दिल्ली: काम कम, प्रचार ज्यादा

    दिनांक 12-मई-2020
Total Views |
पाञ्चजन्य प्रतिनिधि 
 
संकट के इस दौर में भी दिल्ली में केजरीवाल सरकार ऐसा निठल्लापन दिखा रही है कि लोग सकते में हैं। अस्पतालों में न तो मरीजों का ठीक से इलाज हो पा रहा है, और न ही गरीबों को राशन मिल रहा है। केजरीवाल कह रहे हैं कि खजाना खाली हो रहा है, इसलिए वे पेट्रोल-डीजल और शराब के दाम बढ़ा रहे हैं, तो दूसरी ओर वे अपने प्रचार में पानी की तरह पैसा बहा रहे हैं
k_1  H x W: 0 x
दिल्ली के लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल के बाहर 24 घंटे ऐसी ही भीड़ 
जमा रहती है। हर कोई दिल्ली सरकार की कार्यशैली पर सवाल उठाता रहता है।
 
 
कहने को तो दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल यही कहते हैं कि कोरोना संकट में दिल्ली सरकार की राशन योजना पर निर्भर 72,00000 लोगों को मुफ्त राशन दिया जा रहा है। कोई भूखा न रहे, इसके लिए भोजन वितरण भी किया जा रहा है। साथ ही हर व्यक्ति को 5 किलो राशन की जगह 7.5 किलो राशन भी दिया जा रहा है और विधवाओं, वृद्ध लोगों और दिव्यांगों को मिलने वाली पेंशन को दोगुना कर दिया गया। लेकिन केजरीवाल की बातों और दावों का जमीन पर उतना असर नहीं दिखता, जितना उनकी सरकार की टीवी पर विज्ञापन प्रचार शैली में देखने को मिलता है।
 
कोरोना संकट के बीच दिल्ली सरकार लोगों के लिए क्या कर रही है, इस सवाल के उत्तर में केजरीवाल से लेकर उनकी सरकार के मंत्री घोषणाओं का पिटारा खोल देते हैं। पर जब ऐसे सवाल पूछे जाते हैं कि दिल्ली में 72,00000 लोगों को राशन कहां मिल रहा है ? दिल्ली से लाखों लोगों का पलायन क्यों हुआ ? दिल्ली के सभी 11 जिले ‘रेड जोन’ कैसे हो गए ? ‘लॉकडाउन’ के बावजूद दिल्ली में कोरोना के 6,000 से अधिक मामले कैसे पार हो गए ?
 
ऐसे सवालों पर केजरीवाल सरकार या तो चुपी साध लेती है या फिर एक नई घोषणा कर देती है। केजरीवाल सरकार की कार्यशैली और प्रबंधन को लेकर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं, क्योंकि केजरीवाल ने दिल्ली की सत्ता संभालने से पहले एक नई राजनीतिक संस्कृति स्थापित करने की बात खूब जोर से की थी, लेकिन बात चाहे सरकार के कामकाज के तरीके की हो या मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति की, केजरीवाल सरकार दोनों ही मामलों में शासकों की उसी जमात में खड़ी नजर आ रही है, जिसे लेकर जनता अक्सर कथनी-करनी में अंतर की नजर से देखती है। दक्षिणी दिल्ली के सांसद रमेश सिंह बिधूड़ी कहते हैं, ‘‘केजरीवाल और उनकी सरकार की कथनी-करनी में अंतर है। कोरोना संकट में दिल्ली की जनता आज उसी का दुष्परिणाम भोग रही है। केजरीवाल कहते हैं 72,00000 लोगों को राशन मिल रहा है, लेकिन लोग कहते हैं कि राशन नहीं मिल रहा। केजरीवाल दिल्ली में लाखों लोगों को खाना खिलाने की बात करते हैं पर यह खाना कहां बन रहा है, किसे मिल रहा है, किसी को कुछ नहीं पता। मोहल्ला क्लीनिक से लेकर दिल्ली सरकार के अस्पतालों में बदहाली की शिकायतें खुद डॉक्टर कर रहे हैं। केजरीवाल धरातल पर भले कुछ न करें, लेकिन विज्ञापनों में उनका काम जमकर बोलता है। विज्ञापन प्रचार पर खर्च होने वाले इस पैसे का इस्तेमाल कोरोना से लोगों को बचाने और राहत देने के लिए होना चाहिए, न कि अपना चेहरा टीवी पर दिखाने के लिए। केजरीवाल सरकार सभी मोर्चों पर विफल हो रही है।’’
 
