मदरसों में घुटती मासूम सिसकियां...

    दिनांक 14-मई-2020   
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मदरसों में मासूम बच्चियों के साथ मुल्ला—मौलवियों द्वारा दीन की तालीम देने की आड़ में बलात्कार किया जाता है। मारा—पीटा और प्रताड़ित किया जाता है। हालत यह है कि बच्चियों की सिसिकियां मदरसों के अंधेरे कमरों में घुटके रह जाती हैं

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इस्लामिक मुल्क पाकिस्तान के मदरसों के बंद कमरों से हर दिन दिल दहलाने वाली कहानियां बाहर आ रही हैं। इन बंद कमरों में लंबी दाढ़ी, सिर पर टोपी, हाथ में तसबीह धरे लोग न जाने कितने बच्चे—बच्चियों की जिंदगी में रोजाना जहर घोल रहे हैं। पाकिस्तान में 22 हजार मदरसे हैं, जिनमें 20 लाख से अधिक बच्चे शिक्षा ग्रहण करते हैं। यहां पढ़ाने वाले अधिकांश मौलवी और मौलानाओं का व्यवहार बच्चों के प्रति वहशियाना ही होता है। चूंकि मदरसों पर नजर रखने के लिए पाकिस्तान में कोई केंद्रीय निकाय या केंद्रीय प्राधिकरण नहीं है, इस लिए बच्चे-बच्चियों को प्रताड़ित करने वाले मौलवी, मौलानाओं का कोई बाल बांका नहीं कर पाया।
बच्चों की तरह बच्चियां भी मदरसे में दरिंदे मौलवियों का शिकार हो रही हैं। ऐसी बच्चियों में शामिल है (परवर्तित नाम) मिस्बाह । दक्षिण पंजाब के गांव बस्ती कासी की इस बच्ची के साथ मौलवी पर बलात्कार का आरोप है। उसके पिता मोहम्मद इकबाल कहते हैं कि उनकी बेटी जब ग्यारह साल की थी तो गांव के मदरसे के मौलवी ने उससे मुुंह काला किया था। पहले यह मदरसा पंजीकृत नहीं था। अब पंजीकृत हो गया है।
 

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मिस्बाह ने बताया कि वह मदरसे में मजहबी शिक्षा लेने जाती थी। एक सुबह जब वहां झाड़ू लगा रही थी, तब मौलवी उसे फुसलाकर कमरे में ले गया और बलात्कार करने लगा। उसके चिल्लाने की आवाज सुनकर उसका चाचा तनवीर भागकर वहां पहुंचा तो देखा कि भतीजी फर्श पर नग्न बेहोश पड़ी है। उसकी खून से सनी पैंट एक कोने में पड़ी थी। उसके बाद मौलवी को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया गया। मगर जल्द ही वह छूटकर आ गया। 11 वर्षीय (परवर्तित नाम) मुहिम की चाची शाजिया कहती हैं कि मौलवी-मौलाना खुद को मजहबी मौलवी कहते हैं, मगर यह दरअसल इस्लाम को बदनाम कर रहे हैं। उनके भतीजे से दुष्कर्म करने वाले मौलवी मोईन शाह को माफ करने के लिए गांव के लोगों द्वारा अब उन पर दबाव बनाया जा रहा है। वह अभी भी छुट्टा घूम रहा है। परिजनों का आरोप है कि पुलिस भी उसे गिरफ्तार करने से बच रही है। पाकिस्तान के कहरोर पक्का की (परवर्तित नाम) कौसर परवीन के साथ मदरसे में बलात्कार करने वाले मौलवी को भी अब तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। कौसर नौ वर्ष की उम्र में मौलवी की हवस का शिकार बनी। उसके परिजन बताते हैं कि वह पास के एक इस्लामिक स्कूल में पढ़ने जाती थी। एक दिन दो कमरों वाले इस्लामिक स्कूल के मौलवी ने चुपके से उसके साथ दुष्कर्म किया।
गांव से लेकर शहर तक मुल्ला—मौलवियों की एक ही मानसिकता

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पाकिस्तान के मदरसों में यौन शोषण के मामलों पर अध्ययन करने वाले पत्रकारों का कहना है कि ऐसी घटनाएं केवल सुदूरवर्ती ग्रामीण इलाकों में ही नहीं शहरों में भी हो रही हैं। देश में जब मुल्ला वर्ग हर तरह से शक्तिशाली हो रहा है तो न कोई सरकार, न सियासी दल और न ही कोई सामाजिक संगठन उनके विरूद्ध जाने की हिम्मत कर रहा है। पीड़ितों के परिजनों का कहना है कि पुलिस भी अक्सर उनका ही साथ देती है। पाकिस्तान की कानूनी प्रणाली भी पीड़ित परिवार को अपराधी को माफ करने को प्रेरित करती है। कई बार तो ऐसे मामलों में मौलवियों की पैरवी करने आतंकी संगठन आगे आ जाते हैं। पाकिस्तान स्थित मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि बलात्कारी मौलवियों पर हाथ डालने का मतलब है आत्मघाती हमले झेलना। एक पूर्व मंत्री कहते हैं कि मदरसों में यौन शोषण हमेशा होता रहा है। ऐसे ही एक मामला उठाने पर आतंकियों ने उन पर बम से हमला किया था, पर वह किसी तरह बच गए। ऐसे मामलों का अध्ययन करने वाले पत्रकारों ने बताया कि पिछले दस वर्षों में समाचार पत्रों में ऐसी 359 घटनाएं छपी हैं, पर कार्रवाई किसी मौलवी पर नहीं हुई। समाजिक संगठन साहिल की कार्यकारी निदेशक मुनीजा बानो ऐसे मामलों में पीड़ितों को इंसाफ दिलाने का काम करती हैं।
 
वह बताती हैं कि 2004 में एक पाकिस्तानी अधिकारी ने मदरसों में बच्चों के यौन उत्पीड़न की 500 से अधिक शिकायतों का खुलासा किया था। तब भी किसी मौलवी के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई थी। तत्तकालीन मजहबी मामलों के मंत्री सरदार मुहम्मद यूसुफ ने यह कहते हुए कार्रवाई से इनकार कर दिया था कि यह मौलवियों को बदनाम करने की साजिश है। अखबारों में छपने वाली ऐसी घटनाएं ज्यादातर फर्जी और बदले की भावना से छपवाई जाती हैं। उन्होंने मदरसों की कार्यशैली में सुधार और और नियंत्रण की बात मानी थी। लेकिन ऐसा कहने के पीछे सरदार मुहम्मद यूसुफ की मजबूरी समझी जा सकती है। क्योंकि जहां की सरकार कठमुल्ले और आतंकी चलाते हों वहां इन दुष्कर्मी मुल्ला—मौलवियों के खिलाफ बोलने और उनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत कैसे कोई दिखाएगा।
ऐसे संचालित होते हैं मदरसे

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पाकिस्तान में 22000 से अधिक पंजीकृत मदरसे हैं। यहां पढ़ने वाले बच्चे अक्सर गरीब परिवारों से होते हैं। ऐसे बच्चों के लिए यहां रहने के साथ भोजन और शिक्षा की मुफ्त सुविधा होती है। पूरे पाकिस्तान के गांवों में मदरसे छोटे-छोटे दो या तीन कमरों और आहातों में चलते हैं। यहां मजहबी शिक्षा पढ़ाने के अलावा किसी तरह की कोई दूसरी शिक्षा नहीं दी जाती। अधिकारियों की अनदेखी के कारण यहां जो चाहता है, मदरसा खड़ा कर लेता है। मदरसे धनी व्यापारियों, मजहबी, राजनीतिक संगठनों और अन्य देशों के आर्थिक मदद से चलते हैं। मदरसों में पूरी तरह से शिक्षा इस्लामी विचार के अनुकूल दी जाती है।
जामिया बिनोरिया मदरसा के प्रमुख मुफ्ती मोहम्मद नईम कहते हैं कि पाकिस्तान में दो से तीन हजार के करीब अपंजीकृत मदरसे हैं। उन मदरसों से ही गड़बड़ियों की अधिक शिकायतें आती हैं।

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पाकिस्तान के स्वतंत्र मानवाधिकार आयोग के रहमान कहते हैं कि मौजूदा स्थिति में मदरसों में बाल शोषण रोकना लगभग असंभव है। हाल के वर्षों में मदरसों के संचालकों की शक्तियां भी बढ़ी हैं। गांवों के चंदे से मदरसा चलाने वाले कई लोग आज सियासी और आर्थिक तौर पर मजबूत हो चुके हैं। मानवाधिकार वकील सैफउल मुल्क ने कहा कि आज हर कोई मुल्लाओं से डरता है