‘हलाल’ की आड़ में चल रहा बड़ा षड्यंत्र

    दिनांक 12-मई-2020
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रवि रंजन सिंह 
 
आज ‘हलाल’ शब्द एक हथियार का रूप ले चुका है। इसे गैर-मुस्लिमों पर चलाया जाता है और उसके जरिए अर्थतंत्र, राजनीति, समाज आदि को प्रभावित करने के साथ-साथ धार्मिक मान्यताओं को आघात पहुंचाया जा रहा है। लोगों को इस्लाम की मान्यताओं के नजदीक लाने की कोशिश की जा रही है

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  हलाल प्रमाणपत्र वाली सौंदर्य सामग्री, जिस पर लिखा है, ‘इडियाज फर्स्ट हलाल कॉस्मेटिक्स’
 
 
इन दिनों ‘हलाल’ शब्द की बड़ी चर्चा है। हलाल अर्थशास्त्र, हलाल मांस, हलाल वस्तु, हलाल अन्न, हलाल वस्त्र, हलाल अस्पताल, हलाल घर, हलाल गाड़ी, हलाल वेश्यावृत्ति आदि-आदि। सबसे पहले हलाल क्या है, यह जानते हैं। हलाल अरबी शब्द है। इसका अर्थ ‘वैध’, ‘तर्कसंगत’ आदि होता है। आज की उर्दूनुमा हिंदी में इसे ‘जायज’ कह सकते हैं। इस्लाम के उदय से पहले वहां रहने वाले हर मत, मजहब, कबीला की अपनी मान्यताएं और जायज-नाजायज निर्धारित थे। कालांतर में इस्लाम के इसी जायज-नाजायज को हलाल या हराम मान लिया गया।
 
मोटे तौर पर इस्लाम हर वस्तु, सेवा, आचार-विचार पद्धति को हलाल या हराम में बांटता है। अब ‘हलाल’ और ‘हराम’ संघर्ष, षड्यंत्र, युद्ध, जिहाद का मूल कारण बन गए हैं। इन शब्दों पर हम इतने निर्भर हो चुके हैं कि हम अपनी ही भाषा में अपनी ही मान्यताओं व आस्थाओं को इन दो शब्दों से प्रकट करने लगे हैं,‘‘यह हक-हलाल की कमाई है, यह हराम का पैसा नहीं है।’’
गंभीरता से आप विचार करेंगे तो आपको खुद ही पता चलेगा कि हलाल की आड़ में एक बहुत बड़ा षड्यंत्र चल रहा है। वह षड्यंत्र है वैश्विक अर्थव्यवस्था पर कब्जा करना। हलाल के पक्षधर इस बात पर जोर देते हैं कि कोई भी वस्तु बने, वह इस्लामी रीति-रिवाज से बने और इस्लामी दुनिया को फायदा पहुंचाने वाली हो। इस्लमी दुनिया को फायदा पहुंचाने का अर्थ है कि आप यदि कोई कारखाना लगाते हैं, तो उसमें काम करने वाले मुसलमान ही हों। भारत में ऐसा करना तो अभी संभव नहीं है, पर इस्लामी मुल्कों में इस बात पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है। फिर भी भारत में कुछ ऐसे संस्थान हैं, जहां मुसलमान ही काम करते हैं। यहां उन संस्थानों का नाम लिखना उचित नहीं है, पर एक सजग भारतीय को पता है कि वे संस्थान कौन से हैं। हलाल की अवधारणा के तहत ही पाकिस्तान जैसे देशों में किसी भी गैर-मुस्लिम को नौकरी पर नहीं रखा जाता है। अपवाद अवश्य मिलेंगे, लेकिन ज्यादातर संस्थान, चाहे वे सरकारी हों या गैर-सरकारी, मुसलमानों को ही नौकरी देते हैं।
 
अरब के देशों ने तो हलाल को एक हथियार बना लिया है। वे उन्हीं विदेशी कंपनियों से कोई वस्तु आयात करते हैं, जिन्हें ‘हलाल प्रमाणपत्र’ मिला हो। हलाल प्रमाणपत्र देने के लिए कंपनियों से मोटी रकम वसूली जाती है। इसके साथ ही यह भी शर्त होती है कि कच्चा माल किसी मुसलमान से ही लेना है, रोजगार मुसलमानों को ही देना है। भारत जैसे देशों में तो ये सारी शर्तें पूरी नहीं की जा सकती हैं, इसलिए ऐसे देशों को कुछ रियायत दी जाती है। इस्लामी देशों को इन शर्तों में कोई छूट नहीं मिलती है। यानी वे जो भी करें इस्लाम और उनके बंदों के लिए करें। यही इस्लाम में जायज है और यही हलाल है।
 