दूसरी ओर दिल्ली के वरिष्ठ कांग्रेसी नेता और पूर्व सांसद अजय माकन कहते हैं,‘‘दिल्ली में कोरोना के अनेक मामले ऐसे हैं, जिनके स्रोत के बारे में पता नहीं है। यह स्थिति बहुत चिंताजनक है। केजरीवाल को बताना चाहिए कि क्या दिल्ली में कोरोना तीसरे चरण में जा रहा है ? दिल्ली इकलौता राज्य है, जहां 55 चिकित्साकर्मी संक्रमित हुए हैं।’’
 
असल में मजदूरों के दिल्ली से पलायन के बाद से ही केजरीवाल और उनकी सरकार पर जिम्मेदारी से बचने और प्रबंधन में विफल रहने के आरोप लग रहे हैं। मजदूरों के पलायन ने केजरीवाल सरकार की भूमिका पर सवाल उठाया, तो इसके बाद कोटा से दिल्ली के छात्रों को वापस लाने का मुद्दा विवाद का नया कारण बना। छात्रों के परिजनों को उम्मीद थी कि 21 दिन बाद ‘लॉकडाउन’ खुलने पर बच्चे घर आ जाएंगे, लेकिन जब सरकार ने ‘लॉकडाउन-दो’ लागू किया तो बच्चों के साथ परिजनों की बेचैनी बढ़ गई। बच्चों और परिजनों की परेशानी को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समझा। उन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत से बातचीत करके अपने राज्य के 11,000 छात्रों को कोटा से निकाल लिया। जब यह सब कुछ हो रहा था तब केजरीवाल मौन धारण किए हुए थे। इसके बाद केजरीवाल सरकार ने दिल्ली के बच्चों को कोटा से निकालने का निर्णय लिया। इस निर्णय पर अमल करने से पहले ही सोशल मीडिया पर इसका प्रचार शुरू कर दिया गया। इससे लोगों ने अनेक सवाल भी उठाए।
दरअसल, ‘लॉकडाउन-एक’ की शुरुआत से ही केजरीवाल सरकार के प्रबंधन की विफलता साफ झलकने लगी थी। सबसे पहले तब्लीगी जमात को लेकर केजरीवाल सरकार की पोल खुली। केजरीवाल की पार्टी के कई मुस्लिम नेता और विधायक तब्लीगी जमात के बचाव में लगे रहे। इसके बाद उत्तर प्रदेश और बिहार के प्रवासी श्रमिकों के साथ केजरीवाल सरकार का दुर्व्यवहार खुलकर सामने आया।
 
राशन वितरण में घपला
राशन वितरण में घपले और गुणवत्ता की शिकायतें भी केजरीवाल सरकार के लिए नई मुसीबत बनी। कहने को दिल्ली सरकार गरीबों को बिना राशन कार्ड के भी राशन देने का इंतजाम कर रही है। पर राशन में हेराफेरी करने वाले जनकपुरी के एक डीलर पर एफआईआर दर्ज कर उसकी गिरफ्तारी के आदेश सरकारी व्यवस्था को मुंह चिढ़ा रहे हैं। हुआ यह कि जनकपुरी में एक सरकारी दुकान पर राशन आया लेकिन दुकानदार ने सारा राशन बाहर भेज दिया और खुद दुकान बंद कर फरार हो गया। इसी तरह एक अन्य राशन वाले ने भी ट्रक दिल्ली से बाहर भेजने की कोशिश की। लोगों ने शिकायत की तो उसकी गिरफ्तारी के आदेश भी जारी किए गए। ये तो वे मामले हैं, जो सामने आए, लेकिन ऐसी हेराफेरी की कहानी पूरी दिल्ली में सुनने को मिल रही है। कहीं राशन मिल नहीं रहा है, तो कहीं कम मिल रहा है। कहीं राशन की गुणवत्ता की शिकायतें हैं। इसी प्रकार दिल्ली के कई क्षेत्रों में राशन के नाम पर गेहुं वितरण के मामले भी सामने आए हैं। सवाल उठता है कि जब ‘लॉकडाउन’ है और चक्की खुल नहीं रही है, तो गेहूं पिसेगा कहां से और जब पिसेगा नहीं तो लोगों को आटा कहां से मिलेगा। राशन वितरण के काम में शिक्षकों की ड्यूटी लगा दी गई। दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन सेवा बंद है। ऐसे में राशन वितरण के लिए शिक्षक जाएं भी तो जाएं कैसे। पर केजरीवाल सरकार का आदेश है तो लोग जैसे-तैसे जा रहे हैं। इस तरह के अव्यावहारिक फैसलों ने भी केजरीवाल सरकार की नीतियों को पलीता लगाने का काम किया है।
 
