कोरोना काल की सीख

    दिनांक 13-मई-2020   
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कोरोना वायरस से उपजा संकट बहुत कुछ सिखा रहा है। सबसे बड़ी सीख तो यह है कि हमें गांवों की ओर देखना होगा। यदि गांवों में ही शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार आदि की सुविधाएं हों तो लोगों का नगरों की ओर पलायन नहीं होगा। यह दायित्व केवल सरकार का नहीं, पूरे समाज का है

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 ‘लॉकडाउन’ के दौरान शहर से अपने गांव की ओर जाता एक श्रमिक परिवार।
अब इनके लिए गांव में ही रोजगार उपलब्ध कराने की आवश्यकता है।
 
 
कोरोना संक्रमण के कारण पृथ्वी की गति के सिवाय, सारी गति रुक-सी गयी है। विमान नहीं उड़ रहे, ट्रेनें नहीं चल रहीं, कारें नहीं दौड़ रहीं। मनुष्य का पैदल घूमना भी बंद-सा हो गया है। पृथ्वी-प्रकृति अपनी स्वच्छ-स्वस्थ सांस ले रही है। इन चंद दिनों में मानो सारा प्रदूषण बह गया। नदियों का जल स्वच्छ हुआ है, प्राणी निर्भय होकर नगरों के आसपास आकर विचरण करने लगे हैं, हवा इतनी स्वच्छ हुई है कि पंजाब के जालंधर से हिमालय के हिमाच्छादित शिखर सीधे दिख रहे हैं।
 
भले ही यह सब कुछ समय के लिए क्यों न हो, पर जो असंभव-सा था, वह सब इस बीच संभव होता दिख रहा है। गति थम जाने से क्या होता है? यह जानना आवश्यक है और दिलचस्प भी। गति बढ़ने से क्या हुआ है? यह जानेंगे तो, गति रुकने से क्या होगा, यह समझना आसान होगा।
 
श्री एस. के. चक्रवर्ती अपने लेख ‘राइसिंग टेक्नोलॉजी ऐंड फालिंग एथिक्स’ में लिखते हैं, ‘‘आधुनिक विज्ञान और उससे निकली प्रौद्योगिकी का विकास ऐसे समय हुआ जब मनुष्य जाति, पृथ्वी और प्रकृति से अपनेपन के भावनात्मक संबंधों के बंधन तोड़ना शुरू कर रही थी। प्रबुद्ध वस्तुनिष्ठता का तकाजा था कि मनुष्य और प्रकृति के संबंध मजबूत करने वाले लक्षणों, क्रियाकलापों और युगों से चली आ रही रूढ़ियों को धता बताते हुए उन्हें अंधविश्वास करार दे दिया जाए। भविष्य की चिन्ता न करने का सोचा-समझा रवैया प्रगतिशील और मुक्त मानसिकता की निशानी माना जाने लगा। असल अलगाव यहीं से हुआ। जब कोई लगाव न रहे तब क्या भला और क्या बुरा?’’
 
‘‘मानव व्यवहार और प्रकृति के बीच नीति-अनीति का विचार तिरोहित हो जाने का सबसे बड़ा स्पष्टीकरण ऐसी भावना में ही निहित है। इसमें कोई संदेह नहीं कि पदार्थ, वायु, जल, काल, दूरी आदि के नियंत्रण और विजय द्वारा विज्ञान-तकनॉलॉजी के समन्वय से बाह्य भौतिक जीवन के अनेक पहलू लाभान्वित हुए, तथापि तालमेल के स्थान पर अक्खड़पन, और डर और सम्मान के स्थान पर चिड़चिड़ेपन और अहंकार की ओर झुकाव की अनदेखी नहीं की जा सकती। यह विचलन ही मानव और प्रकृति के अलगाव का सबसे मुख्य कारण रहा है।’’
 
