पाक अधिक्रांत लद्दाख ... अब बात बाकी बचे हिस्से की

    दिनांक 13-मई-2020
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शिव पाठक
भारत सरकार की पाकिस्तान सरकार को चेतावनी देती ताजा विज्ञप्ति मात्र एक कूटनीतिक रस्म नहीं, बल्कि एक दृढ़ संकल्प का प्रकटीकरण है। यह भारत की संसद द्वारा 1994 में संपूर्ण जम्मू—कश्मीर को भारत का अभिन्न अंग घोषित करते एकमत से पारित प्रस्ताव को पूरा करने का संकल्प है


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6 अगस्त 2019 को संसद में जम्मू-कश्मीर के संदर्भ में संसद द्वारा पा
रित प्रस्ताव का स्मरण कराया था केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने (फाइल चित्र)
 
पाकिस्तान की सरकार ने गिलगित-बाल्टिस्तान के लिए 2018 में एक आदेश पारित किया था। इसका उद्देश्य वहां की राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक संरचना में बदलाव करना था। इस आदेश में कार्यपालिका व न्यायपालिका की शक्तियां, जनसंख्या नीति व कर व्यवस्था में बदलाव जैसे कई महत्वपूर्ण विषय शामिल हैं। एक प्रकार से पाकिस्तान इस क्षेत्र को अपना पांचवां प्रांत बनाने की कोशिश कर रहा है। यह परिवर्तन नि:संदेह चीन के दबाव में हो रहा है। इसी परिवर्तन के एक वाद में 28 अप्रैल को पाकिस्तान की सर्वोच्च न्यायालय ने अपने न्यायाधिकार को गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में विस्तारित करने के लिए आदेश दिया है। 
 
अवैध कब्जा नहीं स्वीकार
इस संरचनात्मक परिवर्तन को भौतिक परिवर्तन मानते हुए, भारत सरकार ने 4 मई 2020 को पाकिस्तान के उच्च आयुक्त को बुलाकर पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के उस आदेश पर आपत्ति दर्ज की, जिसमें कहा गया है कि ‘गिलगित-बाल्टिस्तान पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिकार क्षेत्र में आता है।’ इस पर भारत सरकार ने अपनी प्रतिक्रिया देते हुए विज्ञप्ति जारी करके कहा है कि गिलगित-बाल्टिस्तान सहित सम्पूर्ण जम्मू—कश्मीर और लद्दाख संघ शासित क्षेत्र भारत का अभिन्न हिस्सा है। यह भारत में उसके वैधानिक और अपरिवर्तनीय अधिमिलन के कारण है। पाकिस्तान सरकार और उसके न्यायालय का इस भूभाग पर कोई न्यायाधिकार नहीं है, जिसे बलात और अवैधानिक रूप से हथियाया गया है। पाकिस्तान अधिक्रांत क्षेत्र में, जो भारतीय भूभाग है, किसी प्रकार के भौतिक परिवर्तन के लिए भारत पूर्णरूपेण ऐसे कृत्यों और इस प्रकार के लगातार प्रयासों को पूर्णत: नकारता है। इसके बजाय पाकिस्तान द्वारा अवैधानिक रूप से इस अधिक्रांत क्षेत्र को तुरंत खाली कर दिया जाना चाहिए। भारत सरकार ने यह भी कहा कि इस प्रकार के कार्य से न तो अवैध कब्जे को छुपाया जा सकता है और न ही पिछले 70 वर्ष से मानवाधिकारों के उल्लंघन, और स्वतन्त्रता के अधिकारों के हनन को।
 
 
इस प्रेस विज्ञप्ति में कई महत्वपूर्ण बिन्दु हैं। पहला, जम्मू—कश्मीर और लद्दाख संघ शासित प्रदेश का भारत में अधिमिलन पूर्ण और अपरिवर्तनीय है। दूसरा, पाकिस्तान गिलगित-बाल्टिस्तान क्षेत्र में कोई भौतिक परिवर्तन न करे, और तीसरा, अवैध कब्जे वाले भू-भाग को पाकिस्तान खाली कर दे। यह ‘भौतिक परिवर्तन’ शब्द एक तकनीकी और विशेष संदर्भ में प्रयोग हुआ है। भारत के अधिकतर वक्तव्य में यही कहा जाता रहा है कि पाक-अधिक्रांत क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है। लेकिन इस बार पाकिस्तान के राजनयिक को बुलाकर कहा गया कि वह इसे खाली कर दे ।
 