भारत में हलाल का प्रमाणपत्र ‘हलाल इंडिया लिमिटेड’, ‘हलाल सर्टिफिकेशन आॅथरिटी’, ‘जमीयत उलेमाए हिंद’ जैसे संगठन देते हैं। इसके बदले ये लोग जो मोटी रकम लेते हैं। कहा जाता है कि इस पैसे ये संगठन अचल संपत्ति बनाते हैं। अब तो यह भी सुनने में आ रहा है कि देश के कुछ मामलों में मुसलमानों की तरफ से जो बड़े वकील किए जाते हैं, उनका खर्च हलाल के पैसे से ही उठाया जाता है।
 
हलाल की शर्तें
हलाल को हम दो भागों में बांट कर देखें तो एक है मांसाहार खानपान और दूसरा जो मांसाहार खानपान नहीं है। कोई भी मांसाहार तब हलाल होता है जब वह कुछ शर्तों पर खरा उतरता है। जैसे काटते समय पशु का मुंह मक्का की तरफ होना चाहिए। यह कोई आपत्तिजनक बात नहीं है। पर कुछ शर्तें ऐसी हैं जो गैर-मुस्लिम के ऊपर जबरन लादी जा रही हैं। गैर-मुस्लिम के अस्तित्व को इन शर्तों से बहुत खतरा है। जैसे पशु काटते वक्त जो कलमा पढ़ा जाता है, वह एक नमाजी मुसलमान ही पढ़ेगा। जो छुरी चलाएगा, वह भी नमाजी मुसलमान होगा अर्थात् गैर-मुसलमान इसमें भागीदार नहीं हो सकते। अत: इस रोजगार और उद्योग से उन्हें बाहर कर दिया गया। यदि मुसलमान इसको केवल अपने मजहबी क्षेत्र तक सीमित रखता है तो एक बार के लिए इस भेदभाव का अनदेखा किया जा सकता है, परंतु यह तो मांस का व्यापार है, उद्योग है और इससे गैर-मुस्लिम को वंचित रखा जा रहा है। आपने ध्यान दिया होगा कि बाजारों में मांस की प्राय: सभी दुकानें मुसलमानों की हो गई हैं। पहले हिंदू की कुछ जातियां भी इस व्यापार में थीं। उन्हें एक षड्यंत्र के तहत इससे बाहर किया जा रहा है।
 
 
काफिरों की आर्थिक नाकेबंदी
 
यह भेदभाव यहीं पर ही नहीं समाप्त हो जाता, उसके आगे खाल, सींग, हड्डियां और जो कुछ भी बाकी चीजें हैं उनका व्यापार भी केवल मुसलमान के पास ही है। कत्लखाने के बाहर का तंत्र भी हलाल नियमावली अनुसार मुस्लिम का ही होता है। जैसे-क्रय-विक्रय, परिवहन, रखरखाव सभी केवल मुस्लिम के पास होने चाहिए। इस तरह से यह काफिरों के खिलाफ आर्थिक नाकेबंदी है। हलाल अर्थव्यवस्था को कई अन्य प्रकार से मुस्लिमवादी और काफिर विरोधी बनाता है। यह अप्रत्यक्ष कन्वर्जन भी है, क्योंकि इस पर पढ़ा जाने वाला कलमा यह घोषित करता है कि काटने वाला और आगे उसको खाने वाला अपना ईमान रसूल मोहम्मद पर रखता है। यदि ऐसा है तो यह गैर-मुस्लिम को क्यों बेचा जाता है या गैर-मुस्लिम इसको क्यों खाएं, क्यों खरीदें, इसका बना हुआ जूता, कमर पेटी या दवा क्यों लें।
 
भारत में पहले मांस बलि/झटका विधि से ही प्राप्त किया जाता था। इस्लाम के साथ ही यहां भिन्न-भिन्न तरह की मान्यताएं, समस्याएं, परंपराएं, प्रथाएं या कुप्रथाएं आईं। कालांतर में इस्लाम की प्रथाएं मूल संस्कृति पर हावी पड़ने लगीं और ज्यादातर सभ्यताओं ने इस्लाम के वर्चस्व को स्वीकार कर लिया। भाषा, संस्कृति, विचार, राजनीति, धर्म, नीति सभी प्रभावित हुए। आक्रमणकारियों की मान्यताएं हमने स्वीकार कर लीं। यह हलाल अवधारणा की सफलता है।
विचारणीय यह है कि तथाकथित हराम के पैसे में गलत क्या है? यदि कोई बैंक/सहकारी संस्था व्यापार के लिए आर्थिक सहयोग देती है, पर सूद लेती है जिससे संस्था-कर्मियों/सदस्यों का अर्थ लाभ होता है, तो इसमें गलत क्या है, परंतु इस्लाम इस अधिकार/हक को हराम मानता है। अर्थात् हक और हलाल दो अलग चीजें हैं। इन दो शब्दों ने इतिहास में कितनी सभ्यताओं, संप्रदायों के बीच एक अनंत युद्ध छेड़ा है।
 