‘‘मनुष्य और प्रकृति के बीच का यह परायापन परिवेश और पर्यावरण के प्रति अनाचार का मुख्य कारण ही नहीं बना, वरन् पराएपन का यह लोकाचार मानव समाज के सभी आयामों में भी दखल देने लगा। राष्ट्र से राष्ट्र के, संगठन से संगठन के, मनुष्य से मनुष्य के और ऐसे अन्य संबंध विज्ञान-प्रौद्योगिकी इंजन की शक्ति के साथ मिल कर भौतिक सम्पन्नता के चरम लक्ष्य के उत्तरोत्तर साधन बने हैं। इसीलिए आज अन्तरराष्ट्रीय प्रबंधन सम्मेलनों में विचारों के आदान-प्रदान को बढ़ावा नहीं दिया जाता। वहां गोपनीय राजनीतिक और भौतिक मंसूबे अन्दर ही अन्दर काम करते रहते हैं। इन सबका एकमात्र उद्देश्य होता है विज्ञान-प्रौद्योगिकी की दौड़ को तीव्र से तीव्रतर करना। इस प्रक्रिया से नैतिकता की कोमल भावनाएं धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती हैं और न केवल प्रकृति ही महज एक स्रोत, साधन रह जाती है, वरन् मनुष्य भी अनैतिक ढंग से इस चतुर तकनीक केन्द्रित नजरिए को सहजता से अपने आप में ढाल देता है।’’औजार से मशीन, मशीन से स्वचालितता, स्वचालितता से चिप- यह निरन्तर प्रगति मानव को मानवता से दूर अधिक दूर करती जा रही है।’’
 
इस रवैये के कारण मनुष्य न केवल प्रकृति से, वरन् समाज और संगी-साथियों से भी दूर और अलग-थलग पड़ता जा रहा है। परिणामत: वह अपने परिवेश से, अपनों से, परायों से व्यवहार में अधिक घमण्डी, अधिक क्रूर और अधिक हिंसक होता जा रहा है। और इस प्रकार की मानसिकता वाले समाज ही (तथाकथित) ‘विकसित, आधुनिक’ समाज और मानव समुदाय हैं। इस ‘प्रगतिशील -विकसित’ समाज के मूल, कुल, अपरिपक्व ज्ञान और जीवन के अपेक्षाकृत अल्प अनुभव के आधार पर ऐसा समझ में आता है कि उनके निष्कर्ष गलत, अधूरे और असंगत हैं। अप्रत्याशित गति बढ़ने से यह हुआ है। अब गति रुक-सी गई है तो नदियों का पानी स्वच्छ बहने लगा है, हवा शुद्ध हुई है, व्यक्ति परिवार में अपनों के बीच अधिक समय बिता रहा है, रिश्तों की, संबंधों की ऊष्मा को सब महसूस कर रहे हैं, कितनी कम आवश्यकताओं के साथ जीवन आनंद से गुजर सकता है, यह अब ध्यान में आ रहा है। भारतीय चिंतन का सार बताने वाला एक संदेश इन दिनों फैल रहा है, ‘व्हैन यू कैन नॉट गो आउटसाइड, गो इनसाइड!’ बाहर की यात्राएं थमने से भीतर झांकने की नई यात्रा शुरूहुई है।
 
पर आगे क्या? दुनिया का आर्थिक पहिया रुक-सा गया है, नौकरियां छूट गयी हैं, वेतन देने हैं, पुराना बकाया चुकाना है, लोग शहर छोड़कर अपने गांव, अपने राज्य में पहुंच गए हैं, जो बीच में फंस गए हैं, उन्हें राज्य सरकार की सहायता से गांव पहुंचाया जा रहा है। भारत जैसे वैविध्यपूर्ण विशाल जनसंख्या के देश के सामने यह एक प्रश्न खड़ा है। बिली लिम नामक लेखक ने अपनी पुस्तक ‘डेयर टू फेल’ में एक महत्वपूर्ण बात कही है। वे कहते हैं कि जब आप किसी समस्या का सामना करते हो तब अपने आपको समस्या से दूर रखो, तो वह परिस्थिति बनती है। उस परिस्थिति का आप विश्लेषण करोगे तो वह चुनौती बनेगी। और यदि आप अपनी शक्ति और संसाधनों का विचार कर उस चुनौती का सामना करने की सोचो तो वह अवसर बनेगी।
भारत की परम्परागत शिक्षा पद्धति नया सोचना, प्रश्न पूछना, यह थी। इससे प्रश्नों के उत्तर स्वयं ढूंढने के लिए प्रोत्साहन मिलता था। शिक्षक या आचार्य, कैसे सीखना, यह पढ़ाते थे। जीवन कैसे जीना, यह अपने आचरण से सिखाते थे। अभी भौतिक सुखों की पूर्ति के लिए धनार्जन करने वाली शिक्षा अधिकतर पढ़ाई जा रही है। उसके परिणामस्वरूप नौकरी मांगने वाली, स्व-केन्द्रित और भौतिकतावादी पीढ़ी हम तैयार करते आ रहे हैं।
 
