बच्चा स्कूल तभी छोड़े, जब वह साक्षर हो जाए और अपने शेष जीवन में साक्षर बना रहे: बाबासाहेब

    दिनांक 13-मई-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 35:-

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बाबासाहेब एक विश्वविख्यात अर्थशास्त्री होने के साथ-साथ जाने-माने शिक्षाविद् भी थे। उन्होंने अपने शिक्षा-संबंधी विचारों में प्राथमिक शिक्षा से लेकर विश्वविद्यालयीय स्तर की शिक्षा को अपने ध्यान में रखा। बॉम्बे लेजिस्लेटिव काउंसिल में बहस के बीच उन्होंने प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य स्पष्ट करते हुए कहा, ‘प्राथमिक शिक्षा का उद्देश्य यह है कि प्राथमिक विद्यालय में दाखिल होने वाला बच्चा स्कूल तभी छोड़े, जब वह साक्षर हो जाए और अपने शेष जीवन में साक्षर बना रहे।’ ‘शिक्षा के क्षेत्र के व्यवसायीकरण की आलोचना करते हुए इसी बहस में उन्होंने कहा, ‘शिक्षा विभाग ऐसा नहीं है, जो इस आधार पर चलाया जाए कि जितना वह खर्च करता है, उतना विद्यार्थियों से वसूल किया जाए। शिक्षा को सभी संभव उपायों से व्यापक रूप में सस्ता बनाया जाना चाहिए।’ वे छात्र-वृत्ति देने की प्रचलित पद्धति को उचित नहीं मानते थे क्योंकि बच्चों के गरीब माता-पिता इसे बच्चों की शिक्षा पर खर्च करने की बजाए परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं। वे इसकी बजाए ऐसे छात्रावास बनाए जाने के पक्ष में थे जिन्हें सरकार या पिछड़ी जातियों को बढ़ावा देने वाली संस्थाएं चलाएं। उच्च शिक्षा के क्षेत्र में उन्होंने इसी बहस में कुछ महत्वपूर्ण सुझाव प्रस्तुत किए-
1. विश्वविद्यालय और महाविद्यालयों के उद्देश्य भिन्न-भिन्न हों
2. विश्वविद्यालय पूर्व तक कक्षाओं का भार अपने ऊपर लें।
3. विद्यार्थी किसी भी कॉलेज में जाकर किसी भी प्राध्यापक का व्याख्यान सुनने को स्वतंत्र हों।
वे समय-समय पर ऐसे बहुत से रचनात्मक सुझाव देते रहते थे। आज आवश्यकता इस बात की है कि इन सुझावों की गंभीर समीक्षा करके इनका उचित क्रियान्वयन किया जाए।
समय आ गया है कि बाबासाहेब के विचार-सागर का गहन मंथन कर उनके विचार-रत्नों से इस राष्ट्र को समृद्ध किया जाए। उन्हें संकुचित सीमाओं में देखे जाने से हमारे समाज और राष्ट्र की गंभीर क्षति हुई है। उनके विचार जिस अनुपात में सार्थक और रचनात्मक हैं, उसी अनुपात में प्रासंगिक भी। उनके विचार समय बदलने के साथ और भी महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। इसलिए राष्ट्र-निर्माण में उनके विचारों के अनुसरण को एक आंदोलन का रूप दिए जाने की आवश्यकता है।