समाज के अच्छे रहने के लिए समाज में नैतिक व्यवस्था होनी आवश्यक है: बाबासाहेब

    दिनांक 14-मई-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 35:-

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डॉ. बाबासाहेब कहते हैं कि इस दुनिया में एक तरह की सुव्यवस्था है और तथागत का कथन है यह नैसर्गिक व्यवस्था ईश्वर नहीं संभालता, अपितु वह कम्म नियमों के अनुसार चलती है। सृष्टि की नैतिक व्यवस्था अच्छी हो या बुरी, भगवान बुद्ध के विचार में वह व्यक्ति को सौंपी गई है। अन्य किसी को नहीं। कम्म का अर्थ व्यक्ति जो कार्य करता है वह और विपाक का मतलब है उसका परिणाम। यदि नैतिक व्यवस्था बुरी होगी तो उसका कारण मनुष्य अकुशल कम्म कर रहा है। नैतिक व्यवस्था अच्छी हो तो इसका अर्थ केवल इतना ही है कि मनुष्य कुशल कम्म कर रहा है।’
अर्थात्, बाबासाहेब यह स्पष्ट शब्दों में बताते हैं कि समाज के अच्छे रहने के लिए समाज में नैतिक व्यवस्था होनी आवश्यक है। यह नैतिक व्यवस्था अच्छे या बुरे कर्मों से निर्मित होती है। कर्म का फल उस व्यक्ति को ही भुगतना पड़ता है ऐसा नहीं है; अपितु कभी-कभी पूरे समाज को उसके परिणाम भुगतने पड़ते हैं।
डॉ़ बाबासाहेब का हिंदू समाज में समानता का अधिकार पाने का संघर्ष निरंतर चला। इसलिए उन्होंने अलग-अलग तरीके अपनाए और आंदोलन भी चलाए। महाड का सत्याग्रह, कालाराम मंदिर सत्याग्रह, पर्वति सत्याग्रह, अंबामाता मंदिर सत्याग्रह एवं राजनीतिक क्षेत्र का पुणे करार इन सभी घटनाओं की पार्श्वभूमि में येवला में अस्पृश्य गुटों के सभी लोगों की जो परिषद हुई थी, उसमें उन्होंने ऐसी घोषणा की थी, ‘दुर्भाग्य से मैं अस्पृश्य जाति में जन्मा हूं, यह कोई मेरा अपराध नहीं है, फिर भी मैं हिंदू के रूप में नहीं मरूंगा।’ इस घोषणा के बारे में उनके चरित्रकार धनंजय कीर लिखते हैं, ‘आंबेडकर की इस घोषणा को दुनिया भर में जितनी प्रसिद्धि मिली उतनी किसी घोषणा को नहीं मिली थी।’
डॉ़ बाबासाहेब ने घोषणा तो कर दी थी मगर वे किस धर्म में जाने वाले हैं, यह नहीं बताया था। इस घोषणा से कांग्रेस एवं सनातनी हिंदुओं में प्रचंड दबाव बन गया था। डॉ़ बाबासाहेब को समाज में जिस परिवर्तन की अपेक्षा थी, उसके आने का उन्होंने संयम पूर्वक इंतजार भी किया था। इस अपेक्षा और प्रतीक्षा की पूर्ति के लिए जब सफल कदम बढ़ते नजर नहीं आए तब उन्होंने अपने ही कदम तथागत ‘बुद्ध’ की शरण में जाने के लिए बढ़ाए। जिस समस्या को डॉ़ बाबासाहेब ने जाना था, पहचाना था और पूरे हिंदू समाज को अवगत करने का भरसक प्रयास किया, उस समस्या को हल किए बिना इस दुनिया से विदा लेना उनको मंजूर न था। अपने अनुयायियों को वे किंकर्तव्यविमूढ स्थिति में छोड़ना नहीं चाहते थे। जिस यथार्थ को उन्होंने आरंभ किया था उसका गंतव्यस्थान उन्हें तय करना था। उन्हें यह गंतव्य तथागत भगवान बुद्ध के धम्म में नजर आया। अर्थात् इस गंतव्य को उन्होंने पहले भी परोक्ष रूप से बताया भी था। येवला के भाषण के अंत में उन्होंने भगवान बुद्ध का स्मरण किया था और कहा था, ‘मुझे इस अवसर पर भगवान बुद्ध का निर्वाण से पूर्व अपने भिक्षु संघ को किया उपदेश और जिसका महापरिनिर्वाण साथ में उल्लेख किया गया है उसका स्मरण होता है। निर्वाण के पूर्व भगवान गौतम बुद्ध ने अपने शिष्यों को उपदेश दिया कि, ‘आप दीप की तरह स्वयं प्रकाशित बनें; पृथ्वी की तरह पर प्रकाशित न हो! स्वयं पर विश्वास रखें, अन्य किसी के दास न बनें! सत्य पर चलें और किसी अन्य की शरण में न जाएं!’