भारत के विकास के नापने के पैमाने और उसकी दिशा ही शहर केन्द्रित होने के कारण स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार आदि की सारी सुविधाएं, शहर केन्द्रित होती रहीं। उसके परिणामस्वरूप गांवों से शहर की ओर, शहर से महानगरों की ओर, महानगरों से मेट्रो और मेट्रो से विदेश की ओर भारत की प्रतिभा और बुद्धि का पलायन होता रहा। इसलिए गांव खाली हो रहे हैं, शहरों में भीड़ बढ़ती जा रही है। शहरों का जीवन सुविधा-युक्त, परन्तु दौड़धूप वाला, जमीन से कटा और खोखला होता जा रहा है, पर कोई विकल्प भी नहीं दिखता है।
 
 
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 कोरोना काल में कल-कारखानों के थमने से दिल्ली में बरसों बाद यमुना ऐसी साफ दिख रही है। 
 
 
वैश्वीकरण, जो विकासशील और अविकसित देशों पर थोपा गया, उसके दुष्परिणाम अब सामने आ रहे हैं। विकासशील और अविकसित ऐसे देशों के शोषण का, उपनिवेशवाद के बाद का नया अवतार, यह वैश्वीकरण है, यह अब दुनिया समझ रही है, अनुभव कर रही है। इस कुचक्र से बाहर आने का रास्ता सब खोज रहे हैं। इसलिए अब जब सब थम-सा गया है, सारा विश्व नई संरचना के लिए चिंतित है, आशंकित है उसे आश्वस्त करने की क्षमता और दायित्व क्या भारत निभा सकता है? यह प्रश्न है।
इसका उत्तर सकारात्मक ही है। यह भारत कर सकता है। भारत ही कर सकता है। कारण, भारत के पास ऐसी तीन बातें हैं, जो भारत के ही पास हैं। एक भारत के पास कम से कम दस हजार वर्षों से अधिक समय का सामाजिक, राष्ट्रीय जीवन का अनुभव है। दूसरा भारत के ही पास इस सृष्टि की रचना का अध्यात्म आधारित एक सर्वांगीण और एकात्म दृष्टिकोण और उस पर आधारित जीवन का एक चिंतन और अनुभव है। आधुनिक तंत्रज्ञान के कारण अब जब दुनिया इतनी नजदीक आयी है कि साम्प्रदायिक , नस्लीय और भाषाई वैविध्य के साथ, परस्पर पूरक एकत्र जीवन चलना है तो विविधता में एकता और संयमित उपभोग के साथ जीवन का उत्सव मनाने की कला भारत जानता है, यह दुनिया का निरीक्षण और अनुभव भी है। भारत ने समृद्धि के शिखर प्राप्त किए हैं। ईसा के पहले वर्ष से 1700 वर्षों तक विश्व व्यापार में भारत का सहभाग सर्वाधिक रहा है।
इतिहास साक्षी है कि हजारों वर्षों से भारत के लोग व्यापार हेतु पूरे विश्व में विभिन्न देशों में जाते रहे, परन्तु अध्यात्म आधारित होने के कारण ही, जीवन की सर्वांगीण और एकात्म दृष्टि से उपजी ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना के कारण भारतीयों ने वहां अपने उपनिवेश निर्माण करने का प्रयास नहीं किया। उनका शोषण नहीं किया। उन्हें गुलाम नहीं बनाया, बल्कि उन्हें संस्कृति और जीवन जीने का बेहतर तरीका, अपने आचरण से सिखाया और उन्हें संपन्न बनाया। इसलिए भारत के पास दृष्टि, विशेषज्ञता और अनुभव, तीनों हैं। भारत दिशा दे सकता है।
 
अब आगे कैसे बढ़ना है, इस पर विचार करेंगे। भारत ने कभी भी केवल अपने बारे में नहीं सोचा है। अपने साथ साथ विश्व के कल्याण की बात ही भारत ने हमेशा सोची है। ‘आत्मनो मोक्षार्थ जगत हिताय च’ यही भारत का विचार और आचरण रहा है।
 
