राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी दिवस पर विशेष: समृद्ध और सशक्त भारत के लिए स्वदेशी जरूरी

    दिनांक 11-मई-2020   
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भारत विश्व का विशालतम परमाणु शक्ति सम्पन्न लोकतंत्रिक गणतंत्र है। मई 11, 1998 को पोखरण में किए अपने परमाणु परीक्षण के उपरांत भारत ने स्वयं के एक आणविक शक्ति सम्पन्न देश होने की गौरवमयी घोषणा की थी। स्वाधीनता के 51 वर्ष बाद, इस अवसर पर देश में प्रथम बार एक नहीं दो-दो रणनीतिक सिद्धांतों की घोषणा करते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि वी विल हेव मिनिमम न्यूक्लिअर डिटरेन्स अर्थात हम न्यूनतम इतने परमाणु ह​थियार रखेंगे कि कोई हम पर परमाणु आक्रमण का दुस्साहस नहीं कर सके। दूसरा सिद्धांत यह दिया था कि नो फर्स्ट यूज हम अपनी ओर से आक्रमण की पहल नहीं करेंगे। इंदिरा गांधी के काल में भी 1974 में भारत द्वारा परमाणु विस्फोट किया गया था। लेकिन, तब वे भारत के आणविक आयुध संपन्न देश होने की घोषण करने का साहस न कर पाई थीं और कह दिया कि यह विस्फोट शांति पूर्ण अनुसंधान के लिए था। इसलिए भारत परमाणु अप्रसार संधि के अधीन नामित आणविक आयुध संपन्न देशों की श्रेणी में नहीं आ पाया था जबकि चीन उस श्रेणी में है। वाजपेयी जी ने 1998 में सत्ता में आते ही ये दोनों ही कार्य संपन्न कर लिए थे, तत्पश्चात वर्तमान में नरेन्द्र मोदी सरकार के कार्यकाल में 2016 में, पोकरण में 11 मई को किए परमाणु विस्फोट के दिवस को देश का प्रौद्योगिकी दिवस घोषित कर दिया। अब हमें स्वदेशी भाव जागरण से भारत के आर्थिक व तकनीकी स्वालम्बन द्वारा विश्व में क्रमांक एक का शिखर राष्ट्र बनकर पुन: विश्व गुरु बनाना है।
आर्थिक पराश्रयता के कारण
भारत में विश्व की 17.7 प्रतिशत जनसंख्या निवास करती है युवा जनसंख्या की दृष्टि से तो भारत में विश्व के सर्वाधिक 20 प्रतिशत युवा हैं। विश्व की सर्वाधिक युवा जनसंख्या होने के बाद भी आज अधिकांश भारतीय उपभोक्ताओं अर्थात जनता द्वारा स्वदेशी या मेड बाई इंडिया उत्पादों के स्थान पर विदेशी उत्पादों व ब्रांडों के क्रय करते चले जाने से विनिर्माणी उत्पादन अर्थात वर्ल्ड मैनूफैक्चरिंग में आज भारत का अंश मात्र 3 प्रतिशत है। दूसरी ओर उच्च आर्थिक राष्ट्रनिष्ठा अर्थात स्वदेशी से उच्च लगाव के कारण, विश्व की मात्र 1.6 प्रतिशत जनसंख्या होने पर भी वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग में जापान का अंश 10 प्रतिशत है। जापान में उच्च आर्थिक राष्ट्रनिष्ठा अर्थात देश व स्वदेशी के प्रति प्रेमवश 96 प्रतिशत स्वदेशी या मेड बाई जापान कारें ही बिकती हैं। हमारे देश में केबल 13 प्रतिशत स्वदेशी कारें बिकती हैं और 87 प्रतिशत करें विदेशी बिकती हैं। भारत के वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग में मात्र 3 प्रतिशत अंश की तुलना में चीन का अंश 21.5 प्रतिशत होने से चीन का सकल घरेलू उत्पाद व प्रति व्यक्ति आय भारत की पांच गुनी है। सिंगापुर, जिसकी तुलना में भारत का क्षेत्रफल 5200 गुना व जनसंख्या 234 गुनी है। लेकिन, सिंगापुर के उच्च प्रौधेगिकी संपन्न निर्यात भारत की तुलना में साढ़े सात गुणे हैं। वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग में भारत का अंश मात्र 3 प्रतिशत होने के बाद भी आज हमारे देश के अधिकांश अर्थात तीन चौथाई से भी अधिक उत्पादन तंत्र पर विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों का स्वामित्व व नियंत्रण है। चीनी, अमेरिकी, यूरोपीय, जापानी या कोरियाई आदि विदेशी कंपनियां मेक इन इंडिया की आड़ में अपने अधिकांश हिस्से पुर्जे या अर्द्ध निर्मित समाग्री देश के बाहर से लाकर अपने उत्पादों को जोड़ने मात्र का काम अपनी एसेंबली लाइन्स में कर उस पर मेक इन इंडिया लिख देती हैं। अतएव हमें भारत के आर्थिक व तकनीकी स्वावलंबन के लिए हमें मेड बाई भारत या मेड बाई इंडिया उतपाद व ब्रांडों को ही क्रय में प्राथमिकता देनी होगी।
स्वावलंबन हेतु मेड बाई भारत का मार्ग
​विश्व के विनिर्माणी उत्पादन अर्थात वर्ल्ड मैन्युफैक्चरिंग में चीन का अंश 21.5 है, और हमारा अंश मात्र 3 प्रतिशत होने का प्रमुख कारण भारत में अधिकांश उपभोक्ताओं अर्थात जनता का अपनी आवश्यकता व उपयोग में लाई जाने वाली वस्तुओं के क्रय में विदेशी उत्पादों को प्राथमिकता चीनी, अमरीकी, यूरोपीय, जापानी व कोरियाई कंपनियों द्वारा मेक इन इंडिया के नाम पर आयातित साज समानों को जोड़कर अपने उत्पादों पर मेड इन इंडिया लिख दिया जाता है। वे भी विदेशी उत्पाद ही कहलाएंगे जो भारतीय निर्माताओं द्वारा उत्पादित मेड बाई भारत उत्पाद व ब्रांड हैं, वे ही स्वदेशी कहलाते हैं। हीरो की बाइक या स्कूटर या बजाज टीवीएस मेड बाई भारत हैं। होंडा के स्कूटर, बाइक व कारों पर चाहे मेड इन इंडिया लिखा हो वे विदेशी ही कहलाएंगे। फिलिप्स के बल्ब, ट्यूब लाईट व प्रेस आदि पर मेड इन इंडिया जिलखा होने पर भी वे विदेशी ही कलाएंगे। फिलिप्स हॉलैंड की कंपनी हैं। बजाजा, सूर्या, अजन्ता हेवल आदि के स्वदेशी व मेड बाई भारत उत्पाद हैं। मेड बाई भारत उत्पादों व ब्रांडों को अपना कर उत्पादन में जितनी अधिक भागीदारी बढ़ाएंगे उतना ही अधिक से अधिक घरेलू उत्पादन बढ़ाते हुए रोजगार का सृजन कर हम, देश के सकल घरेलू उत्पाद राजस्व लोगों की आय व मांग में भी उसी अनुपात में वृद्धि कर सकेंगे। ऐसी उत्पादन वृद्धि से ही सरकार के राजस्व की आय में वृद्धि होगी, व्यापार घाटे पर नियंत्रण हो सकेगा और उससे रुपया भी सुदृढ़ होगा और इसके परिणामस्वरूप देश में उन्नत प्रौधेगिकी का विकास हो सकेगा। देश के बाजारों में आज चीनी वस्तुओं की भरमार से, जहां देश के बहुतांश उद्योगों के बंद होने से हमें बेरोजगारी व बैंकों को नॉन परफार्मिंग एसेट्स का सामना करना पड़ रहा है। देश का विदेश व्यापार घाटा भी असहनीय हो रहा है।
चीन पर निर्भरता अनुचित
पिछले वर्ष भारत का चीन के साथ 54 अरब डॉलर का विदेश व्यापार घाटा था एवं वर्ष 2017-2018 में चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा 63 अरब का रहा है। भारत लगभग 90 अरब डॉलर का आयात करता रहा है। इस प्रकार भारत के साथ शत्रुतापूर्ण कार्यवाहियों में लिप्त चीन का 7-10 लाख करोड़ रुपयों से आर्थिक सशक्तिरकण करना एक गंभीर आत्मघाती कदम है।
आज चीन का सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी भारत के सकल घरेलू उत्पाद का पांच गुना है और उसकी प्रति व्यक्ति आय भी लगभग पांच गुनी है। यदि हम स्वदेशी वस्तुओं के स्थान पर चीनी वस्तुएं ही क्रय करते रहेंगे तो चीन और हमारे बीच यह अंतर बढ़ता ही जायेगा। हमने 2024 तक भारतीय अर्थव्यवस्था को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य लिया हुआ है। इसके लिए जब तक हम अपनी आर्थिक वृद्धि दर 10 प्रतिशत न कर लें, तब तक हम भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था नहीं बना पाएंगे। हम यह लक्ष्य केवल देश में बनी मेड बाई इंडिया या स्वदेशी वस्तुएं क्रय करके ही प्राप्त कर सकेंगे।