न्यायपालिका की पारदर्शी हो तालिका

    दिनांक 14-मई-2020   
Total Views |
 
न्यायाधीशों के नियुक्ति में भाई-भतीजावाद के आरोपों के घेरे से बाहर आने के लिए न्यायपालिका को कड़े कदम उठाने होंगे। राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का केन्द्र्र सरकार का प्रस्ताव कई मायनों में समीचीन ही था


court _1  H x W
चायनीज कोरोना वायरस की महामारी के बीच न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति और चयन के मामले में भाई-भतीजावाद व्याप्त होने और इस प्रक्रिया में पारदर्शिता का अभाव होने के बारे में चर्चा थोड़ी विस्मित करने वाली प्रतीत हो सकती है। यह एक ऐसा विषय है जो तीन दशकों से भी अधिक समय से लगातार ध्यान खींच रहा है, परंतु अभी तक इसका कोई ठोस समाधान नहीं निकल पाया है।
 
भाई-भतीजावाद और परिवारवाद के आरोपों के बीच इस तथ्य से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि न्यायाधीशों के परिवार की दूसरी पीढ़ी ने न्यायपालिका का सदस्य बनने के बाद कुछ हद तक अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया है। परन्तु ऐसे भी कई उदाहरण हैं जब न्यायाधीशों के परिवार में दूसरी पीढ़ी के अनेक प्रतिभाशाली विधिवेत्ताओं ने अपरिहार्य कारणों से न्यायपालिका का सदस्य बनने में असमर्थता व्यक्त की है।
 
न्यायपालिका में न्यायाधीश पद के लिये नामों के चयन, नियुक्तियां और पदोन्नति की प्रक्रिया में भाई-भतीजावाद और परिवारवाद के आरोपों का समाधान खोजना बहुत ही चुनौतीपूर्ण काम है। नियुक्ति, तबादला और पदोन्नति के मामले में भाई—भतीजावाद और पारदर्शिता के अभाव जैसे आरोपों से छुटकारा पाने के लिये उच्च न्यायालय के स्तर पर चयन प्रक्रिया में बदलाव करने पर विचार करना अच्छा होगा। न्यायाधीश पद के लिये चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया में इस व्याधि के आरोपों से निजात पाने के लिये ऐसी व्यवस्था की जरूरत है, जिसमे न्यायपालिका और कार्यपालिका, दोनों की ही भागीदारी हो।
 
देश की आजादी के बाद जब न्यायाधीश पद के लिये नामों के चयन, नियुक्ति और पदोन्नति की कमान कार्यपालिका के हाथ में थी तो उस समय इन नियुक्तियों और तबादले के मामले में राजनीतिक हस्तक्षेप के आरोप लगते थे। इन्हीं आरोपों के बाद सारा मामला उच्चतम न्यायालय पहुंचा था। स्थिति की गंभीरता का अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि न्यायाधीशों की नियुक्तियों के मामले में भाई-भतीजावाद को लेकर पहले जहां लोग दबी जबान में बात करते थे, वहीं अब यह सार्वजनिक चर्चा का मुद्दा बन चुका है। यह आरोप लगते रहे हैं कि न्यायपालिका में परिवारवाद और जातिवाद का बोलबाला है।
 
उच्चतम न्यायालय के 1982 और फिर 1993 के फैसलों तथा अक्तूबर, 1998 में राष्ट्रपति को दी गयी सलाह के बाद न्यायाधीशों की नियुक्ति का मामला पूरी तरह से न्यायपालिका ने अपने हाथ में ले लिया। लेकिन वह भी भाई-भतीजावाद और पारदर्शिता के अभाव के आरोपों से खुद को बचा नहीं सकी। यही वजह थी कि विधि आयोग ने नवंबर, 2008 में अपनी 214वीं रिपोर्ट में न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में बदलाव की सिफारिश की थी।
 
न्यायपालिका में वैसे तो न्यायाधीश पद पर चयन और पदोन्नति के मामले में अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, अन्य पिछड़े वर्ग, अल्पसंख्यकों और महिलाओं के लिये आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। कार्यपालिका यही अपेक्षा करती है कि 'कोलेजियम' इन वर्गों को प्रतिनिधित्व देने पर विचार करेगी, लेकिन ऐसा लगता है हकीकत में इन वर्गो को समुचित प्रतिनिधित्व देने की मांग को नजरअंदाज किया जाता रहा है। केन्द्र सरकार ने इस तथ्य की ओर उच्चतम न्यायालय की ‘कोलेजियम’ का ध्यान भी आकर्षित किया था।
 