अपने ‘स्वदेशी समाज’ नामक निबंध में गुरुवर रविंद्रनाथ ठाकुर नि:संदिग्ध शब्दों में कहते हैं, ‘हमें सबसे पहले हम जो हैं वह बनना पड़ेगा।’ इस ‘हम’ की पहचान, अपनी अध्यात्म आधारित और इसीलिए एकात्म और सर्वांगीण जीवन-दृष्टि से जुड़ी हुई है। हिमालय से लेकर अंदमान तक फैली इस भूमि पर रहने वाला, विभिन्न भाषा बोलने वाला, अनेक जातियों के नाम से जाना जाने वाला, अनेक उपास्य देवताओं की उपासना करने वाला, यहां पर सदियों से रहने वाला, प्रत्येक समाज ‘हम’ की इस पहचान को सांझा करता है, इसे अपनी मानता है। इस पहचान को लोग जानते हैं, उसे अनेक नामों से पहचानते हैं। यह हमारी पहचान- ‘एकं सत् विप्रा: बहुधा वदन्ति।’, ‘विविधता में एकता’, ‘प्रत्येक व्यक्ति में ईश्वर का अंश है’, और ‘उस’ ईश तत्व से जुड़ने के मार्ग प्रत्येक के, उसकी रुचि, प्रकृति और पात्रता के अनुसार, विभिन्न हो सकते हैं, केवल ‘उस’ से जुड़ने की, ‘उस’ से नजदीक जाने की दिशा में जीवन सतत चलना चाहिए। इन चार प्रमुख बातों पर आधारित हमारी यह ‘पहचान’ है। वह जीवन के हर क्षेत्र में अभिव्यक्त होती दिखनी चाहिए, यही ‘हम जो हैं, वह बनने’ का मर्म है।
 
आज भी 70 प्रतिशत भारत गांव में रहता है। परन्तु पहले ये गांव कैसे थे? गांव तक रास्ते नहीं थे, शिक्षा और स्वास्थ्य की अच्छी सुविधा नहीं थी, रोजगार के अवसर उपलब्ध नहीं थे, गांव में रहना पिछड़ेपन का लक्षण है, यह माना जाने लगा था। इसलिए पढ़ने के लिए, और पढ़ने के बाद आजीविका कमाने के लिए पढ़ा-लिखा वर्ग, प्रतिभा-बुद्धि, गांव से पलायन करती थी। परन्तु अब स्थिति बदल गयी है, बदल रही है और भी बदल सकती है। इतना ही नहीं, यह बदलनी आवश्यक है। अब रास्ते बन गए हैं, बिजली, इंटरनेट, मोबाइल, आवागमन के साधन गांव में उपलब्ध हैं, और भी हो सकते हैं। गांव में ही स्वास्थ्य की, अच्छी शिक्षा की व्यवस्था कर सकेंगे तो गांव में ही लोग रहना पसंद करेंगे। शहर केन्द्रित के स्थान पर विकेन्द्रित अर्थव्यवस्था, उद्योग आदि की संभावना बढ़ी है। कोरोना के कारण शहरों से लोग अपने गांव में, अपने लोगों में, जहां उनकी जड़ें जमीन से जुड़ी हैं, वहां पहुंच गए हैं, पहुंच रहे हैं। इसमें शिक्षित वर्ग भी है। यदि उन्हें गांव के विकास के कार्य में जोड़कर वहीं रखा जाए, काम के अवसर वहीं तलाशे जाएं, निर्माण किए जाएं तो गांव में पहुंचे 40 प्रतिशत वर्ग को हम वहीं स्थिर, उद्योगरत रख सकते हैं।
 
आज के शिक्षित वर्ग में जिस ‘नवाचार’ की, नया सोचने की कमी रह गयी है, उन्हें इसके लिए आॅनलाइन प्रशिक्षण और कार्यशालाओं के माध्यम से ‘नवाचार’ के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। ग्रामीण जीवन संबंधित और कृषि आधारित अनेक नए उद्योग, गांव में शुरू हो सकते हैं। ग्राम समूहों के माध्यम से परस्पर पूरक उद्योगों की शृंखला वहां विकसित कर सकते हैं। गांव में ही उत्पादित वस्तुओं को सूचना तकनीक के माध्यम से सीधे ग्राहक तक या स्थानीय खुदरा बाजार तक पहुंचा सकते हैं। इस कार्य से भी अनेक युवकों को रोजगार उपलब्ध कराया जा सकता है। आज उबर या ओला के माध्यम से एक अच्छी सुविधायुक्त सेवा आपके दरवाजे पर, एक कॉल करते ही उपलब्ध है। वह कितने मिनट में आएगी, कितने समय में पहुंचाएगी, यह जानकारी तुरंत उपलब्ध है। उसके लिए सीधा भुगतान करने की सुविधा भी आधुनिक तंत्रज्ञान के कारण संभव है। लोग अनुभव कर रहे हैं, उपयोग कर रहे हैं। इस कारण अनेक युवकों को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध हुए हैं।
 