बदहाल अस्पताल
लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में कोरोना के मरीजों के इलाज में घोर लापरवाही बरती जा रही है, मरीजों के साथ अमानवीय, क्रूर और संवेदनहीन व्यवहार किया जा रहा है। कोरोना के मरीजों के इलाज के लिए इस अस्पताल को मुख्य अस्पताल बनाया गया है। पर इस अस्पताल की क्या स्थिति है, यह एक मरीज के परिजन के वीडियो से पता चलता है। अस्पताल में भर्ती अरविंद गुप्ता की बेटी प्रतिभा गुप्ता और उनकी पत्नी ने एक वीडियो बना कर अस्पताल और सरकार की पोल खोल दी। इस वीडियो के वायरल होने के बाद सरकार के कान पर जूं रेंगी और मरीज की सुध ली। प्रतिभा गुप्ता ने वीडियो में बताया कि 16 अप्रैल की रात में दो बजे उसके पिता दो मिनट के लिए बेहोश हो गए थे। वे इलाज के लिए उनको शालीमार बाग में फोर्टिस अस्पताल ले गए। वहां के डॉक्टरों ने जांच करने के बाद कहा कि वे वायरस से संक्रमित हैं। सरकारी आदेश के अनुसार इनका इलाज सिर्फ लोकनायक जयप्रकाश अस्पताल में ही होगा। प्रतिभा के अनुसार ,‘‘18 अप्रैल की शाम को अस्पताल के बाहर एंबुलेंस में दो-तीन घंटे के इंतजार के बाद मेरे पिता को लोकनायक अस्पताल वालों ने भर्ती किया। भर्ती किए जाने के बाद उन्हें किसी डॉक्टर ने नहीं देखा, यहां तक कि उनको खाना भी नहीं दिया गया, जबकि वे डायबिटीज/ शुगर, हाइपरटेंशन के भी मरीज हैं। अगले दिन सुबह यानी 19 अप्रैल को उनको नाश्ता दिया गया। इसके बाद दोपहर में उनसे कहा गया कि नरेला ‘क्वारंटीन सेंटर’ में भेजा जाएगा। सारा दिन वे इंतजार करते रहे। आधी रात को कहा गया कि अब तो देर हो गई कल भेजेंगे।’’ प्रतिभा के अनुसार, ‘‘20 अप्रैल को सुबह 5 बजे उसके पापा का फोन आया और उन्होंने रोते हुए कहा कि मुझे 102 डिग्री बुखार है। मुझे बचाने के लिए यहां से निकालो और किसी निजी अस्पताल में ले चलो। यहां अभी तक न तो डॉक्टर ने देखा और न ही कोई उनकी सुनवाई कर रहा है।’’
अपने पिता की ऐसी हालत सुन कर प्रतिभा ने अपनी मां के साथ वीडियो बनाया और उसे प्रधानमंत्री और केजरीवाल को ‘टैग’ कर ट्विट कर दिया। यह वीडियो सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हुआ। इसके बाद सरकार और डॉक्टर हरकत में आए और उसके पिता की सुध ली गई और उनके लिए अलग से कमरे की व्यवस्था भी की गई। यह जानकारी भी प्रतिभा गुप्ता ने ही दूसरा वीडियो जारी करके दी।?

k_1  H x W: 0 x 
 
दिल्ली में शराब के लिए यूं उमड़ी भीड़। इससे वायरस का खतरा और बढ़ गया है।
 
 
एक अन्य मामले में दिल्ली पुलिस के सिपाही ने भी सरकार के दावों की पोल खोल दी। सिपाही सचिन तोमर 17 अप्रैल को कोरोना से पीड़ित पाया गया। तिलक विहार पुलिस चौकी में तैनात सचिन नजफगढ़ के चौधरी ब्रह्मप्रकाश चरक आयुर्वेद संस्थान में भर्ती हुए। सचिन ने भी अस्पताल से अपना एक वीडियो वायरल किया। सचिन ने कहा कि गले में खराश या खराबी और बुखार के लिए भी यहां किसी को कोई दवाई नहीं दी जा रही है। पीने के लिए गर्म पानी भी नहीं दिया जाता। बीस मरीजों पर सिर्फ एक ‘बाथरूम’ है। सचिन ने कहा कि उनके बच्चों की जांच की बात आई तो कहा गया कि प्राइवेट सिटी लैब में 4,500 रुपए में खुद जांच करा लो।
 
दिल्ली पुलिस के एक जवान की मौत ने भी केजरीवाल सरकार को कटघरे में खड़ा कर दिया। मरीजों और उनके परिजनों के दर्द बयां करते अनेक वीडियो वायरल हैं, जो दिल्ली में कोरोना संकट में केजरीवाल सरकार के दावों और प्रबंधन की पोल खोल रहे हैं। पर असल सवाल यह है कि इतनी विफलताओं की यह कहानी मुखर तौर पर सामने क्यों नहीं आ पा रही है ?
 