यही नहीं, उच्च न्यायालय से उच्चतम न्यायालय में पदोन्नति के मामले में न्यायाधीशों की वरिष्ठता को नजरअंदाज करके वरिष्ठता की सूची में निचले पायदान पर होने के बावजूद कुछ न्यायाधीशों की पदोन्नति पर भी सवाल उठते रहे हैं। कई बार उच्च न्यायालय के न्यायाधीश की वरिष्ठता को नजरअंदाज करके उनसे कनिष्ठ को पदोन्नति देने और कुछ समय बाद उच्च न्यायालय में वरिष्ठता रखने वाले न्यायाधीश को पदोन्नति देकर शीर्ष अदालत में न्यायाधीश बनाने के मामले भी सुर्खियों में आये। ऐसे मामलों के सुर्खियों में आने की वजह उच्च न्यायालय में कनिष्ठ न्यायाधीश का उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठ न्यायाधीश हो जाना था।
 
न्यायाधीश के पद पर नियुक्ति के लिये चयन और पदोन्नति की प्रक्रिया में भाई—भतीजावाद और पारदर्शिता के अभाव के आरोपों को ध्यान में रखते हुये ही नरेन्द्र मोदी सरकार ने 2015 में संविधान में संशोधन करके राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग कानून बनाया था। लेकिन उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ ने 16 अक्तूबर, 2015 को बहुमत के निर्णय से इसे असंवैधानिक करार देते हुये निरस्त कर दिया था।
 
संविधान पीठ के एक सदस्य न्यायमूर्ति जे. चेलामेश्वर ने अपने अल्पमत के फैसले में इस कानून को सही ठहराया था। उन्होंने ‘कोलेजियम’ प्रणाली और इसकी कार्यशैली पर सवाल उठाते हुये संकेत दिया था कि इसके अंतर्गत न्यायाधीशों के चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी तरह दोषरहित नहीं है।
 
न्यायमूर्ति चेलामेश्वर ने बाद में ‘कोलेजियम’ की बैठक में शामिल होने की बजाए तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर को एक पत्र लिखकर न्यायाधीशों के चयन की समूची प्रक्रिया में शामिल समिति की निष्पक्षता पर ही सवाल उठा दिये थे। उनका आरोप था कि 'कोलेजियम' व्यवस्था में बहुमत के सदस्य एकजुट होकर नामों का चयन करते हैं और इससे असहमति व्यक्त करने वाले न्यायाधीश की राय दर्ज नहीं की जाती है।
 
न्यायाधीशों के पद के लिये चयन और नियुक्ति की प्रक्रिया का जहां तक सवाल है तो उच्च न्यायालयों की 'कोलेजियम' निर्धारित प्रक्रिया का पालन करते हुये इन पदों के लिये पर्याप्त अनुभव रखने वाले अधिवक्ताओं के नामों की सिफारिश करती है। लेकिन यह सूची उच्चतम न्यायालय को भेजे जाने के साथ ही इनमें शामिल अनेक नामों को लेकर विवाद शुरू हो जाता है और इनके चयन में भाई-भतीजावाद तथा राजनीतिक प्रभाव जैसे आरोप लगने लगते हैं।
 
इस संबंध में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा 2016 और 2018 में वकीलों को न्यायाधीश बनाने की सूची उच्चतम न्यायालय की 'कोलेजियम' को भेजे जाने की घटनाओं का जिक्र करना शायद अनुचित नहीं होगा। तब एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश धनन्जय वाई. चन्द्रचूड़, जो इस समय उच्चतम न्यायालय में वरिष्ठ न्यायाधीश हैं और भविष्य में मुख्य न्यायाधीश भी बनेंगे, ने 30 वकीलों को न्यायाधीश नियुक्त करने की सिफारिश की थी, जिसमें न्यायाधीशों ओर नेताओं के रिश्तेदारों के नामों की भरमार थी। लेकिन तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति तीरथ सिंह ठाकुर ने इनमें से 11 वकीलों के नाम अस्वीकार कर दिये थे। इसके बाद, मार्च, 2018 में भी इसी तरह की घटना की पुनरावृत्ति अखबारों की सुर्खियां बनी थी।
 
इसके अलावा भी दूसरे उच्च न्यायालयों में भी न्यायाधीश पद के लिये चयनित चुनिन्दा वकीलों और पदोन्नति के लिये भेजे गये अन्य नामों को लेकर कई विवाद हुए हैं और कुछ मामलों में तो न्यायाधीशों को अपने पद से इस्तीफा भी देना पड़ा।
 
अगर न्यायाधीश पद के लिये नामों के चयन, न्यायाधीशों के तबादले और उनकी पदोन्नति की प्रक्रिया न्यायपालिका अपने पास रखना चाहती है तो भाई—भतीजावाद और परिवारवाद के आरोपों से बचने के लिये 1998 में राष्ट्रपति को दी गयी सलाह में प्रतिपादित नौ बिन्दुओं का पालन करना बेहतर होगा। यही समय की मांग है।
(लेखक वरिष्ठ न्यायिक मामलों के जानकार एवं वरिष्ठ पत्रकार हैं)