तेल की निकली धार, पेट्रो-डॉलर का बंटाधार

    दिनांक 13-मई-2020   
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चायनीज वायरस कोरोना से उत्पन्न वैश्विक महामारी के कारण दुनियाभर में तेल की कीमतें अब तक की सबसे निचली दर पर पहुंच गई हैं। तेल उत्पादक देशों की स्थिति खराब है। तेल की कीमतों का यह उतार और महामारी की मार दुनिया की अर्थव्यवस्था में कुछ बड़े बदलावों का संकेत लेकर आई है

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20 अप्रैल को अमेरिकी बेंचमार्क क्रूड वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) में खनिज तेल की कीमतें-40.32 डॉलर के नकारात्मक स्तर पर पहुंच गईं। कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय वायदा बाजार की यह दुर्लभ घटना थी। दरअसल, कोरोना महामारी के कारण अमेरिका सहित काफी देशों में लॉकडाउन है। इसलिए तेल की मांग लगातार घटती जा रही है। दूसरी तरफ उत्पादन जारी रहा और खरीद शून्य, जिससे ऐसी स्थिति बनी। हालांकि बाद में स्थिति में सुधार आया, फिर भी पेट्रोलियम के भावी कारोबार को लेकर उम्मीदें टूटने लगी हैं। उधर, ओपेक देशों और रूस ने उत्पादन घटा कर भावी कीमतों को और गिरने से रोकने की कोशिश जरूर की है, पर इस कारोबार की तबाही के लक्षण नजर आने लगे हैं। सब जानते हैं कि एक दिन पेट्रोलियम का वर्चस्व खत्म होगा, पर क्या वह समय इतनी जल्दी आ गया है? क्या कोरोना ने उसकी शुरुआत कर दी है?
 
कोविड-19 ने मनुष्य जाति के अस्तित्व को चुनौती दी है। आधुनिक विज्ञान और तकनीक ने नए किस्म की इस बीमारी की पहचान व इसका इलाज खोजने की दिशा में तेजी से काम शुरू कर दिया है। इसे रोकने वाले टीके की पांच-छह किस्मों का मनुष्यों पर परीक्षण चल रहा है। आशा है कि अगले एक साल में इस वायरस पर पूरी तरह विजय पाया जा सकेगा।
 
नई विश्व व्यवस्था
यह महामारी विश्व-व्यवस्था के सामने कुछ सवाल लेकर आई है। ये सवाल कम से कम तीन वर्गों में विभाजित किए जा सकते हैं। पहला सवाल पेट्रोलियम से ही जुड़ा है। क्या ऊर्जा के परंपरागत स्रोतों का युग समाप्त होने जा रहा है? विश्व-व्यवस्था और शक्ति-संतुलन में पेट्रोलियम की महत्वपूर्ण भूमिका है। अगर इसकी भूमिका समाप्त होगी तो इससे जुड़ी शक्ति-श्रृंखलाएं भी कमजोर होंगी। उनका स्थान कोई और व्यवस्था लेगी। यदि पेट्रो डॉलर ध्वस्त होगा तो उसका स्थान कौन लेगा? क्या यह परिवर्तन नई वैश्विक-व्यवस्था को जन्म देगा? क्या पूंजीवाद और समाजवाद जैसे सवालों का भी अंत होगा? क्या अमेरिका का महाशक्ति रूप ध्वस्त हो जाएगा? क्या भारत का महाशक्ति के रूप में उदय होगा? नब्बे के दशक से वैश्वीकरण की जो लहर चली थी, उसका क्या होगा? उत्पादन, व्यापार, पूंजी निवेश तथा बौद्धिक संपदा से जुड़े प्रश्नों को अब दुनिया किन निगाहों से देखेगी? इनके साथ वैश्विक-सुरक्षा के सवाल भी जुड़े हैं। वैश्विक-सुरक्षा की परिभाषा में जलवायु परिवर्तन और संक्रामक बीमारियां भी शामिल होने जा रही हैं, जो राजनीतिक सीमाओं की परवाह नहींकरती हैं।
 
