स्वर्णिम इतिहास वाले सिंध में आज दयनीय होती जा रही हिंदुओं की स्थिति

    दिनांक 13-मई-2020
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राघवेंद्र वर्मा
पाकिस्तान के सिंध प्रांत में जितने भी हिंदू बचे हैं उनकी स्थिति दिन प्रतिदिन दयनीय होती जा रही है। पाकिस्तान का हिस्सा बनने से पहले और मोहम्मद बिन कासिम द्वारा लूटे जाने से पहले सिंध अपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है

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आज के समय में पाकिस्तान का दक्षिण पूर्वी राज्य जिसकी राजधानी कराची में है. मान्यता है कि सिंध का नाम स्त्रोत संस्कृत शब्द सिन्धु है, जो भारत और पाकिस्तान के बीच बहने वाली एक प्रमुख नदी है. इस राज्य का नाम ऐसा इसलिए भी है क्यूंकि यह सिन्धु नदी के किनारे मौजूद है.
हिन्द – मान्यता अनुसार यह नाम भी संस्कृत शब्द सिन्धु से उत्पन्न है. सिंध आज के समय पाकिस्तान का एक हिस्सा है जो सिन्धु नदी और थार मरुस्थल के आस पास की भूमि है. इतिहास में इसे भारतीय उपमहाद्वीप का अहम हिस्सा माना गया है, जिसे विश्व की सबसे बड़ी सभ्यता सिन्धु घाटी सभ्यता का केंद्र बिंदु भी कहा जाता है. लेकिन पाकिस्तान का हिस्सा बनने से पहले और मोहम्मद बिन कासिम द्वारा लूटे जाने से पहले, इसका अपना एक स्वर्णिम इतिहास रहा है. असल में यह क्षेत्र हिन्दू धर्म का बहुत बड़ा भू-भाग था, जहां शांतिप्रिय तरीके से हिंदू रहते थे। आज भी वहां हिंदू बचे हैं लेकिन उनकी स्थिति बेहद दयनीय है.
सिंध का महाभारतकालीन इतिहास
पहली बार सिंध का जिक्र महाभारत में होता है जहां सिंध के राजा जयद्रथ का नाम आता है. बता दें कि कौरव दामाद जयद्रथ कौरवों की ओर से पांडवों के विरुद्ध युद्ध में लड़े थे. महाभारत काल के बाद सिंध का जिक्र सिन्धु घाटी सभ्यता में आता है, जहां इसे इस सभ्यता का एक अहम क्षेत्र माना गया है. इस सभ्यता के दौरान यह क्षेत्र हिन्दू संस्कृति और कला के चलते बेहद प्रचलित था, जिसके चित्रलेख आज भी शोध का विषय है.
सिंधु घाटी सभ्यता के समय सिंध क्षेत्र में धर्म के प्रचार प्रसार की लिखित रूप में कम ही जानकारी मिलती है, लेकिन बहुत से शिलालेख खुदाई में सामने आते रहे हैं जिन पर लिखी लिपि बहुत कुछ कहती है. उनमें बहुत से शिलालेखों का अर्थ बखूबी निकाल भी लिया गया है और उनसे पता चलता है कि मोहन जोदड़ो सिंध का बेहद सुंदर नगर था. इस नगर की खुदाई में पाये गये बड़े स्नानघर, बड़ी ईंटों से बनी इमारत और योजनाबद्ध तरीके से बनाई गई जल निकासी व्यवस्था से पता चलता है कि यहां रहने वाला जन समुदाय बेहद खुशहाल और योजनात्मक जीवन शैली के साथ अपना निर्वाह करता था. यहां हिन्दू निवास करते थे। धर्म यहां का प्रमुख धर्म था, जो यहां की पाई गई मन्दिर की प्रतिमाओं और धार्मिक स्नान के लिए बने स्नानघरों से पता चलता है. इसका एक कारण ये भी है कि हिन्दू मन्दिरों की पहचान उनके पास बने धार्मिक स्नान के लिए बने तालाबों से होती है और मोहन जोदड़ो इसी तथ्य का एक उदाहरण है. इसके अलावा इस नगर की खुदाई में प्राप्त हुई देवी की प्रतिमा और भगवान शिव की मुहर भी सिन्धु घाटी सभ्यता के समय सिंध में हिन्दू धर्म की प्रमुख मान्यता को दर्शाती हैं. बता दें कि समय समय पर यहां हिन्दू शास्त्र अनुसार पवित्र धार्मिक चिन्ह जैसे स्वास्तिका, ॐ आदि के उपयोग के बारे में जुड़े तथ्य भी सामने आते रहे हैं. इन चिन्हों का जिक्र हड़प्पा के लेखों में बखूबी किया गया है.
