अब नहीं निकलेंगे जनाजों से आतंकी !

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वर्षों से कश्मीर में आतंकियों के जनाजों को बाकायदा एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। इन जनाजों में मारे गए आतंकी को बंदूक से सलामी देकर न केवल उसे महिमामंडित किया जाता था बल्कि यहां पर भारत विरोध में आग उगली जाती थी। इस सबसे घाटी के युवा कट्टरपंथ की राह पर बढ़ते थे। लेकिन हाल के कुछ दिनों में यह सब बंद हुआ है। आतंकी रियाज नाइकू इसका उदाहरण है

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कश्मीर के जनाज़ों की भीड़ ही किसी व्यक्ति की लोकप्रियता को मापने का महत्वपूर्ण पैमाना है। कहते हैं आज तक की सबसे बड़ी भीड़ शेख़ अब्दुल्ला के जनाज़े में ही हुयी थी। यह बात सच भी है क्योंकि आधुनिक कश्मीरी खिलाफत के संस्थापक वही थे, इसीलिए एक मुस्लिम बहुल राज्य में उनके अनुयायी भी अधिक रहे। यह भीड़ मुर्दों को भी नायक बनाती है।
जनवरी, 2016 में मुफ़्ती मोहम्मद सईद के जनाज़े में विभिन्न सूत्रों और मीडिया के माध्यम से बताई जाने वाली भीड़ की संख्या 1000 से 5000 के बीच थी तो वहीं पाकिस्तानी इस्लामिक आतंकी अब्दुल रहमान उर्फ अबू कासिम के जनाजे में इससे ज्यादा भीड़ जुटी थी। कश्मीर के जानकार मानते हैं कि भारतीय जनता पार्टी और पीडीपी गठबंधन के कारण मुफ़्ती मोहम्मद सईद की लोकप्रियता का ग्राफ काफी नीचे गिरा। उसकी वजह साफ थी कि घाटी का एक कटृटरपंथी तबका भाजपा को सदैव से एक हिन्दू राजनीतिक दल मानता चला आ रहा है और इसीलिए उसका विरोधी है। इसी प्रकार, 2016 में आतंकी बुरहान वानी के जनाजे में भी भीड़ उमड़ी थी। कश्मीरी मीडिया ने इसे और बढ़ाकर बताया। इसके पीछे वहां के कथित पत्रकारों की मंशा स्पष्ट थी। उन्होंने अपने—अपने समाचार पत्रों में पोस्टर वॉय, हीरो, आदि शीर्षक देकर न केवल आतंकी का महिमामंडन किया बल्कि घाटी के युवाओं को भड़काया। इसका असर रहा कि महीनों तक कश्मीर अशांत रहा।
निश्चित रूप से जनाजा आंदोलन थे, जो मुस्लिम युवा वर्ग को जिहाद के लिए प्रेरित कर रहे थे। 2017-18 और 2018-19 में नए जिहादियों की अप्रत्याशित वृद्धि इसका प्रमाण है। यह जनाज़ा आंदोलन कश्मीरी आतंकी संगठनों और अलगाववादियों की एक सुनियोजित और दूरदर्शी पहल थी। इसी भीड़ के समक्ष रियाज़ नाइकू जैसे आतंकी गन सैलूट देकर आतंकियों को महिमामंडित करने का काम कर रहे थे।
जिहादी करते थे भीड़ का नेतृत्व
जनाजा में उमड़ने वाली भीड़ का नेतृत्त्व जिहादी स्वयं करते थे। यह भीड़ भय और प्रेम दोनों से ही एकत्रित होती थी। 2004 में संप्रग सरकार के सत्ता में आने से पहले पाकिस्तानी आतंकियों को नियंत्रण रेखा पर ही दफ़नाया जाता था। परंतु कांग्रेस के मुस्लिम तुष्टीकरण की सीमा पाकिस्तान तक जाती है। अतः वह कश्मीरी अलगाववादियों के दबाव में पाकिस्तानी जिहादियों के जनाज़े भी धूम-धाम से निकलवाने पर तैयार रही। यह जनाज़ा आंदोलन एक पैन इस्लामिक प्रक्रिया बन गयी। कश्मीर में एक गर्व द्वारा पाकिस्तानी जिहादियों को कश्मीरी मुसलमानों की हक़ की लड़ाई लड़ने वाला मानकर और अधिक सम्मान दिया जाने लगा। उनके जनाज़े जन आंदोलन की शक्ल लेने लग गए। यह जिहादी सोशल मीडिया के युग में रातों-रात हीरो बन गए। इसमें तड़का लगाने का काम वहां के अलगवावादी ताकतों, सेकुलर मीडिया और कटृटरपंथी दलों ने नेताओं ने किया। धीरे—धीरे यह आतंकी मुस्लिम युवाओं के प्रेरणा स्रोत बन गए। संप्रग सरकार और उसके वाममार्गी सलाहकार सरकार को इस्लामिक तुष्टीकरण के ऐसे ही अनेक उपाय सुझाते रहे और कश्मीर में इस्लामिक अलगाववादियों और आतंकियों को पोषित करते रहे। जिहादी भारतीय सुरक्षा बलों से लड़कर जितनी सफलता नहीं पा रहे थे, उससे कहीं अधिक उनके जनाज़े उनके उद्देश्य को सफल बना रहे थे। यह जनाज़े कश्मीर घाटी को भारत के विरुद्ध संगठित कर रहे थे। 2010 की पहली कश्मीरी इंतिफादा इन्हीं सब कारणों की देन थी। सुरक्षा एजेंसियां भी सरकार की इस्लाम परस्त नीति के चश्मे से ही इन उत्पन्न परिस्थितियों का सामरिक आकलन कर रही थी। नतीजा इन्ही जनाज़ा आंदोलनों से कश्मीर में बुरहान वानी, जाकिर मूसा और रियाज़ नाइकू जैसे जिहादी पैदा हो रहे थे।
कश्मीर घाटी में जहां सलमान रश्दी और तसलीमा नसरीन की किताबों के विरुद्ध हिंसा हो सकती है। जहां छोटी से छोटी झूठी बात को भी मुस्लिम नेतृत्व एक आंदोलन में परिणित कर सकता है, वहां जनाज़ा आन्दोलनों को प्रतिबंधित करना सामरिक और सैन्य हित में एक लंबित निर्णय था। जिस प्रकार इन जनाज़ा आंदोलनों को आयोजित और प्रायोजित किया जा रहा था वह एक स्थापित व्यवस्था का रूप लेते जा रहे थे। इन जनाजों में जो जिहादी उन्माद देखने को मिलता था, सपष्ट करता था कि कैसे यह जिहादी कश्मीर को अशांत करने में लगे हुए हैं।महिलाओं से लेकर बच्चे और युवाओं से लेकर बूढ़ों तक इस आंदोलन का हिस्सा बनाया जाता था। इन आन्दोलनों के गीतों से लेकर उन्मादी नारों तक सब कुछ भारत और भारतीयता के विरुद्ध होता था। लश्कर के अबू दुजाना जैसे आतंकी तक अपने साथी आतंकियों के साथ इन जनाजों की अगुवाई करते थे। तिस पर आतंकियों की कब्रें घाटी में शहादत का नया प्रतीक बनती जा रही थीं। इस्लामिक आतंकी धीरे-धीरे कटृटरपंथी तत्वों को उकसाने वाले बन गए थे। ऐसे में इन जनाजों का अंत निश्चित था।