कैंसर और कोरोना को चुनौती

    दिनांक 14-मई-2020
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माधवी
भिलाई के एक सरकारी अस्पताल में कार्यरत डॉ. पूर्णिमा को आठ साल से कैंसर है। वे जानती हैं कि देश में इन दिनों डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है। इसलिए वह अपनी बीमारी भूलकर प्रतिदिन अस्पताल जाती हैं और वायरस से संक्रमित मरीजों का इलाज करती हैं

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चौवन की उम्र में बच्चों जैसी खिल-खिलाती हंसी, मासूमियत ऐसी कि मानो किसी नादान से बात हो रही। ऐसी हैं डॉ. पूर्णिमा भगतकर। खुद पिछले आठ साल से कैंसर से जंग लड़ रही हैं, पर सरकारी अस्पताल में सेवा देकर कोरोना संकट की घड़ी में लोगों को मुस्कुराने की वजह दे रही हैं। स्तन कैंसर से पीड़ित डॉ. पूर्णिमा के लिए हर दिन किसी चुनौती से कम नहीं होता है। डॉक्टरों ने इन्हें साफ कह दिया था कि आप तीन साल से ज्यादा जिंदा नहीं रह सकती हैं, पर इन्होंने अपनी दृढ़ इच्छा-शक्ति से इस बात को गलत साबित कर दिया। खुद के इलाज कराने के साथ अपने डॉक्टर होने का फर्ज निभाते हुए हर दिन सैकड़ों मरीजों का इलाज कर रही हैं।
 
बहुत कम लोग होते हैं जो मान, सम्मान और ‘कॅरियर’ में ऊंची उड़ान के बाद भी अपने पांव आसमान की जगह जमीन पर रखना पसंद करते हैं। ऐसे ही नायाब, जिंदादिल लोगों में से एक हैं डॉ. पूर्णिमा। इनके संघर्ष के बारे में जब पहली बार सुनी तो यकीन करना थोड़ा मुश्किल हो रहा था। कोई इतनी तकलीफ में भी इतना जीवट कैसे हो सकता है, ये सवाल बार-बार मन में आ रहा था। जब फोन पर हमने एक-दूसरे से बात की तो लगा सच में किसी देवी से साक्षात्कार हो गया। वह उस वक्त कोरोना जांच करवाने गई थीं। मैंने पूछा आप क्यों, तो कहने लगीं, ‘‘बेटा, मैं कैंसर की मरीज हूं, आम लोगों की अपेक्षा मेरी प्रतिरोधक क्षमता बहुत कम है, कोरोना संक्रमण का खतरा दोगुना। इसलिए खुद के लिए सतर्क रहती हूं, ताकि संकट की घड़ी में मैं बीमार न पड़ जाऊं। इस वक्त पूरे देश में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की बेहद कमी है। मैं चाहती हूं कि कोरोना संकट में लोगों के इलाज के लिए हर समय अस्पताल में मौजूद रहूं।’’
 
इनकी ये बातें मन को छू गई। कहती हैं, ‘‘कैंसर है तो क्या हुआ, जिंदगी को तो अभी जीना शुरू किया है। हर इंसान अपना बचपन दोबारा जीना चाहता है, मैं अपनी दो युवा बेटियों के साथ अपना बचपन 54 की उम्र में जी रही हूं। शायद इसलिए अब मरने से डर नहीं लगता। हां, एक बात जरूर कहना चाहूंगी, जब तक जिंदा हूं, एक डॉक्टर के रूप में लोगों को नई जिंदगी देती रहूंगी। शायद यही मेरे जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उन लोगों की दुआ है, जिन्हें शारीरिक तकलीफ के वक्त अपने ज्ञान से दर्द से बाहर निकाल पाई।’’
 
किसी महिला डॉक्टर के मुंह से ये सब बातें सुनकर पता नहीं क्यों, खुद पर तरस आ गया। थोड़ी देर के लिए मन में शंका होने लगी कि एक पत्रकार के रूप में क्या मैं, इनके संघर्ष को सही शब्दों में पिरो पाऊंगी। ऐसे जिंदादिल लोग मौन रहकर देश और समाज पर कितने ही उपकार चुपचाप कर जाते हैं, जिसकी कानों-कान किसी को खबर तक नहीं होती। प्रसिद्धि और दिखावे की दुनिया से दूर बसअपनी ही धुन में दुनिया में खुशी बांटते फिरते हैं। बदले में इन्हें कुछ भी नहीं चाहिए होता है।