कश्मीर और संयुक्त राष्ट्र
कश्मीर विषय को संयुक्त राष्ट्र में भारत स्वयं ले कर गया था। भारत सरकार ने 1 जनवरी 1948 को सुरक्षा परिषद में अनुच्छेद 35 के प्रावधानों के अनुसार शिकायत की और अपना पक्ष रखा। मूलत: सुरक्षा परिषद के अनुच्छेद 35 का यह भाग विश्व में शांति व सुरक्षा बनाए रखने के निमित्त बना है। भारत के अनुसार, ‘पाकिस्तान के नागरिक और कबीलाई लोगों ने जम्मू और कश्मीर पर आक्रमण किया है। चूंकि जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह द्वारा 26 अक्तूबर 1947 के भारत में अधिमिलन के पश्चात यह समस्त भाग भारतीय सीमा व संप्रभुता का अभिन्न अंग बन गया है। अत: इस पाकिस्तान समर्थित आक्रमण के प्रत्युत्तर में भारत को सैनिक कार्यवाही करनी पड़ी। भारत सरकार सुरक्षा परिषद से निवेदन करता है कि पाकिस्तान आक्रमणकारियों को सहायता देना बंद करे, अन्यथा यह कार्यवाही भारत पर आक्रमण मानी जाएगी। यदि पाकिस्तान ऐसा नहीं करता है तो भारत सरकार पाकिस्तानी भू—भाग पर आत्म-सुरक्षा में सैनिक कार्यवाही करने के लिए बाध्य होगी। इसलिए सुरक्षा परिषद इस महत्वपूर्ण विषय पर कार्यवाही करे और अंतरराष्ट्रीय शांति को भंग न होने दे।’
 
गिलगित बाल्टिस्तान के मौसम का हाल बताएगा भारत

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भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा 4 मई 2020 को जारी की गई यह विज्ञप्ति
 
पाकिस्तान ने अपने आका चीन को खुश करने के लिए पाक अधिक्रांत कश्मीर के ऊपरी हिस्से गिलगित-बाल्टिस्तान को देश का पांचवां प्रदेश बनाने का मंसूबा तैयार किया है। जबकि इसका करारा जवाब देते हुए भारतीय मौसम विज्ञान विभाग ने मौसम की पूवार्नुमान सूची में गिलगित-बाल्टिस्तान और मुजफ्फराबाद को शामिल करके यह अहसास करा दिया कि यह हिस्सा भारत का अटूट अंग था और हमेशा रहेगा।
बहुप्रचारित पाकिस्तान-चीन आर्थिक गलियारा गिलगित-बाल्टिस्तान से होकर गुजरेगा। इस लिहाज से इसके चार जिले हुंजा, नगर, घीसर और चिलास बेहत महत्वपूर्ण माने जाते हैं। वतार्मान में पाकिस्तान अपने कब्जे वाले कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान को देश का ‘स्वतंत्र हिस्सा’ मानता है। इसके अपने प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति हैं। पहले यहां शाही कानून चलता था। जैसे-जैसे यह क्षेत्र चीन के लिए उपयोगी होता गया, पाकिस्तान ने इसकी स्वतंत्रता छीननी शुरू कर दी। अनुच्छेद 370 की तरह एक विशेष कानून के जरिए यहां भी बाहरी लोग स्थायी तौर पर नहीं बस सकते थे। चीन के दबाव में 1984 में इस क्षेत्र से यह विशेष कानून हटा दिया गया। वॉशिंगटन पोस्ट और वीकीलिक्स की रिपोर्ट की मानें तो तब से गिलगित-बाल्टिस्तान में चीनी फौजियों का जमावड़ा है। इलाके में चीनी पूंजी निवेश बढ़ाने और देश का पांचवां प्रांत गठित करने के लिए 21 मई, 2018 को संसद में प्रस्ताव पास कर गिलगित-बाल्टिस्तान के संवैधानिक, न्यायिक एवं प्रशासनिक अधिकार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को सौंप दिए गए थे। अब नए प्रांत के गठन की तैयारी तेज कर दी गई। अभी पाकिस्तान में चार प्रांत सिंध, पंजाब, खैबर पख्तून ख्वा और बलूचिस्तान हैं। पांचवें प्रांत के गठन के लिए हाल में वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने इस्लामाबाद को गिलगित-बाल्टिस्तान आदेश-2018 के तहत वहां चुनाव कराने की अनुमति दी ह जिसका भारत ने कड़ा विरोध जताया। गिलगित-बाल्टिस्तान की राजनीतिक, प्रशासनिक व न्याय प्रणाली में भी पाकिस्तान के हस्तक्षेप का यहां बराबर व कड़ा विरोध होता रहा है।
इधर, भारत ने भी पाक अधिक्रांत कश्मीर में पड़ोसी देश के नापाक मंसूबे को ध्वस्त करने के लिए अपनी गतिविधियां बढ़ा दी हैं। भारत के मौसम विभाग के महानिदेशक मृत्युंजय महापात्र ने कहा कि विभाग पूरे जम्मू-कश्मीर और लद्दाख क्षेत्र के लिए मौसम बुलेटिन जारी कर रहा है। इस बुलेटिन में गिलगित-बाल्टिस्तान और मुजफ्फराबाद का भी उल्लेख है, क्योंकि यह भारत हिस्सा है।
 