ऐसे बढ़ी हलाल की मांग
 
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संसार भर में लोगों और माल का आवागमन सुरक्षित व सस्ता हो गया। उपनिवेशों के स्वतंत्र होने के फलस्वरूप बड़ी संख्या में एशिया और अफ्रीकी मूल के लोग यूरोप में प्रवास करने लगे। सदियों तक महाशक्ति रहे राष्ट्रों की शक्ति, व्यवस्थाएं व दबदबा क्षीण हो चुका था। ठीक इसी समय पेट्रो डॉलर्स आकाश छूने लगे। नई आजादी और नवशक्ति को संजोकर लंदन जैसी जगहों में एशिया और अफ्रीका के नव प्रवासियों (मुसलमानों) ने अपना वर्चस्व बनाना शुरू किया।
ये इस्लामिक गुट स्थानीय निवासियों से भी लगभग अलग-थलग रहे और अपने अलग भूखंड निर्मित किए। इन भूखंडों में छोटे-छोटे महजबी गिरोह पनपे और इन खंडों में गैर-मुस्लिम आतंकित रहने लगे। ये भूखंड अपने में छोटी-छोटी जागीरें बन गईं। इन इस्लामिक जागीरों में जिहाद की पौधशालाएं बनने लगीं। स्वाभाविक रूप से इन जागीरों में इस्लामिक बाजार व इस्लामिक विचार का बोलबाला हो गया। इसके बाद हलाल प्रमाणपत्र की मांग उठी। इस मांग का विस्तार करते हुए कई मुस्लिम कसाइयों को ब्रिटेन बुलाया गया, जिन्होंने हलाल उद्योग को बल दिया और साथ ही जनसंख्या विस्फोट व बदलाव का बीड़ा उठा लिया। इन मांगों की शृंखलाओं में अगली मांग उठने लगी कि मुस्लिमों को तो केवल हलाल खाने की ही अनुमति है। इसके बाद हर रेस्त्रां, कैंटीन यहां तक कि स्कूल व जेल में केवल और केवल हलाल ही परोसा व बेचा जाने लगा। हालांकि उस समय में कुछ गैर-सरकारी संगठनों और ईसाई संस्थाओं ने इस बात को उठाया कि क्रूरता से जीव हत्या उन्हें स्वीकार नहीं है, पर ये मजहबी टापू वहां की व्यवस्था में राजनीतिक छिद्र समझ चुके थे।
 

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हलाल प्रमाणपत्र वाले साबुन, मेहंदी और खुशबू के स्प्रे
 
 
उस छिद्र का उन्होंने फायदा उठाया और अपनी मजहबी मांगों को मनवा लिया। यह एकतरफा मजहबी युद्ध (जिहाद) गति पकड़ता गया और गैर-मुस्लिमों के एक-एक कर सभी गढ़ गिरते गए। अनुकूल माहौल देखकर इन लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि मुसलमान उसी मांस, वस्तु या सेवा को हलाल मानेंगे, जो विशेष मुस्लिम संस्थाओं से ‘हलाल प्रमाणित’ होगी। इसने जिहाद को एक आर्थिक क्रांति दी और एक के बाद एक उत्पाद सेवा और संस्कार इसकी भेंट चढ़ते गए। अब ये इस्लामी जागीरें हलाल क्षेत्र यानी शरिया लागू क्षेत्र बन गए हैं।
 
