ऐसा प्रजातंत्र, जो श्रमिकों को अपना दास बना वह प्रजातंत्र का उपहास है: बाबासाहेब

    दिनांक 13-मई-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 34:-

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बाबासाहेब की राजनीतिक दृष्टि सामाजिक न्याय की अवधारणा पर आधारित थी। प्रजातंत्र उनकी दृष्टि में आदर्श शासन-व्यवस्था है किंतु वे सामाजिक प्रजातंत्र के पक्षधर थे। यह सामाजिक प्रजातंत्र सम्पूर्ण सामाजिक समानता से प्राण-रस ग्रहण करता है। इसलिए वे मानते थे कि संसदीय लोकतंत्र ने आजादी पर बल देते हुए सामाजिक समानता की उपेक्षा की। 22 दिसंबर, 1952 को पुणे में भाषण देते हुए उन्होंने कहा, ‘लोकतंत्र की कामयाबी की सबसे पहली शर्त यह है कि समाज में किसी तरह की असमानता नहीं होनी चाहिए। कोई दलित वर्ग न हो और कोई शोषित वर्ग भी न हो। ऐसा कोई वर्ग न हो जिसके सिर पर सारा बोझ हो। इस तरह का वर्ग-भेद हिंसक क्रान्ति को जन्म देता है और लोकतंत्र भी उसका उपचार नहीं कर सकता’। प्रजातंत्र के वास्तविक स्वरूप को उद्घाटित करते हुए उन्होंने 15 सितंबर, 1938 को अपने भाषण में शुद्घ राजनीतिक प्रजातंत्र का खंडन करते हुए कहा, ‘ऐसा प्रजातंत्र, जो श्रमिकों को अपना दास बना ले, उन्हें संगठन, शक्ति और बुद्घि से वंचित कर दे, तो मैं कहूंगा कि वह प्रजातंत्र नहीं बल्कि प्रजातंत्र का उपहास है।’ आज लोकतंत्र के माहौल में हम जिस दिशा में बढ़ रहे हैं, उस पर बाबासाहेब के राजनीतिक विचारों के परिप्रेक्ष्य में पुनर्विचार की आवश्यकता है