फिलहाल पेट्रोलियम बाजार में लगी आग का रुख करें। पेट्रोलियम की मांग अचानक कम होने के पीछे कोरोना का हाथ है। चूंकि खनिज तेल की आपूर्ति सहज भाव से जारी थी, इसलिए यह संकट पैदा हुआ। तेल की खपत घट गई, लेकिन कच्चे तेल के भंडारण के लिए जगह नहीं बची। जमीन पर बने भंडारों, टैंकों और समुद्र में खड़े टैंकर लबालब भरने के बाद भी तेल आता रहा, जिससे उसकी कीमत गिरती चली गई। पेट्रोलियम का उत्पादन जब शुरू होता है, तो उसे रोका नहीं जा सकता। कम जरूर किया जा सकता है, पर उसका न्यूनतम उत्पादन भी दुनिया के भंडारों को भरने के लिए काफी होता है।
 
औद्योगिक विकास के कारण दुनिया में ऊर्जा का बहुत अधिक उपयोग हो रहा है। इस औद्योगिक मशीनरी को चलाए रखने की मजबूरी भी है। वायदा बाजार में भविष्य के सौदे होते हैं और औद्योगिक योजनाओं के अनुसार भविष्य की खरीदारी भी चलती रहती है। खरीदार और विक्रेता भविष्य की संभावित कीमतों पर समझौते करते हैं। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (डब्ल्यूटीआई) में एक सीमा के बाद मई के सौदे बट्टे खाते में चले गए। खरीदारों ने हथियार डाल दिए। इसके बाद के सौदों पर और बड़ा खतरा है।
 
पेट्रोलियम की कीमत
सऊदी अरब के ऊर्जा मंत्री प्रिंस अब्दुल अजीज बिन सलमान ने 13 अप्रैल को कहा कि काफी विचार-विमर्श के बाद तेल उत्पादक व उपभोक्ता देशों ने रोजाना करीब 97 लाख बैरल तेल आपूर्ति कम करने का फैसला किया है। इस फैसले के बाद हालांकि ब्रेंट क्रूड बाजार में तेल की गिरती कीमतें कुछ देर के लिए सुधरीं, पर वैश्विक स्तर पर असमंजस कायम है। दो हफ्ते पहले ये कीमतें 22 डॉलर प्रति बैरल से भी नीचे पहुंच गई थीं। इस गिरावट के बाद रूस ने अपना उत्पादन बढ़ाकर इसे और तेजी दी। इस स्पर्धा से तेल बाजार में जैसे आग लग गई। तेल की मौजूदा कीमतों को देखते हुए इस उद्योग की तबाही निश्चित है।
 
पेट्रोलियम-बाजार के इस महाविनाश का सारा दोष कोरोना पर लगाना भी अनुचित होगा। क्रूड की कीमतों को लेकर झगड़ा पहले से चल रहा है। सऊदी अरब और रूस के टकराव से इसकी शुरूआत हुई। सऊदी अरब तेल निर्यातक देशों के संगठन ‘ओपेक’ का मुखिया है। जब कोरोना वायरस के कारण मांग गिरी तो सऊदी अरब ने रूस से उत्पादन घटाने को कहा ताकि तेल की कीमतें गिरने न पाएं। हालांकि शुरू में रूस ने इनकार कर दिया, पर बाद में काफी बहस के बाद राजी हो गया। सऊदी अरब और रूस के बीच बाजार में हिस्सेदारी बढ़ाने की होड़ के कारण तेल का भाव करीब दो दशक के न्यूनतम स्तर पर आ गया है। माना जा रहा है कि यदि तेल की कीमतें 20 डॉलर के स्तर पर रहीं तो इस उद्योग की तबाही निश्चित है।
 
जी-20 देशों के पेट्रोलियम मंत्रियों की हाल में हुई टेली कांफ्रेंस में उत्पादन घटाने के प्रस्ताव पर उत्पादक देशों के बीच खूब खींचतान हुई। लेकिन 11 अप्रैल को जो विज्ञप्ति जारी हुई उसमें कटौती को लेकर कुछ नहीं था। हालांकि ओपेक और रूस समेत दूसरे देशों के बीच, जिन्हें ओपेक+ कहा जाता है, एक दिन पहले मई-जून में दैनिक तेल उत्पादन घटाने को लेकर समझौता हुआ था।
 