आज रासायनिक खाद से दुनिया और धरती त्रस्त है। जैविक खेती का महत्व और मूल्य लोग समझ रहे हैं। थोड़े अधिक दाम देकर भी लोग शुद्ध अन्न चाहते हैं। मांग और पूर्ति के इस कार्य व्यवहार को परस्पर उपयोगी, संतुलित अर्थतंत्र के रूप में विकसित किया जाए, सीधा ग्राहकों तक यह उत्पाद पहुंचाए जाएं तो इसके माध्यम से बड़ी संख्या में रोजगार निर्माण हो सकते हैं। देशी नस्ल की गाय के दूध और अन्य गो उत्पाद की मांग बढ़ सकती है, ये सारी योजनाएं ग्राम केंद्रित या ग्राम समूह केनिद्रत हो सकती हैं, होनी चाहिए।
 
आज रोजगार उपलब्ध कराने की सर्वाधिक क्षमता लघु और मध्यम उद्योगों में है। यदि बिजली और अन्य आवश्यक सुविधाएं गांव में दी जाएं तो वहीं पर लघु उद्योग शुरू करने के लिए प्रोत्साहन और विशेष रियायत देनी चाहिए। सरकार को चाहिए कि ऐसे उद्योग शुरू करने की सुलभता और सहजता निर्माण करे। शुरू में ग्रामीण क्षेत्र में उद्योग शुरू करने वालों को कम ब्याज में कर्ज और अन्य कुछ रियायतें उपलब्ध कराएं। दुनिया में अपने उत्पादन को बेचना है तो उत्पाद के डिजाइन पर भी ध्यान देना होगा। कोरिया और जापान जैसे देशों ने डिजाइनिंग पर बहुत पहले से ध्यान दिया था। इसलिए वहां निर्मित वस्तुएं दुनिया भर में खप रही थीं। भारत में हमें डिजाइनिंग के लिए आॅनलाइन कोर्सेस, कार्यशालाएं शुरू करनी चाहिए।
 
भारत की आर्थिक स्थिति पर चीन का बहुत प्रभाव था। इस कोरोना महामारी के चलते चीन बहुत विवाद में आया है। अब यदि भारत में चीन में उत्पादित वस्तुओं के बहिष्कार की बात आती है तो समाज का स्वत:स्फूर्त प्रतिसाद मिलने की पूर्ण संभावना है। परन्तु उसके पहले भारत को उन सभी वस्तुओं के लिए, जो चीन से केवल इसलिए बड़ी मात्रा में आती थीं, क्योंकि सस्ती पड़ती हैं, उनके स्वदेशी विकल्प खड़े करने होंगे। यह एक प्रकार का आर्थिक युद्ध ही है। इसलिए युद्धस्तर पर इसके लिए तैयारी की जाए तो अनेक युवकों को रोजगार के अधिक अवसर प्राप्त हो सकते हैं।
 
अनेक देश चीन से व्यापार बंद करने की सोच रहे हैं। ऐसी बातें मीडिया में आती रहती हैं। यदि हम चीन से आने वाली वस्तुओं का अच्छा और सस्ता स्वदेशी विकल्प बड़ी मात्रा में दे सकेंगे, तो दुनिया के अनेक देश चीन के स्थान पर भारत से व्यापार करेंगे, यह भारत के युवकों को रोजगार के नए अवसर देगा। ऐसा यदि हुआ तो भारत का निर्यात बढ़ेगा। भारत की आर्थिक स्थिति और सुदृढ़ होगी। सरकार-राज्य निर्यात की सुविधा और सहूलियत की व्यवस्था करें। बाकी सारी चुनौती समाज स्वीकार करेगा।
 
