प. बंगाल में हिन्दुओं के खिलाफ बढ़ता मजहबी उन्माद

Total Views |
पश्चिम बंगाल में पिछले पांच वर्षों की हिन्दू विरोधी हिंसा का स्तर जिस प्रकार बढ़ा है, वह सामान्य नहीं कहा जा सकता। हिंसक उपकरणों की भीषणता और भी चिंतित करने वाली है। वर्धमान, मालदा और मुर्शिदाबाद में बढ़ रही इस्लामिक कटृटरपंथियों की पैठ भी देश की सुरक्षा एजेंसियों को एक सुनियोजित षडयंत्र के प्रति सजग कर रही है।

b_1  H x W: 0 x
अगस्त, 1946 के मोहम्मद अली जिन्ना के स्वतंत्र इस्लामिक राज्य और भारत के धर्म के आधार पर विभाजन के लिए “डायरेक्ट एक्शन डे” की क्रूर इस्लामिक हिंसा को सम्पूर्ण बंगाल में आज तक कोई नहीं भूला है। मुस्लिम लीग की सुहरावर्दी की सरकार द्वारा जिस प्रकार से इन दंगों को प्रायोजित किया गया था, वह अमानवीय और अप्रत्याशित था। उस समय का सरकारी तंत्र इस षडयंत्र में पूरी तरह से लिप्त था। पर तब से लेकर आज तक बंगाल में कुछ ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है। ऐसा कोई भी दिन नहीं बीतता जब बंगाल से हिन्दू उत्पीड़न का समाचार कहीं से न आता हो। इस्लामिक हिन्दू विरोधी हिंसा पिछले कई वर्षों से ममता बनर्जी की पश्चिम बंगाल सरकार में अबाध रूप से जारी है। मुर्शिदाबाद, मालदा, दक्षिण और उत्तर 24 परगना, उत्तर दिनाजपुर, बीरभूम, हुगली और कूच बिहार राज्य के वे जिले हैं, जहां मुस्लिम जनसंख्या अब 25 से 70 % के बीच है। इसके चलते इन इलाकों में इस्लामिक हिंसा अपने चरम पर है। इसमें से अधिकतर जिलों की सीमा बांग्लादेश से सटी है। यही कारण है कि इन इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठियों की तादाद बहुत है। इन घुसपैठियों को पूरी तरह से राजनीतिक और मजहबी संरक्षण प्राप्त है। वोट बैंक के लालच में मौजूदा सरकार इन पर कार्रवाई करने के बजाय न केवल इन्हें संरक्षण देती है बल्कि इनका पूरा ख्याल रखती है। इसका असर यह है कि अधिकतर घुसपैठिए स्थानीय मुस्लिम समाज की सहायता से भारतीय नागरिक बन बैठे हैं। हाल के वर्षों में राज्य में बढ़ी मुस्लिम आबादी का एक कारण यह भी है।
दंगाई राज्य बनता बंगाल

b_1  H x W: 0 x 
आंकड़ों की मानें पश्चिम बंगाल में 2015 में 27 सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुईं, जिसमें पांच लोग मारे गए और 84 आहत हुये। 2016 में 32 घटनाए हुईं, 2017 में इन घटनाओं की संख्या बढ़कर 58 हो गयी, जिसमें 9 लोग मारे गए थे और 230 गंभीर रूप से आहत हुये। 2018 में आसनसोल में भीषण सांप्रदायिक हिंसा हुई। इन सांप्रदायिक हिंसा की सभी घटनाओं का आरंभ हिन्दू विरोध से हुआ। इस हिंसा के पीछे हिंदुओं की धार्मिक स्वतन्त्रता पर प्रतिघात करना था। रामनवमी और दुर्गा पूजा का इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा विरोध और सरकार का इन आयोजनों पर प्रतिबंध, हिंदुओं के विरुद्ध हिंसा को और बढ़ाता रहा। खुद राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा जय श्री राम के उद्घोष का विरोध न केवल उनकी मुस्लिम तुष्टीकरण नीति को दर्शाता है बल्कि कटृटरपंथियों के हौसलों को बुंलद करता है।

आखिर नियमों की अनदेखी क्यों ?

b_1  H x W: 0 x 
जब देश कोरोना के विरुद्ध युद्धरत है, सब कुछ बंद है, तब बंगाल में ममता सरकार मुसलमानों को खुलकर घूमने की आज़ादी दे रही हैं। कोरोना संक्रमित लोगों की बढ़ती संख्या से बेपरवाह ममता बंगाल में सामाजिक दूरी का पालन कराने की किंचित भी इच्छुक नहीं हैं। इन्ही परिस्थितियों से उपजी मुस्लिम अराजकता का विरोध हुगली के हिंदुओं को अपनी जान और माल के नुकसान से चुकाना पड़ा। हुगली के तेलनीपारा में भी हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच विवाद का आरंभ भी कोरोना के कारण हिंदुओं के मुसलमानों के उनके क्षेत्र में आने-जाने से रोकने के कारण हुआ। लेकिन राज्य का प्रशासन इसे रोकने के बजाए अराजकत तत्वों को शह देते दिख रहा है। पुलिस खुलकर मुस्लिम दंगाइयों का पक्ष लेती दिखाई दे रही है। अनेक निर्दोष हिंदुओं को प्रताड़ित किया जा रहा है। स्थानीय सांसद लॉकेट चटर्जी को पीड़ित क्षेत्र में जाने तक नहीं दिया जाता। आखिर यह सब क्या है? निश्चित रूप से राज्य की मुख्यमंत्री और स्थानीय प्रशासन को इसका उत्तर देना चाहिए।
हिंसा को नहीं किया जाना चाहिए अनदेखा
पश्चिम बंगाल में पिछले पांच वर्षों की हिन्दू विरोधी हिंसा का स्तर जिस प्रकार बढ़ा है, वह सामान्य नहीं कहा जा सकता। हिंसक उपकरणों की भीषणता और भी चिंतित करने वाली है। वर्धमान, मालदा और मुर्शिदाबाद में बढ़ रही इस्लामिक कटृटरपंथियों की पैठ भी देश की सुरक्षा एजेंसियों को एक सुनियोजित षडयंत्र के प्रति सजग कर रही है। राज्य की वर्तमान राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां सुरक्षा के कड़े कदम उठाने की मांग कर रही हैं।