फिलहाल इस तेल संग्राम में अमेरिका ने सऊदी अरब और रूस के बीच समझौता कराने की कोशिश की, क्योंकि इसमें उसका भी भला है। हालांकि दूरगामी लड़ाई में रूस दूसरे पाले में बैठा है। ओपेक और रूस ने रोजाना 97 लाख बैरल खनिज तेल उत्पादन कम करने का फैसला किया है। लेकिन यह तात्कालिक युद्ध विराम है, क्योंकि इतनी कटौती से काम नहीं चलने वाला है। कोरोना ने तेल की मांग घटा दी है कि बाजार का दिवाला निकल रहा है। ओपेक और रूस के बीच दिसंबर 2018 में उत्पादन में कटौती को लेकर जो समझौता हुआ था, वह भी चल रहा है।
 
इधर, कीमतों में गिरावट के कारण गत 5 मार्च को विएना में हुए ओपेक शिखर सम्मेलन में तेल उत्पादन में प्रतिदिन 15 लाख बैरल की कटौती करने का फैसला लिया गया। समझौते के तहत ओपेक ने रूस से भी उत्पादन घटाने को कहा, पर 6 मार्च को रूस ने इसे मानने से इनकार कर दिया। इस तरह ओपेक+ समझौता करीब-करीब टूट गया। रूस के इस रुख को देखते हुए 8 मार्च को सऊदी अरब ने भी क्रूड का उत्पादन बढ़ाकर कीमतें में 65 प्रतिशत घटाने की घोषणा की। इसकी प्रतिक्रिया में अमेरिकी कीमतें भी गिरीं। लिहाजा अमेरिका चाहता है कि ओपेक और रूस के रिश्ते टूटें। ऐसे दौर में जब रूस और ईरान के खिलाफ अमेरिका ने आर्थिक पाबंदियां लगा रखी हैं, कोरोना वायरस ने कई प्रकार की विसंगतियां पैदा कर दी हैं।
 
क्या से क्या हो गया
कुछ दशक पहले पेट्रोलियम को कुछ देशों की समृद्धि का आधार माना जाता था। इन देशों ने अपनी अर्थव्यवस्था को पूरी तरह पेट्रोलियम के हवाले कर दिया। उनकी उत्पादन लागत काफी ऊंची थी। पेट्रोलियम की कीमतें ऊंची होने के कारण वे बचे रहते थे। पर आज जब पेट्रोलियम की कीमतें गिर रही हैं, तो पेट्रोलियम पर आधारित अर्थव्यवस्था वाले देशों की हालत खराब है। दुनिया का लगभग आधा तेल उत्पादन करने वाला ओपेक अब बिखरता दिख रहा है। 99 प्रतिशत पेट्रोलियम का निर्यात करने वाला वेनेजुएला दिवालिया हो चुका है। वेनेजुएला में पेट्रोलियम उत्पादन लागत 2016 में 117.50 डॉलर प्रति बैरल थी, जो अब और ज्यादा हो चुकी होगी। इसी तरह ईरान के सकल निर्यात में पेट्रोलियम का हिस्सा 79 प्रतिशत है। इसकी उत्पादन लागत 2016 में 51.30 डॉलर प्रति बैरल थी, जो आज की कीमतों से कहीं ज्यादा है। सऊदी अरब में बैरल तेल उत्पादन लागत 25 डॉलर से भी कम है।
 
एक जमाने में अमेरिका तेल आयात करता था, पर उसने चट्टानों को तोड़कर खनिज तेल निकालने की तकनीक विकसित की, जिसके कारण अब वह तेल निर्यातक देश बन गया है। पर उसका तेल महंगा है। अमेरिका में प्रति बैरल लागत कम से कम 50 डॉलर है। कुछ विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह 70 डॉलर बैठेगी, क्योंकि कंपनियां इस तकनीक को हासिल करने के लिए कर्ज भी लेती हैं। पर यह लागत है, जबकि सरकारों को आमदनी चाहिए ताकि उनका खर्च चल सके, सामाजिक कार्यक्रम चलाए जा सकें।
 