स्थानीय रोजगार को ध्यान में रखकर ही सारी योजनाएं बनानी होंगी। प्रत्येक देश के लिए स्वदेशी महत्व की और आवश्यक बात है। वैश्वीकरण का ‘सबके लिए एक आकार’ का विचार अनुचित है। परस्पर सहमति से, परस्पर पूरक आर्थिक सहयोग एवं व्यापार के करार दो देशों के बीच होना उपयोगी सिद्ध होगा।
 
ये सारे उद्योग ग्राम-समूह केन्द्रित होंगे तो वहां निर्मित वस्तुओं का मूल्य भी तुलना में कम रह सकता है। कारण, गांव में जीवन जीना शहर की तुलना में सस्ता होगा। और जीवन का स्तर काफी अच्छा होगा। वह अपने लोगों के बीच रहेगा, जमीन से जुड़ा रहेगा, गांव के सामाजिक जीवन में भी अपना योगदान देता रहेगा। शहर में रहने का अनुभव होने के कारण गांव में अनेक नयी पहल वह कर सकेगा।
 
यह सब केवल सरकार के भरोसे नहीं चल सकेगा। समाज की पहल और सरकार का सहयोग, दोनों के द्वारा ही यह संभव होगा। एक सर्वंकष और एकात्म योजना बनानी होगी। धीरे-धीरे राज्य पर अवलंबन कम करते हुए, समाज स्वावलंबी बनकर इन योजनाओं को चला सकेगा। रविंद्रनाथ ठाकुर की स्वदेशी समाज की यही कल्पना है। वे कहते हैं, ‘‘वह समाज जो राज्य पर कम से कम अवलम्बित होता है, वह स्वदेशी समाज है।’’
 
भारत में नई शिक्षा नीति की तैयारियां चल रही हैं। उस पर पूर्ण विचार कर वह शीघ्र ही लागू हो। यादि ऐसा हुआ तो भारत की जड़ों से जुड़कर, भारतीय मूल्यों पर आधारित जीवन जीने का लक्ष्य रखने वाली पीढ़ी तैयार होगी। सभी दृष्टि से भौतिक समृद्धि और सम्पन्नता को साधते हुए भी अपने अंतर के ‘ईश’ तत्व को समझना और उसे आत्मसात करने का प्रयत्न करना, इन दोनों को एक साथ साधना, भारत सहस्राब्दियों से इसे जीवन की पूर्णता मानता आ रहा है। ‘यतोरभ्युदय नि:श्रेयस सिद्धि: स धर्म:।’भारत की इस प्राचीन मान्यता का यही अर्थ है। भारत की आध्यात्मिक चिंतन पर आधारित समाज रचना होगी तो समाज को समृद्ध और संपन्न बनाने के लिए स्वेच्छा से, कर्त्तव्य बोध से समाज को देने की वृत्ति बढ़ेगी। समाज के पास एकत्रित इस सामाजिक पूंजी से समाज का प्रत्येक व्यक्ति सम्पन्न समृद्ध बनेगा।
 
स्वामी विवेकानंद की शिष्या भगिनी निवेदिता कहती हैं, ‘‘जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक अपने ही पास न रख कर समाज को देते हैं, उस समाज में, इस एकत्र हुई सामाजिक पूंजी के आधार पर समाज का प्रत्येक व्यक्ति सम्पन्न और समृद्ध बनता है। पर जिस समाज में लोग अपने परिश्रम का पारिश्रमिक समाज को न देकर अपने ही पास रखते हैं, उस समाज में कुछ लोग तो सम्पन्न और समृद्ध होते हैं, पर समाज दरिद्री रहता है।’’ हमारे यहां समाज को अपना मानकर देने को ही ‘धर्म’ कहा गया है। राज्य शक्ति पर आधारित नहीं, तो इस धर्म पर आधारित समाज शक्ति के आधार पर ही समाज टिका रहा है, सम्पन्न और समृद्ध रहा था।
 
‘यद्यदाचरति श्रेष्ठ: तत्तदेवेतरो जना:।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते।।’
अर्थात श्रेष्ठ लोगों को देखकर अन्य लोग भी उनका अनुसरण करेंगे।
 
इन सारी संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए भविष्य के भारत का, इसकी व्यवस्थाओं का वृहद् खाका खींचा जाए, एक ‘मास्टर प्लान’ बनाया जाए, ‘कोरोना काल’ की सीख यही है।
(लेखक राष्ट्रीय स्वयंयेवक संघ के सह सरकार्यवाह हैं)