इस शिकायत के बाद, पाकिस्तान ने भी 15 जनवरी 1948 को सुरक्षा परिषद में अपना उत्तर प्रस्तुत किया। पाकिस्तान ने मजहब के आधार पर देश के विभाजन का तर्क दिया और कश्मीर के विषय को भी हिन्दू-मुस्लिम की दृष्टि से प्रस्तुत किया। पाकिस्तान का कहना था कि ‘पूरे भारत में सांप्रदायिक दंगे हो रहे हैं और मुस्लिमों को प्रताड़ित किया जा रहा है'। उसने कश्मीर के साथ हैदराबाद और जूनागढ़ के विषय को भी जोड़ दिया। तर्क दिया कि 'कश्मीर में चल रही हिंसक अशांति जम्मू—कश्मीर के हिन्दू राजा के विरोध में मुस्लिम प्रजा का विद्रोह है। पाकिस्तान सरकार ने जम्मू—कश्मीर प्रांत का अधिमिलन भारत में न तो स्वीकार किया है, और न करेगी। यह हिंसा के बल पर किया गया है और झूठा है। यह विलय वहां की जनता के विरोध में है और यह विलय नैतिक, संवैधानिक, भौगोलिक, आर्थिक, सांस्कृतिक व साम्प्रदायिक, किसी भी आधार पर उचित नहीं ठहराया जा
सकता है।’
 
17 जनवरी 1948 को सुरक्षा परिषद ने प्रस्ताव क्रमांक (38)—1948 के माध्यम से दोनों देशों को शांति बनाये रखने को कहा। इस संदर्भ में कई प्रस्ताव आए, लेकिन उनमें प्रस्ताव क्रमांक 47 महत्वपूर्ण है। यह प्रस्ताव सुरक्षा परिषद ने 21 अप्रैल, 1948 को पारित किया, जिसमें प्रतिनिधियों की संख्या तीन से बढ़ाकर 5 कर दी गयी और निम्नलिखित महत्वपूर्ण निर्णय लिये गये-
    1. पाकिस्तान की सरकार अपने प्रयास से जम्मू और कश्मीर प्रांत से अपने नागरिक और कबीलाई लोगों, जो वहां के नागरिक नहीं हैं और जिन्होंने युद्ध की मंशा से प्रवेश किया है, को बाहर करे; इस प्रकार के तत्वों की घुसपैठ को रोके तथा जो प्रांत में युद्धरत हैं, उन्हें किसी प्रकार की भौतिक सहायता न पहुंचाए।
    2. भारत सरकार को जब यह आयोग के माध्यम से लगे कि कबीलाई लोग वापस चले गए हैं और अब युद्ध प्रभावी रूप में स्थगित हो गया तो वह आवश्यक संख्या में अपनी सेनाएं जम्मू और कश्मीर में रख कर अतिरिक्त बल वापस बुला ले। न्यूनतम संख्या में उपस्थित यह सेना नागरिक प्रशासन की सहायता करेगी ताकि विधि और व्यवस्था बनी रहे।
    3. भारत सरकार जम्मू—कश्मीर प्रांत में जनमत संग्रह के लिए प्रशासन स्थापित करेगी जो भारत या पाकिस्तान में विलय के लिए जनमत संग्रह कराएगा।
इस प्रस्ताव के बाद संयुक्त राष्ट्र ने 13 अगस्त 1948 को प्रस्ताव पारित किया, जिसमें युद्ध विराम की घोषणा की गयी। इस युद्ध विराम प्रस्ताव के आदेशानुसार भारत और पाकिस्तान के उच्च पदाधिकारी शीघ्रातिशीघ्र अलग-अलग एक साथ युद्ध विराम को चार दिन के अंदर लागू करने के आदेश देंगे। इस युद्ध विराम प्रस्ताव में भारत और पाकिस्तान के लिए एक सैन्य पर्यवेक्षण समूह की नियुक्ति की जाएगी जो इस युद्ध विराम पर निगरानी रखेगा। प्रस्ताव के दूसरे भाग में कहा गया कि यदि पाकिस्तानी सेनाओं की जम्मू और कश्मीर में उपस्थिति बनी रहती है तो इसे इस क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र द्वारा पाकिस्तान की ओर से ‘भौतिक स्थिति’ में बदलाव माना जाएगा, क्योंकि पाकिस्तानी सरकार सुरक्षा परिषद के सामने इस क्षेत्र से अपनी सेनाएं वापस बुलाने को सहमत हुई थी। इस प्रकार पाकिस्तान सरकार के लिए जम्मू और कश्मीर प्रांत से अपनी सेनाएं, पाकिस्तानी नागरिक और कबीले के लोगों को, जो लड़ने के उद्देश्य से घुसे थे, वापस बुलाना एक अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता थी।
 
पाकिस्तान की वैधानिक स्थिति
 
पाक अधिक्रांत जम्मू कश्मीर के भू-भाग का उल्लेख पाकिस्तान के किसी भी महत्वपूर्ण दस्तावेज में नहीं है। यह सर्वविदित है कि पाकिस्तान का निर्माण भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947 के तहत हुआ है। यह अधिनियम पाकिस्तान के भूमि का विवरण इस प्रकार देता है-
  • वह क्षेत्र जो नियुक्ति दिवस के अवसर पर पूर्वी बंगाल प्रान्त और पश्चिमी पंजाब प्रान्त है।
  • वह क्षेत्र जो सिंध प्रान्त और मुख्य आयुक्त प्रान्त ब्रिटिश बलूचिस्तान है।
  • उत्तरी पश्चिम सीमा प्रान्त, जो गवर्नर-जनरल द्वारा घोषित किया गया है।
  • पाकिस्तान के संविधान 1956, 1962, और 1973 में कहीं भी ‘पाक अधिक्रांत जम्मू—कश्मीर’ का उल्लेख नहीं है। वर्तमान में पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 1 में जो भू-भाग वर्णित है वह है- पाकिस्तान एक संघीय गणतंत्र होगा जिसे इस्लामिक गणतंत्र पाकिस्तान के नाम से जाना जायेगा। पाकिस्तान के भू-भाग क्षेत्र में शामिल होगा-
  • बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब और सिंध
  • इस्लामाबाद राजधानी क्षेत्र, जिसे अब संघीय राजधानी के नाम से जाना जायेगा
  • संघ द्वारा प्रशासित जनजातीय क्षेत्र
अन्य राज्य और क्षेत्र, जो पाकिस्तान में अधिग्रहण अथवा अन्य माध्यम से जुड़ें।
इस प्रकार कहीं भी पाकिस्तान के संविधान में ‘पाक अधिक्रांत जम्मू—कश्मीर’ का वर्णन नहीं है। इस भू-भाग पर पाकिस्तान का कोई वैधानिक या संवैधानिक दावा नहीं है। इस प्रकार पाकिस्तान ने अवैध रूप से जम्मू—कश्मीर के भू-भाग पर कब्जा कर रखा है।
‘पाकिस्तान अधिक्रांत जम्मू कश्मीर’ के निवासियों को पाकिस्तान की नागरिकता लेने के लिए वही प्रक्रिया अपनानी पड़ती है, जो किसी अन्य विदेशी नागरिक को अपनानी पड़ती है। यह बात भी सिद्ध करती है कि यह भू-भाग पाकिस्तान का नहीं है।
मीरपुर-मुजफ्फराबाद के मुख्य न्यायाधीश ने पूर्ण खंडपीठ के साथ 15 मार्च 2010 को एक निर्णय दिया कि 'आजाद जम्मू—कश्मीर के न्यायाधीशों की नियुक्ति से संबंधित किसी भी याचिका पर सुनवाई करना पाकिस्तान के सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिकार क्षेत्र में नहीं आता है। इस प्रकार की याचिकाएं पाकिस्तानी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधिकार और परिधि में नहीं आती हैं'। यह आदेश पुन: कहता है कि 'पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 1 में पाकिस्तान के भू-भाग को परिभाषित किया गया है। पाकिस्तान सर्वोच्च न्यायालय का न्यायाधिकार उस क्षेत्र से बाहर नहीं हो सकता'।
पाकिस्तानी संविधान का अनुच्छेद 257 जम्मू—कश्मीर और पाकिस्तान के मध्य सम्बन्धों को वर्णित करता है। यह कहता है कि जब जम्मू—कश्मीर प्रांत के लोग पाकिस्तान में विलय का निर्णय कर लेंगे तब पाकिस्तान और प्रांत के सम्बन्धों को प्रांत के लोगों की इच्छानुसार निर्धारित किया जाएगा।
 
पाकिस्तान की नीति
पाकिस्तान की नीति है कि ‘कश्मीर पाकिस्तान की ग्रीवा शिरा है और विभाजन का अपूर्ण मुद्दा। पाकिस्तान के लोग और सरकार, आत्म-निर्णय और भारत के अवैध, अन्यायपूर्ण और बलात् नियंत्रण के विरुद्ध जम्मू—कश्मीर के लोगों को अपना नैतिक, राजनीतिक और कूटनीतिक समर्थन देती रहेगी।’ नि:संदेह कश्मीर में पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद का पोषक है। आतंकवादी गतिविधियों का मुख्य स्रोत है।
 
भारत के विकल्प
आज स्थिति यह है कि भारत की भूमि पाकिस्तान के अवैध कब्जे में है। ऐसे में भारत के पास क्या विकल्प हैं? पाकिस्तान शांति से यह भूमि भारत को वापस नहीं करेगा, क्योंकि उसने तत्कालीन संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव का भी परिपालन नहीं किया है। शिमला समझौते की भावना का भी वह लगातार उल्लंघन करता रहा है। भारत और पाकिस्तान के 1971 के युद्ध में सुरक्षा परिषद में अंतिम बार कश्मीर विषय पर बहस हुई थी। उसके बाद शिमला समझौता हुआ और कश्मीर विषय को द्विपक्षीय मान लिया गया। शिमला समझौते के अनुसार, दोनों देशों ने यह संकल्प लिया है कि ‘अपने सभी मतभेदों को शांतिपूर्ण साधन से द्विपक्षीय बातचीत या आपसी सहमत से हल करेंगे। एक दूसरे की राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीय अखंडता, राजनीतिक स्वतंत्रता और संप्रभु समानता का सम्मान करेंगे।’
 
भारत के पास अपनी भूमि की सुरक्षा के लिए सारे विकल्प खुले हुए हैं। गिलगित—बाल्टिस्तान को वापस अपने भू—भाग में मिलाने पर वह किसी प्रकार की संधि, अंतरराष्ट्रीय विधि या प्रस्ताव का उल्लंघन नहीं करेगा। मंत्रालय द्वारा जारी विज्ञप्ति में स्पष्ट कहा गया है कि भारतीय संसद ने 22 फरवरी 1994 को जो संकल्प पारित किया है वही हमारी नीति का आधार है। भारतीय संसद का प्रस्ताव कहता है कि ‘जम्मू—कश्मीर राज्य भारत का अविभाज्य अंग रहा है और रहेगा तथा शेष भारत से पृथक करने के किसी भी प्रयास का सभी आवश्यक साधनों से विरोध किया जाएगा। भारत की एकता, प्रभुसत्ता और क्षेत्रीय अखंडता के विरुद्ध हर तरह के षड्यंत्रों का प्रतिरोध करने की इच्छा शक्ति और क्षमता भारत में है। भारत की संसद मांग करती है कि पाकिस्तान को भारत के राज्य जम्मू—कश्मीर के सभी क्षेत्र खाली कर देने चाहिए जिन्हें आक्रमण कर हथिया लिया गया है, और संसद यह संकल्प करती है कि भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के किसी भी प्रयास का डटकर मुकाबला किया जाएगा।’ इन तमाम बिन्दुओं के प्रकाश में, स्पष्ट है कि 4 मई 2020 को भारत सरकार द्वारा पाकिस्तान की हरकतों को ध्यान में रखते हुए जारी की गई प्रेस विज्ञप्ति मात्र एक सरकारी विज्ञप्ति नहीं, बल्कि सरकार का दृढ़ संकल्प है।
(लेखक जम्मू-कश्मीर अध्ययन केन्द्र से संबद्ध हैं)