईवी आदि जैसी गैर-कोविड आवश्यक सेवाओं को बनाए रखने के बारे में विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इसके बाद भी दिल्ली में गैर-कोविड मरीजों को इलाज नहीं मिलने की सूचनायें मिलने पर मैंने दिल्ली के उपराज्यपाल और स्वास्थ्य मंत्री, अस्पतालों के चिकित्सा अधीक्षकों तथा केंद्र और राज्य सरकार के स्वास्थ्य अधिकारियों के साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग बैठक की है।
 
मैंने चिकित्सा अधीक्षकों से ऐसे रोगियों को टेली कंसल्टेशन, डिजिटल पे्रस्क्रिप्शन और घर तक दवाएं पंहुचाने के साथ अस्पतालों को भी पर्याप्त रक्त भंडार रखने और स्वैच्छिक रक्तदान को बढ़ावा देने को कहा है। कुल मिलाकर मौजूदा परिस्थितियों में विभिन्न स्तरों पर चल रहे कार्यों की केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय, राज्यों के स्वास्थ्य मंत्री और अधिकारी लगातार समीक्षा करते हैं, जिसके फलस्वरूप स्थिति को संभालने में हम कामयाब रहे हैं। हमारे प्रयासों की विश्व स्वास्थ्य संगठन और कई प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने सराहना की है।
 
 
चिकित्साकर्मियों की संक्रमण से सुरक्षा और सामाजिक सुरक्षा, दोनों खतरे में दिख रही हैं। कुछ लोग सरकार की अपील सुन नहीं रहे हैं और सरकार संक्रमण से उन्हें सुरक्षा की गारंटी नहीं दे पा रही है। स्वास्थ्यकर्मी इन परिस्थितियों में कब तक काम कर सकेंगे, जबकि प्रधानमंत्री ने खुद कहा है कि यह लड़ाई लंबी चलेगी ?
 
देश के कुछ भागों में कोरोना योद्धाओं से दुर्व्यवहार और उन पर हमले हुए। हमारे डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्यकर्मी निष्ठापूर्वक दिन-रात कोविड -19 के रोगियों के उपचार और उनकी जीवन रक्षा में जुटे हैं। इस कठिन समय में मरीजों के साथ वे भारत माता की भी सेवा कर रहे हैं जिसे देश में फैले संक्रमण को लेकर सबसे अधिक दर्द सहन करना पड़ रहा है। कोई मां अपनी संतान के दुख को देख कर सहज नहीं रह सकती। हमें इनका सहयोग करना चाहिये। कोराना योद्धाओं के साथ बदसुलूकी बिल्कुल बर्दाश्त नहीं की जायेगी। डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के साथ रोगियों और उनके परिजनों द्वारा दुर्व्यवहार और हमले किए जाने की घटनाओं पर गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत कड़ी कार्रवाई करने को कहा है। स्वास्थ्य योद्धाओं को निडर होकर काम करें, क्योंकि सरकार उनके साथ खड़ी है। हमारे डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्यकर्मी कोरोना के खिलाफ लड़ाई जारी रखने में हमारे सम्मान, सहायता और सहयोग के अधिकारी हैं।