इस हालाल क्रांति ने एक के बाद एक राष्ट्र को अपनी चपेट में ले लिया। केवल 20-30 साल की यात्रा में हलाल विश्वभर में अपने पैर फैलाता गया व सक्षम होता गया। इंग्लैंड और अन्य राष्ट्र बिना किसी तीर-तलवार चलाए एक के बाद एक मोर्चा हारते गए। यह जिहाद/ षड्यंत्र इतना सुनियोजित था कि गैर-मुस्लिम को इस युद्ध का आभास भी नहीं हुआ। 80 का दशक आते-आते तीन चौथाई से ऊपर मांस उद्योग हलाल का हो चुका था अन्य उद्योगों में भी हलाल का विस्तार हो गया।
हलाल तंत्र जो कि एक शांत जिहाद था, अब विश्व अर्थव्यवस्था पर अपने प्रभुत्व के लिए फड़फड़ाने लगा। इसको व्यावसायिक रूप देने के लिए यूरोप, अरब, एशिया में सेमिनार के माध्यम से मुस्लिम व्यापारियों, राजनेताओं, सत्ताधारियों ने मुस्लिम अर्थशास्त्रियों व भाड़े पर लिए गए गैर-मुस्लिम अर्थशास्त्रियों के साथ मंथन शुरू कर दिया। इस कड़ी में मलेशिया में 1998 में एक विश्वव्यापी हलाल सम्मेलन हुआ। इसमें अगले कई दशकों की नीति बनी और यह निर्णय हुआ कि अब से इस्लामी देश केवल वही उत्पाद, सेवा निर्यात करेंगे जो हलाल प्रमाणित होंगी। यह इतिहास को मोड़ने वाला व गैर-मुस्लिम जगत की नकेल बांधकर इस्लाम के नीचे लाने वाला फरमान है। हम दीवार पर लिखी इस स्पष्ट नीति व नियति को नहीं समझ पाए।
यदि हलाल के अगले चरण (‘हलाल बैंकिंग’, ‘इस्लामिक बैंकिंग’, ‘हलाल स्टॉक एक्सचेंज’) का दौर शुरू होगा तो हमारी आर्थिक, मानसिक, राजनीतिक और धार्मिक व्यवस्थाएं इस्लाम की चपेट में आ सकती हैं। आज हमें हलाल चावल, हलाल आटा, हलाल ‘मेकअप किट’, हलाल दवाइयां आदि दी जा रही हैं। सावधान रहिए! अगली खरीदारी के समय ध्यान रखें, हलाल लेना अर्थात् अपनी सुपारी देना हो सकता है।
हानिकारक है हलाल मांस
 
किसी भी जीव को काटने के समय जो दर्द होता है, उसे कोई नकार नहीं सकता है। इसलिए जीव हत्या नहीं होनी चाहिए। लेकिन दुनिया में एक बहुत बड़ा वर्ग है, जो मांस खाता है। इसलिए यहां मांस की चर्चा हो रही है। मांस दो प्रकार से प्राप्त किया जाता है- एक हलाल और दूसरा झटका। हलाल के समय पशु गुस्से में रहता है, छूटना चाहता है, हमला करना चाहता है, उसकी मन:स्थिति उसके शरीर को प्रभावित करती है। पशु का रक्त रसायन बदल जाता है और यह विष बनाता है। इसलिए हलाल मांस को हानिकारक माना जाता है, लेकिन हलाल के पक्षधर इसे स्वास्थ्यवर्धक बताते हैं। तर्क दिया जाता है कि खून निकल जाने से मांस स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा हो जाता है। यदि मांस खाना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है तो खून हानिकारक कैसे हो सकता है ? यदि ऐसा होता तो दवाइयों में रक्त नहीं मिलाया जाता। रक्त धमनियों में सदैव बहता रहता है। शरीर की क्षमताओं और आवश्यकता के अनुसार रक्त की द्रव्यता बनी रहती है। परंतु जैसे ही रक्त हवा के संपर्क में आता है, यह जमना शुरू हो जाता है। पशु के कटने की अवधि जिस पद्धति में जितनी ज्यादा होगी उतना ही रक्त जमेगा और बाहर नहीं निकल पाएगा।

 
बढ़ती जा रही है हलाल अर्थव्यवस्था
 
एक अनुमान के अनुसार आज केवल संगठित क्षेत्र में ही हलाल अर्थव्यवस्था 4.58 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर पार कर चुकी है। 2025 तक 9.71 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर की होगी। यहां पर बता दें कि बहुत कम मुस्लिम संगठित क्षेत्र में हैं। असंगठित क्षेत्र में इनकी तुलना अन्य समुदायों से अधिक है। दूसरा मुसलमानों की विश्वव्यापी खरीदने की क्षमता 12 से 15 प्रतिशत ही है। अर्थात् इस हलाल अर्थव्यवस्था में कम से कम 85 प्रतिशत खरीदारी गैर-मुसलमानों की है। अरब के देशों ने तो हलाल को एक हथियार बना लिया है। वे उन्हीं विदेशी कंपनियों से कोई वस्तु आयात करते हैं, जिन्हें ‘हलाल प्रमाणपत्र’ मिला हो। हलाल प्रमाणपत्र देने के लिए कंपनियों से मोटी रकम वसूली जाती है। इसके साथ ही यह भी शर्त होती है कि कच्चा माल किसी मुसलमान से ही लेना है, रोजगार मुसलमानों को ही देना है।
(लेखक ‘झटका सर्टिफिकेशन आथरिटी’ के संस्थापक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं)