पाकिस्तान: मुल्ला-मौलवी मदरसों में कर रहे बच्चों का यौन उत्पीड़न

    दिनांक 13-मई-2020   
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मजहबी लोकतांत्रिक देश पाकिस्तान के मदरसों के बंद कमरों से दिल दहलाने वाली कहानियां बाहर आ रही हैं। इन बंद कमरों में लंबी दाढ़ी, सिर पर टोपी, हाथ में तसबीह धरे लोग न जाने कितने मासूमों की जिंदगी में रोजाना जहर घोल रहे हैं

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मजहबी लोकतांत्रिक देश पाकिस्तान के मदरसों के बंद कमरों से दिल दहलाने वाली कहानियां बाहर आ रही हैं। इन बंद कमरों में लंबी दाढ़ी, सिर पर टोपी, हाथ में तसबीह धरे लोग न जाने कितने मासूमों की जिंदगी में रोजाना जहर घोल रहे हैं। बच्चे मदरसों की इन काल कोठरियों से छूटकर जब बाहर आते हैं तो उन्हें सामान्य होने में वर्षों लग जाता है। उन्हीं बच्चों में से एक है ग्यारह वर्षीय मुहिम।
दक्षिण पंजाब के पाकपट्टन शहर में रहने वाले वाले इस बच्चे की दिली तमन्ना डॉक्टर बनने की थी। घरेलू आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं होने के कारण उसके अभिभावकों ने उसका दाखिला पास के एक मजहबी स्कूल में करा दिया। एक दिन स्कूल का मौलवी मोईन शाह उसे घसीट कर एक कमरे में ले गया और उसके चिल्लाने के बावजूद मौलवी उससे दुष्कर्म करता रहा। कमरे से बाहर आने के बाद से वह सदमे में है। मनः स्थिति बिल्कुल बिगड़ चुकी है। न खाता है न खेलता और न ही किसी से बात करता है। हर दम चाची शाजिया की गोद में दुबका रहता है। पाकिस्तान के मदरसों के कमरों से रोजाना ऐसी दर्दनाक कहानियां बाहर आ रही हैं। शाजिया कहती हैं कि वह बचपन से मौलवी मोईन शाह को जानती है। वह अव्वल दर्जे का नशेड़ी है। उसने केवल बच्चों को ही नहीं, कई बच्चियों को भी अपनी हवस का शिकार बनाया है। एक बार मदरसे के बंद कमरे में एक बच्ची से मौलवी ने इतनी दरिंदगी की कि उसकी पीठ ही टूट गई। उसके बावजूद यह वहशी मौलवी छुट्टा घूम रहा है।
पाकिस्तान में 22 हजार मदरसे हैं, जिनमें 20 लाख से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं। यहां पढ़ाने वाले अधिकांश मौलवी और मौलानाओं का व्यवहार बच्चों के प्रति वहशियाना ही होता है। चूंकि मदरसों पर नजर रखने के लिए पाकिस्तान में कोई केंद्रीय निकाय या केंद्रीय प्राधिकरण नहीं है, इस लिए बच्चे-बच्चियों को प्रताड़ित करने वाले मौलवी, मौलानाओं का कोई बाल बांका नहीं कर पाया। उनके शिकार बच्चों के मां-बाप पहले तो लाज शर्म से कोर्ट-कचहरी जाना पसंद नहीं करते। यदि कोई हिम्मत दिखाता भी है तो उनकी सुनवाई नहीं होती। कई बार मौलवियों के ईशनिंदा का आरोप लगाने से बच्चों के अभिभावक ही रक्षात्मक स्थिति में आ जाते हैं। इस संदर्भ में पुलिस उपाधीक्षक सादिक बलोच कहते हैं कि जब मामले की जांच की जाती है तो बच्चों के परिवार वाले दबाव या किसी मजबूरी के तहत पीछे हट जाते हैं।

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उन्होंने ऐसे मौलवियों कोसमाज और महजब का कलंक बताते हुए कहा कि वे अक्सर रूढ़ीवादी परिवार के बच्चों को शिकार बनाते हैं, ताकि शर्म से कोई बखेड़ा न कर सके। मदरसों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चे पढ़ते हैं, जिनके मां-बाप रोजी-रोटी के चक्कर में हर तरह के विवाद से दूर रहना चाहते हैं। हालांकि ऐसी घटनाओं में निरंतर आ रही वृद्धि के चलते इस वर्ष 31 जनवरी को पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में बड़ा प्रदर्शन हुआ था। इसके बावजूद दागी मदरसों या मौलवियों के खिलाफ अब तक कोई कार्रवाई नहीं की गई है। न ही सरकार की ओर से ऐसी कोई रणनीति बनाई गई है, जिससे मदरसों में बच्चे-बच्चियों को दुष्कर्म और शारीरिक शोषण से बचाया जा सके। सत्ता में आने के बाद अक्तूबर 2018 में उलेमा के साथ बैठक में प्रधानमंत्री इमरान खान ने मदरसों की स्थिति में सुधार लाने के लिए उनके पाठयक्रम को आधुनिक बनाने और मदरसों की जवाबदेही तय करने की घोषित की थी, जिन पर अमल अभी बाकी है।
शिक्षा की दयनीय स्थिति
पाकिस्तान में शिक्षा और शिक्षण संस्थानों की स्थिति बड़ी दयनीय है। इसे सिंध प्रांत के स्कूल की दशा से भी समझा जा सकता है। इस प्रदेश के 17,701 सरकारी स्कूल में मात्र एक तथा केवल 9 प्रतिशत में विज्ञान शिक्षक हैं। ऐसे में पाकिस्तान के मदरसों एवं मजहबी स्कूलों की दशा क्या होगी, आसानी से समझा जा सकता है। पाकिस्तानी मदरसों में आतंकियों के जत्थे तैयार किए जाने का भी आरोप है।
मदरसों में पढ़ाने वाले मौलवी करते हैं यौन उत्पीड़न
पाकिस्तान के मदरसों में बच्चों से दुष्कर्म के थानों में दर्ज मामलों का अध्ययन करने वाले पत्रकार जार खान, असीम तनवीर और रियाज़ खान ने इस पर एक व्यापक रिपोर्ट तैयार की है। इसके मुताबिक, पूरे पाकिस्तान के मदरसों में पढ़ाने वाले मौलवियों पर यौन उत्पीड़न, बलात्कार और शारीरिक शोषण का आरोप है। जो मौलवी दुराचारा में लिप्त नहीं, वह बच्चों का किसी न किसी तरह शारीरिक और मानसिक शोषण कर रहा है। उनके खिलाफ पुलिस अधिकारी और पीड़ित के मां-बाप इसलिए नहीं जाते कि यदि उसने ईशनिंदा का आरोप लगाया तो उल्टे उन्हें ही जेल जाना पड़ सकता है। पाकिस्तान में ईशनिंदा की सजा उम्रकैद से लेकर फांसी है। इसलिए रोज कमाने-खाने वाले इस तरह के पचड़े में पड़ने से बचते हैं। कई पुलिस अधिकारी मानते हैं कि मुकदमा दर्ज कराने के बावजूद अभिभावकों के पीछे हट जाने से आज तक पाकिस्तान के किसी मदरसे के मौलवी को सजा नहीं हो पाई है। इस देश में मौलवी सियासी और सामाजिक तौर पर भी अब काफी शक्तिशाली हो चुके हैं, जिस पर हाथ डालना किसी भी सरकार के लिए संभव नहीं। ताजा उदाहरण बढ़ते कोरोना संक्रमण के बीच मुल्ला—मौलवियों के दबाव में
लॉकडाउन के बीच नमाज के लिए मस्जिदों को खोलने के लिए इमरान खान सरकार को राजी होना है। मुल्ला-मौलवियों के दबाव के चलते ही सुप्रीम कोर्ट से ईशनिंदा के आरोप से बरी होने के बावजूद एक ईसाई महिला को पाकिस्तान बदर होना पड़ा था।

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मौलवियों के दबाव के कारण ही पिछले दो साल से सुदूरवर्ती कोहिस्तान का एक मजदूर पिता अपने बच्चे यस मुहम्मद को इंसाफ दिलाने के लिए भटक रहा है। वह अपने बच्चे को किसी अच्छे स्कूल में पढ़ाना चाहता था। आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण उसने अपने शहर से सौ किलोमीटर दूर मानसेहरा के एक आवासीय मजहबी स्कूल में बच्चे का दाखिला करा दिया। एक दिन यस के पिता को मदरसे से फोन आया कि अपने बच्चे को आकर ले जाए। उसकी स्थिति बहुत नाजुक है। वह भागकर मदरसा पहुंचा और बच्चे को पास के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया। लंबे उपचार के बाद अब वह ठीक है। बातचीत में उसके चाचा ने बताया कि मदरसे में छुट्टी के दिन जब यस मस्जिद में कपड़े धो रहा था। मौलवी कारी शमसुद्दीन उसे घसीटते हुुए मदरसे के कमरे में ले गया। दिसंबर के महीने में अत्यधिक ठंड होने के बावजूद उसके शरीर से सारे कपड़े उतार दिए गए। फिर डंडे से पिटाई की गई ताकि वह भयभीत हो जाए। उसके बाद मौलवी कई दिनों तक उसके साथ बलात्कार करता रहा। स्थिति बिगड़ने पर एक दिन उसके अभिभावकों को फोन पर उसकी तबियत खराब होने की सूचना दी गई। अस्पताल के डॉक्टर फैसल मनन सालारजाई बताते हैं कि जब यस को उनके पास लाया गया था तब वह बेहद कमजोर और लगातार चिल्ला रहा था। उसके शरीर पर कई जगह चोट और सिर, छाती और पैरों पर गहरे घाव थे। जैसे कोई दरिंदा आठ वर्ष के मासूम को निरंतर नोचता रहा हो। सालारजई बताते हैं कि जब यस के चाचा को बताया गया कि उसके भतीजे का यौन उत्पीड़न होता रहा है तो पहले उसे यकीन ही नहीं हुआ। फिर मौलवी पर केस करने की बजाए उल्टा डॉक्टर से गिड़गिड़ाने लगा कि किसी को यह पता ना चले कि मदरसे में उसके भतीजे से दुष्कर्म किया गया है। अन्यथा उसकी समाज में बड़ी बदनामी होगी। डॉक्टर सालारजाई कहते हैं कि चाचा के विरोध के बावजूद उन्होंने इसकी सूचना स्थानीय पुलिस को दे दी। यस के पिता अब्दुल कय्यूम का कहना है कि बेटे के मदरसा में दाखिला के पहले तीन महीने तक उसने बेटे की कोई सुध नहीं ली। यदि वहां जाता तो यह दिन देखने नहीं पड़ते। वह चाहते हैं कि उनके बेटे के साथ दुष्कर्म करने वाले मौलवी को फांसी की सजा दी जाए।