अमेरिकी अर्थव्यवस्था का आधार मजबूत है, लेकिन पेट्रोलियम-आधारित देशों की अर्थव्यवस्था तेल पर टिकी है। इसलिए सबसे बड़ा संकट उन्हीं के लिए है। अलजजीरा के अनुसार, आज किसी भी देश के लिए 33 डॉलर पर भी पेट्रोलियम बेचना संभव नहीं है। सऊदी अरब को प्रति बैरल 83 डॉलर मिले तो उसका कामकाज चलेगा। रूस को 50 डॉलर और ईरान को 195 डॉलर चाहिए। रूस आज अपना उत्पादन बढ़ाने का हौसला इसीलिए कर पा रहा है, क्योंकि उसकी लागत कम है।
 
कीमत की टकराहट
आज रूस जो कर रहा है, वही 2015 में सऊदी अरब ने किया था। उस वक्त कीमतें गिर रही थीं और सऊदी अरब ने उत्पादन बढ़ा दिया था। ऐसा उसने अमेरिका के इशारे पर किया था। इसी ‘प्राइस वॉर’ के सहारे अमेरिका ने वेनेजुएला को परास्त किया, ईरान और रूस के लिए समस्याएं खड़ी कीं। कजाकिस्तान, अजरबैजान और कोलंबिया, ब्राजील और इक्वाडोर जैसे लातिन अमेरिका के वामपंथी देशों पर नकेल डाली। 2015 में अमेरिकी डॉलर ने रूसी रूबल को जमीन सुंघा दिया था। उस झटके से रूस आज तक नहीं उबरा है।
 
पिछले कुछ वर्षों में पेट्रोलियम समृद्ध देशों की सूची में अमेरिका नाम भी जुड़ गया है। 2019 में वह दुनिया का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश भी बन गया था। सऊदी अरब से भी बड़ा। इस वक्त भी वह चौथा सबसे बड़ा निर्यातक देश है। यह उसकी उपलब्धि है, पर उसने भी अपने लिए बड़ा खतरा मोल ले लिया है। इन दिनों उसे इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। सऊदी अरब तेल कीमतें 60 डॉलर के आसपास रखने की कोशिश में था, जिससे अमेरिका की ‘शैल-क्रांति’ धराशायी हो जाए।
2015 के बाद से तेल बाजार में काफी बड़े परिवर्तन हुए हैं। अमेरिका जिस शैल तकनीक से तेल निकाल रहा है, वह महंगी है। इसे 70 डॉलर से कम पर नहीं बेचा जा सकता। अब यदि तेल की कीमतें गिरीं तो अमेरिकी कंपनियों का दिवाला निकल जाएगा। एक अनुमान के अनुसार, अमेरिकी बैंकों ने तेल कंपनियों को 700 अरब डॉलर से दो खरब डॉलर तक का कर्ज दे रखा है। अमेरिकी कंपनियां बैठीं तो उनमें निवेश करने वाली कंपनियां और बैंक भी डूब जाएंगे, जिसका असर दुनियाभर में दिखेगा। 2008 की आर्थिक मंदी से उबरने के लिए अमेरिका ने 700 अरब डॉलर के राहत पैकेज की घोषणा की थी। इस बार कोरोना संकट से निकलने के लिए अमेरिकी सरकार ने दो खरब का पैकेज घोषित किया है। पर पेट्रोलियम उद्योग का क्या होगा? निवेशक अपना पैसा निकालने के बारे में सोचने लगे हैं।
 
रूस के पक्ष में अच्छी बात यह है कि उसकी अर्थव्यवस्था तेल आश्रित नहीं है। उनकी अर्थव्यवस्था में पेट्रोलियम की हिस्सेदारी करीब 50 प्रतिशत है। लेकिन उसकी स्थिति सऊदी अरब से बेहतर है, जिसे 80 प्रतिशत राजस्व से ही प्राप्त होता है। इसका मतलब यह नहीं कि रूस इस संकट से बचा रहेगा। रूस पर जीडीपी के मुकाबले ऋण 17.3 प्रतिशत है, जबकि सऊदी अरब पर 20 प्रतिशत। बीते छह वर्षों में इस कर्ज में भारी वृद्धि हुई है। इस लिहाज से रूस की स्थिति बेहतर है। 
 