सिन्धु घाटी सभ्यता के बाद सिंध का आधुनिक इतिहास
325 ई में सिंकन्दर के आक्रमण के समय में सिंध के आधुनिक इतिहास की जानकारी मिलती है. इस समय सिंध का शासक साहसी नामक राजा था जिसके वंश ने सिंध में 2000 वर्ष तक शासन किया. इस दौरान भी सिंध में हिंदू ही थे, 313 ईस्वी में चन्द्रगुप्त मौर्य के शासन काल में यहां बौद्ध मत का आगमन हुआ. बौद्ध नगर सिराज-जी-टाकरी आज भी सिंध के ऊपरी क्षेत्र में स्थित है. इस नगर के आस पास खुदाई में बौद्ध स्तूप और कुछ अन्य कला संबंधी तथ्यों के प्रमाण मिलते रहते हैं, जो बौद्ध सभ्यता से संबंधित हैं. लेकिन हिन्दू धर्म का फिर से स्वर्णिम काल इस क्षेत्र में वापस आया जब गुप्त राजवंश ने यहां शासन किया. गुप्त साम्राज्य ने पूरे भारत में अपनी पकड़ बनाई. मुख्यतः सिंध क्षेत्र में इसकी छाप अधिक रही. इस दौरान सिंध में अनेकों हिन्दू मन्दिरों और तीर्थ स्थलों का निर्माण संभव हुआ. बल्कि ये कहा जा सकता है कि इस दौरान इस क्षेत्र में हिन्दू धर्म अपने गौरवशाली रूप में प्रकाशमय था. देवी-देवताओं की आराधना के साथ ब्राह्मणों और गौ माता को भी बेहद सम्मान दिया जाता था. मोहम्मद बिन कासिम के आक्रमण से पहले, हिन्दू धर्म इस क्षेत्र के कण कण में समा चूका था. यहां का अंतिम हिन्दू शासक एक हिन्दू ब्राह्मण राजा था, जिसका नाम राजा दाहिर था. राजा दाहिर ने मोहम्मद बिन कासिम का डटकर बखूबी सामना किया था और उनका शौर्य आज भी इतिहास में अमर है.
सिंध में हिन्दू धर्म ने बेहतरीन गौरवशाली इतिहास को अपने अंदर समाया हुआ है. लेकिन इसमें सिर्फ धार्मिक मान्यताएं ही शामिल नहीं हैं बल्कि उस समय अपनाई गई कुछ तकनीकें आधुनिक विज्ञान के सामने आज भी पहली मात्र हैं जिन्हें सुलझाना संभव नहीं हो पाया है.
आज के सिंध की बात करें तो वहां हिन्दू धर्म की बेहद पीड़ादायक स्थिति है. कश्मीर में पंडितों के नरसंहार से बहुत समय पहले ही भारतीय उपमहाद्वीप के उतरी पूर्वी क्षेत्र में सिंधी हिन्दू परिवारों का नरसंहार शुरू हो चुका था। जहां हिन्दू मन्दिरों को भी नेस्तनाबूद किया गया. पुस्तकालयों को आग लगा दी गई ताकि कोई यहां का इतिहास आगे न जान सके.
इस दौरान बचे हुए हिन्दू सिन्धी परिवार भारत में आ बसे और आज गर्व से अपनी सभ्यता के साथ जीवन व्यापन कर रहे हैं. मगर उनके अंदर का दर्द आज भी शेष है, क्यूंकि लगभग हर सिन्धी हिन्दू ने बंटवारे से पहले या बंटवारे के बाद किसी अपने को खोया है.
( लेखक सिंधी इतिहास पर शोध कर रहे हैं )