प्रचार पर बह रहा है पैसा
दरअसल, केजरीवाल सरकार पर एक आरोप प्रचार तंत्र पर बेहिसाब पैसा खर्च करने का भी लग रहा है। विज्ञापनों पर उनकी सरकार करोड़ों रुपए खर्च कर रही है। 2019 की एक आरटीआई से विज्ञापनों पर खर्च के जो आंकड़े आए थे, वे चौंकाने वाले थे। आरटीआई के जवाब में बताया गया था कि 2015 से 2019 तक केजरीवाल सरकार ने 311.78 करोड़ रुपए खर्च किए, जो पूर्ववर्ती शीला दीक्षित सरकार से चार गुना अधिक है। तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी केजरीवाल की विज्ञापन नीति बदस्तूर जारी है। दिल्ली की सड़कों पर हर जगह केजरीवाल सरकार की स्तुति वाले विज्ञापन मिल जाएंगे। न्यूज चैनलों और एफ.एम रेडियो पर उनके विज्ञापन छाए ही रहते हैं। समाचार पत्रों में पूर्ण पृष्ठ वाले विज्ञापन अक्सर दिखते हैं। प्रमुख दैनिक समाचार पत्रों द्वारा लिया जाने वाला औसत विज्ञापन शुल्क कांग्रेस सरकार के समय की तुलना में 20-40 प्रतिशत तक बढ़ गया है। कोरोना संकट के समय में भी देश के सभी मुख्यमंत्रियों की तुलना में केजरीवाल टीवी पर अधिक छाए रहते हैं। इसलिए भी केजरीवाल के प्रचार पर उनके विरोधी अधिक सवाल उठाते हैं।
 
एक तरफ तो केजरीवाल सरकार अपने प्रचार के लिए करोड़ों रु. फूंक रही है, तो दूसरी ओर खजाना खाली होने की बात भी कह रही है। खजाना भरने के लिए ही दिल्ली सरकार ने शराब की दुकानें खोलने की इजाजत दे दी और शराब पर 70 प्रतिशत कोरोना शुल्क लगा दिया। खजाना भरने की केजरीवाल की चाहत दिल्ली वालों की सेहत और जेब, दोनों पर भारी पड़ सकती है। दिल्ली में शराब की दुकानों के बाहर हजारों की संख्या में लोग जमा हो गए। इससे वायरस के फैलने का डर बढ़ गया है। महामारी पर नियंत्रण पाए जाने तक दिल्ली में शराब की दुकानें बंद रहें, इसके लिए दिल्ली उच्च न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर की गई है। यह याचिका गैर सरकारी संगठन ‘सिविल सेफ्टी काउन्सिल आॅफ इंडिया’ ने दायर की है। अधिवक्ता अरविन्द वशिष्ठ के माध्यम से दायर याचिका में कहा गया है कि दिल्ली की जनता पिछले कई दिन से ‘लॉकडाउन’ के नियमों का पालन कर रही थी, लेकिन शराब की दुकानें खुलने के बाद किसी भी नियम का पालन नहीं हो रहा है। इससे नागरिकों की जिंदगी को खतरा हो सकता है।
 
इस बीच दिल्ली की जनता पर दोहरी मार करते हुए केजरीवाल सरकार ने पेट्रोल और डीजल के दाम भी बढ़ा दिए। पेट्रोल में 1.67 रु. प्रति लीटर और डीजल में 7.10 रु. प्रति लीटर की बढ़ोतरी की गई। ‘लॉकडाउन’ के कारण दिल्ली सरकार को राजस्व में भारी नुकसान हुआ है। इसलिए सरकार पेट्रोल-डीजल पर वैट बढ़ाकर अपने राजस्व में वृद्धि करना चाहती है।
पर असल सवाल यह है कि जो सरकार अपनी आय बढ़ाने के लिए तरह-तरह के कर लगा रही है, वही फिर अपने प्रचार के लिए पैसा पानी की तरह क्यों बहा रही है ? शायद इन्हीं कारणों से दिल्ली के लोग कहने लगे हैं कि यह सरकार न तो काम की है और न ही काज की।