 
डॉलर में गिरावट
दूसरे विश्व युद्ध के बाद से अमेरिकी डॉलर वस्तुत: वैश्विक मुद्रा बन चुका है। दुनिया में पेट्रोलियम का कारोबार भी डॉलर में होता है। सऊदी अरब के राज परिवार और अमेरिका के विशेष रिश्तों की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका है। इस पेट्रो-डॉलर संकट के बाद क्या डॉलर की यही भूमिका रहेगी? रूस और चीन मिलकर विकासशील देशों को अपनी तरफ आकर्षित कर रहे हैं। जिम्बाब्वे ने अपनी करेंसी के अलावा चीनी येन (जापानी मुद्रा) का इस्तेमाल भी शुरू कर दिया है। इसके पहले डॉलर को चुनौती देने वाले देश तेल-समृद्ध भी थे। लीबिया, ईरान, इराक और वेनेजुएला की तरह। इन सबके पास तेल था, जो एक जमाने तक सोने या नकदी के बराबर था। पर ये सब देश धूल में मिल गए, क्योंकि उनके पीछे मजबूत आधार नहीं था।
 
अब रूस और चीन की अर्थव्यवस्थाएं मजबूत हो रही हैं। वे तेल पर आश्रित भी नहीं हैं। हाल में खबरें थीं कि रूस ने ईरान को इस बात के लिए तैयार कर लिया है कि वह अपना तेल उसके तट से बेचे। इससे अमेरिकी प्रतिबंधों को चुनौती मिलेगी और रूबल का सिक्का मजबूत होगा। रूस और चीन लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं। खबरें यह भी हैं कि ओपेक के भीतर कई देश सऊदी अरब और अमेरिका की दोस्ती को पसंद नहीं करते हैं।
 
2008 में अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने एसडीआर के नाम से अपनी करेंसी की शुरुआत की थी। यह स्वर्ण आधारित करेंसी है। आईएमएफ के पास सबसे ज्यादा सोना है। हालांकि मुद्राकोष इसे करेंसी नहीं कहता, पर हाल में पाकिस्तान को दिया गया ऋण एसडीआर में था। कहने का मतलब है कि डॉलर के विकल्प भी तैयार हो रहे हैं। रूस ने पिछले आठ साल में काफी सोना खरीदा है।
 
चीन तो सबसे ज्यादा सोना खरीदता ही है। चीन स्वर्ण उत्पादक देश भी है। रिचर्ड निक्सन के कार्यकाल में डॉलर को स्वर्ण मानक से अलग कर दिया गया। अब वह केवल कागजी मुद्रा है, स्वर्ण मुद्रा नहीं। माना जाता है कि जो मुद्रा स्वर्ण आधारित नहीं होती, वह लंबे समय तक चलती नहीं। अमेरिका अपनी जरूरत के हिसाब से मुद्रा छापता है। यह बात वैश्विक मुद्रा होने के नाते अच्छी नहीं है। इससे भारत जैसे दूसरे विकासशील देशों के हितों को ठेस लगती है, जिन्हें और ज्यादा पूंजी चाहिए। पर हो यह रहा है कि अमेरिका ही कर्ज लेता जा रहा है। ज्यादातर निवेशक अमेरिका की तरफ भाग रहे हैं और भारत, इंडोनेशिया और ब्राजील जैसे देश वंचित रह जाते हैं।
 
आने वाले समय में क्या होगा, कोई नहीं जानता। कोरोना के बाद पेट्रोलियम की मांग बढ़ेगी, पर कितनी? विशेषज्ञों का अनुमान है कि सऊदी अरब जैसा देश अपने मजबूत मुद्रा भंडार के सहारे दो-तीन साल निकाल लेगा, पर उसके बाद उसकी अर्थव्यवस्था डगमगाने लगेगी। रूसी तेल की लागत कम है, इसलिए वह कई दशक तक सस्ता तेल बेचता रह सकता है। सस्ता मतलब करीब 40 डॉलर प्रति बैरल। मोटे तौर पर संकेत यह है कि तेल की कीमतों का यह दौर और महामारी की मार दुनिया की अर्थव्यवस्था में कुछ बड़े बदलावों का संदेश लेकर आई है।
 
महामारी खत्म होने के बाद अमेरिका, चीन तथा रूस की प्रतियोगिता और तेज होगी। बेशक अमेरिका की ताकत घट रही है, पर वह अभी भी महाशक्ति है। भारत अभी बीच में बैठा इस शक्ति-द्वंद्व को देख रहा है। हमें अपने पत्ते सावधानी से खेलने होंगे।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार)