मुंबई : बेहाल अस्पताल, लाचार मरीज, आखिर कौन है इसका जिम्मेदार ?

    दिनांक 12-मई-2020
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राजेश प्रभु सालगांवकर
‘मुम्बई बचाओ अभियान’ की इस दूसरी कड़ी में आइए जानते हैं कि राज्य सरकार की लापरवाही से मुम्बई के अस्पतालों में कैसी भगदड़ मची हुई है। अस्पतालों में इतनी भीड़ है कि वायरस से संक्रमित मरीजों को भर्ती तक नहीं किया जा रहा है। अस्पताल के वार्ड में मृत शरीरों के बगल में ही मरीजों को लिटाया जा रहा है
 
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इस रपट के लिखे जाने तक अकेले मुम्बई शहर में चायनीज वायरस से पीड़ितों की संख्या 10,000 पार कर गई है। इसमें मुम्बई से सटे ठाणे, कल्याण, डोम्बिवली, नवी मुम्बई, पनवेल शामिल हैं, इसमें मुम्बई महानगरीय क्षेत्र नहीं। मुम्बई में चिकित्सा सेवा का बुरा हाल है। मुम्बई महापालिका के अंतर्गत आने वाले तीन अस्पताल राज्य के बड़े अस्पतालों में माने जाते हैं। इन तीनों में अराजक स्थिति है, जबकि राज्य की सत्ता और मुम्बई महापालिका की सत्ता भी शिवसेना के पास है। इसके बावजूद राज्य सरकार और मुम्बई महापालिका के बीच समन्वय का अभाव है।
 
मुम्बई में राज्य सरकार के जो अस्पताल हैं, उनमें चिकित्सक और अन्य कर्मचारियों की कमी है और जो हैं भी उनके पास इस महामारी से लड़ने के लिए आवश्यक सुविधाएं नहीं हैं। अनेक अस्पतालों में वेंटिलेटर की कमी है। डॉक्टरों के लिए पीपीई किट हैं, लेकिन अन्य कर्मियों के लिए नहीं हैं। अस्पताल के कर्मचारियों (जैसे सफाई कर्मचारी, सहायक आदि) को कोरोना से संबंधित कोई प्रशिक्षण भी नहीं दिया गया है। लगभग एक महीने पहले दक्षिण मुम्बई स्थित सेंट जॉर्ज अस्पताल की एक वरिष्ठ नर्स का वीडियो सामने आया था। उन्होंने बताया था कि अस्पतालों में सफाई कर्मचारी संक्रमण के कारण मरे लोगों के शवों को अपना बचाव किए बिना इधर-उधर कर रहे हैं। यही नहीं कर्मचारी बिना हाथ धोए और भी काम करते हैं और इसी तरह घर चले जाते हैं। इसके बावजूद राज्य सरकार ने अस्पतालों की व्यवस्था को ठीक करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया। इसका नतीजा यह हुआ है कि उन कर्मचारियों के जरिए वायरस घनी बस्तियों तक में पहुंच गया है। उल्लेखनीय है कि मुम्बई में छोटे कर्मचारी चालों या झुग्गियों में ही रहते हैं और वहां घनी आबादी होती है। सरकार ने अपनी इस नाकामी पर पर्दा डालने के लिए ‘रेनड्राप’ नामक कंपनी को सरकार की छवि सुधारने का काम दे दिया है।
 
 
वेंटिलेटर तथा पीपीई किट की खरीदारी बंद
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आह्वान के बाद अनेक कंपनियां अपने मूल काम को छोड़कर वेंटिलेटर तथा पीपीई किट बना रही हैं। इसमें मुम्बई स्थित महिंद्रा कंपनी तथा पुणे की बजाज कंपनी आगे है, लेकिन महाराष्ट्र सरकार ने वेंटिलेटर और पीपीई किट जल्दी खरीदना उचित नहीं समझा। वेंटिलेटर के लिए जो निविदा निकाली गई थी, वह तकनीकी कारणों से दो बार रद्द हो गई है। अनेक उद्योग पीपीई किट, मास्क आदि की आपूर्ति करने के लिए तैयार हैं। केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी इस समय नागपुर में हैं। उन्होंने भी कहा है कि वे नागपुर से राज्य सरकार को 1,00000 पीपीई किट की आपूर्ति कर सकते हैं, लेकिन राज्य सरकार ने उनकी बात अनसुनी कर दी है।
अस्पतालों में भारी भीड़
ऐसे तो मुम्बई के बड़े अस्पतालों में हमेशा ही भीड़ रहती है, लेकिन इन दिनों इतनी भीड़ रहती है कि रोगियों को रखने की जगह नहीं मिल रही है। कुछ दिन पहले तो अनेक मरीजों को शहर के फ्लाईओवर के नीचे रखना पड़ा था। भाजपा नेता किरीट सोमैया ने इस मामले को उठाया तो उन रोगियों को जैसे-तैसे दूसरी जगहों पर ले जाया गया। ऐसी स्थिति मुम्बई में कभी नहीं हुई थी। आतंकवादी हमलों तथा अन्य प्राकृतिक आपदाओं के समय इन्हीं अस्पतालों ने अच्छा काम किया था।
सूचनाओं का अभाव
राज्य सरकार और अस्पतालों के बीच सूचनाओं का घोर अभाव दिख रहा है। इस कारण भी अस्पतालों की हालत खराब है। अभी अस्पतालों में जो काम हो रहा है, उसके पीछे वे डॉक्टर और अन्य कर्मचारी हैं, जो सेवाभाव और लगन के साथ काम कर रहे हैं। सूचनाओं के अभाव के कारण संक्रमित रोगियों को अस्पतालों में दाखिल होने के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। वहीं निजी अस्पताल वायरस पीड़ितों के इलाज के लिए लाखों रुपए लूट रहे हैं। जबकि केंद्र सरकार ने कहा था कि संक्रमित लोगों का इलाज चाहे सरकारी या निजी अस्पताल में हो, वह मुफ्त होगा। इसके लिए महाराष्ट्र सरकार ने एक लंबे समय तक निजी अस्पतालों के लिए कोई आदेश जारी नहीं किया और जब जारी किया तो निजी अस्पताल वाले कहते हैं कि ऐसा कोई आदेश नहीं आया है और वे मरीजों को लूट रहे हैं। कुछ अस्पतालों से यह खबर आई है कि वायरस से पीड़ित डॉक्टर भी मरीजों का इलाज कर रहे हैं। यदि यह सच है तो न जाने कितने लोग संक्रमित हुए होंगे। यह सरकार की नाकामी ही है।
 
एम्बुलेंस सेवा ठप
मुम्बई में एम्बुलेंस सेवा लगभग ठप है। लोगों को एक एम्बुलेंस के लिए कई दिन तक इंतजार करना पड़ रहा है। पिछले दिनों एक पुलिसकर्मी को समय पर एम्बुलेंस नहीं मिलने से उसकी मौत केईएम अस्पताल के गेट पर ही हो गई। वह बीमार था और अपनी जांच रपट लेने के लिए अस्पताल गया था। वहां उसके संक्रमण की जानकारी हुई तो उसे कस्तूरबा अस्पताल जाने को कहा गया। उसने एम्बुलेंस की मांग की तो कहा गया कि बाहर से कोई गाड़ी ले लो। इस ‘लॉकडाउन’ में कोई गाड़ी नहीं मिली और वह बिना इलाज के ही चल बसा। जो एम्बुलेंस सेवा चल भी रही है तो उसके चालक को समय पर यह नहीं बताया जाता है कि अमुक रोगी को किस अस्पताल में ले जाना है। इस कारण कई एम्बुलेंस रोगी को लेकर यहां-वहां खड़ी रहती हैं।
 
एम्बुलेंस से जुड़ी एक अन्य घटना मुम्बई की हालत बताने के लिए काफी है। सरकारी अस्पतालों में जगह नहीं मिलने पर एक एम्बुलेंस वाले ने एक रोगी को निजी अस्पताल पहुंचा दिया। इसकी जानकारी रोगी को हुई तो उसने भर्ती होने से यह कहते हुए मना कर दिया कि इसका खर्च कौन भरेगा। इसके बाद एम्बुलेंस चालक ने उसे फिर से घर छोड़ दिया। दो दिन बाद वह रोगी एक सरकारी अस्पताल में भर्ती हो पाया।
 
निजी अस्पताल बंद
मुम्बई में किसी निजी अस्पताल में अगर एक भी वायरस से संक्रमित रोगी मिलता है, तो उस अस्पताल को पूरी तरह बंद कर दिया जाता है। इस कारण बहुत सारे निजी अस्पताल बंद हो गए हैं। जो डॉक्टर निजी तौर पर काम करते हैं, उन्होंने भी अपना काम बंद कर दिया है। इस कारण अन्य रोगियों को भी बहुत परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। सरकार ने निजी अस्पतालों को बंद करते समय यह नहीं सोचा कि इसका आने वाले समय में कितना बुरा असर होगा। आम आदमी छोटी-माटी बीमारी के लिए भी भटक रहा है। सरकारी अस्पतालों में इतनी भीड़ है कि वह वहां तक जाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री देंवेंद्र फडणवीस ने आरोप लगाया है कि सरकार अपनी असफलताओं को छुपाने के लिए मरीजों की संख्या को कम बता रही है।
इसमें सचाई क्या है, यह तो समय बताएगा, पर मुम्बई की जो हालत है, वह बहुत ही दयनीय है। इससे पहले मुम्बई इस तरह बेबस कभी नहीं रही है। उम्मीद है कि राज्य सरकार को सद्बुद्धि आएगी और वह मुम्बई को बचाने के लिए कुछ करेगी।
मरीजों के बगल में शव
 
6 मई को मुम्बई के सायन अस्पताल का एक वीडियो बाहर आया है। भाजपा विधायक नितेश राणे के जरिए बाहर आए इस वीडियो में दिख रहा है कि वायरस पीड़ित मरीजों के बगल के पलंगों पर शव पॉलीथी में लपेटे रखे हैं। इस अस्पताल का संचालन बृहन्मुंबई महापालिका परिषद करती है। हैरानी की बात है, इस खुलासे पर न तो महापालिका परिषद ने कुछ कहा है और न ही मुख्यमंत्री कार्यालय की ओर से कोई बयान आया है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)