अमेरिका ने शुरू किया ऑपरेशन चीन

    दिनांक 16-मई-2020   
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आखिरकार अमेरिका ने चीन के खिलाफ कार्रवाई शुरू कर दी है। सीनेट ने चीन पर प्रतिबंध का रास्ता साफ कर दिया है तो ट्रंप ने चीन में किए गए अरबों डॉलर के पेंशन फंड के निवेश को वापस करने का फरमान सुना दिया है। कह सकते हैं कि अब अमेरिका और तीन की तनातनी निर्णायक दौर में प्रवेश कर चुकी है और आने वाले समय में यह कई तरह से सामने आएगी

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जिस तरह से चीन ने दुनिया भर में गैरजम्मेदाराना तरीके से वायरस को फैलने दिया और जिस तरह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप आए दिन चीन के खिलाफ सख्त बयान दे रहे थे, उसे देखते हुए जिस तरह के घटनाक्रम का अंदाजा लगाया जा रहा था, वे आखिरकार आकार लेने लगे। अमेरिका ने चीन में निवेश किए अरबों डॉलर के पेंशन फंड को निकालना शुरू कर दिया है। सीनेट में चीन पर प्रतिबंध का रास्ता साफ कर दिया गया है और इसरे अलावा अमेरिका ने चीन को सबक सिखाने की जो रणनीति तैयार की है, उनमें भारत को सबसे ज्यादा अहमियत देने की योजना है।
आज अमेरिका ने जो कदम उठाया है, ऐसा नहीं कि उसका अंदाजा चीन को नहीं था। उसे दुनिया के आक्रोश और अपने खिलाफ अमेरिका के नेतृत्व में आकारा लेते गठजोड़ का पूरा अंदाजा था और इसी कारण उसने हर वो कोशिश की जिससे ये कोशिशें सिरे न चढ़ पाएं। हाल-फिलहाल में ऐसी तमाम घटनाएं हुई हैं जो बताती हैं कि चीन ने उन तमाम देशों को प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष चेतावनी भरे संदेश दिए हैं कि वे चीन से उलझने की कोशिश न करें।
अरबों डॉलर निकाले
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के निर्देश पर 600 अरब डॉलर के अमेरिकी पेंशन फंड के चीनी की कंपनियों में किए गए भारी निवेश को वापस निकालने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। ऐसा माना जा रहा है कि अब तक अरबों डॉलर निकाले जा चुके हैं और चीनी कंपनियों में किए गए निवेश को निकालना का यह सिलसिला अभी जारी रहेगा। डोनाल्ड ट्रंप ने खुद इस बात की पुष्टि की है। फॉक्स न्यूज से बातचीत में उन्होंने कहा कि अरबों डॉलर का निवेश निकाला जा चुका है। अमेरिका इन विकल्पों पर भी गौर कर रहा है कि कैसे अमेरिका के शेयर बाजर में सूचीबद्ध चीनी कंपनियों के भी कान उमेठे जाएं। इसके साथ ही सीनेट ने मानवाधिकार के मामले में भी चीन पर नकेल कसने की तैयारी कर ली है। अपने यहां अल्पसंख्यकों के साथ बुरा व्यवहार के लिए कुख्यात चीन पर इस संदर्भ में प्रतिबंध भी लगाया जा सकता है।
अमेरिका की भारत पर नजर
चीन की मुश्कें कसने की अमेरिकी योजना में भारत का खास स्थान है। अमेरिकी सीनेट में चीन को सबक सिखाने की जो योजना रखी गई है, उसमें भारत, वियतनाम और ताईवान का खास स्थान है। सीनेट ने सिफारिश की है कि इन देशों को सैन्य समेत हर तरह की मदद देकर चीन पर दबाव बनाया जाए। सीनेटर थॉम टिलिस ने प्रस्ताव पेश करते हुए कहा कि चीन ने चीन ने जान-बूझकर कोविड-19 वायरस के बारे में दुनिया को गुमराह किया जिसके कारण तमाम अमेरिकियों को आज इसका खामियाजा भुगतना पड़ रहा है। यह कारस्तानी ऐसे चीन की है जो अपने नागरिकों को लेबर कैंपों में बंद कर देता है, अमेरिका की तकनीक और नौकरी चुरा लेता है और हमारे सहयोगी देशों की संप्रभुता को चुनौती देता है। अमेरिका ऐसा स्थितियों का बर्दाश्त नहीं कर सकता और उसने अब जो करना शुरू किया है, वह उसका संकेत लगातार देता रहा है। आने वाले समय में अमेरिका के नेतृत्व में इस तरह के और कदम देखने की उम्मीद की जा सकती है।
चीन की पैंतरेबाजी
चीन में सबसे बड़ी खुफिया एजेंसी है मिनिस्ट्री ऑफ स्टेट सिक्योरिटी और इससे जुड़ा थिंक टैंक है चाइना इंस्टीट्यूट ऑफ कंटेमपररी इंटरनेशनल रिलेशंस (सीआईसीआईआर)। इसका काम है विदेश और सुरक्षा नीति के मामले में सरकार को सलाह देना। सीआईसीआईआर ने पिछले माह सरकार को भेजी अपनी आंतरिक रिपोर्ट में कई बातों की ओर सरकार का ध्यान दिलाया है जिसमें मोटे तौर पर चार बातें हैं: 1. कोविड-19 के संक्रमण के बाद दुनिया भर में चीन के खिलाफ आक्रामकता बढ़ी है और हर कोने से उसके खिलाफ आवाज उठ रही है। 2.अमेरिका के साथ तनाव बढ़ता जा रहा है और अगर यह बदतर स्थिति में पहुंचा तो चीन को अमेरिका के साथ युद्ध के लिए तैयार हो जाना चाहिए। 3. चीन के खिलाफ अभी जिस तरह की प्रतिकूल वैश्विक भावनाएं हैं, वो 1989 के थ्येआनमन स्क्वायर गोलीगांड के बाद तीव्रतम हैं। 4. चीन की आर्थिक उन्नति को अमेरिका पश्चिमी लोकतंत्र के लिए खतरा मानता है और वह चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को कमजोर करने के लिए लोगों का उसपर भरोसा कम करने की कोशिशें कर रहा है। 5. चीन के खिलाफ जिस तरह तमाम देश आक्रामक होते जा रहे हैं, उसका नतीजा यह हो सकता है कि उसे बेल्ट एंड रोड परियोजना को लेकर संबद्ध देशों के विरोध का सामना करना पड़े और उस स्थिति में अमेरिका अपने क्षेत्रीय सहयोगियों को वित्तीय और सैनिक मदद के लिए आगे आ जाए और इसके कारण एशिया में सुरक्षा का माहौल खास तौर पर बिगड़ जाए।
यह खबर समाचार एजेंसी रायटर्स ने जारी की है। एजेंसी कहती है कि उसके पास इस रिपोर्ट के कागजात नहीं है लेकिन उसे विश्वस्त सूत्रों से यह जानकारी मिली। बाकी बातों को तो छोड़ दें, हाल में जिस तरह चीन ने संक्रमण से मरने वालों की संख्या के बारे में ही जो बताया, वे अपने आप में सवाल खड़े करते हैं। चीन कहता है कि कोविड-19 से मरने वाले लोगों की संख्या 3,342 है जबकि वुहान के सात शवदाह गृह दिन-रात काम करते रहे और लॉकडाउन में ढील के बाद अस्थि-कलश लेने के लिए लोगों को छह-छह घंटे तक लाइन में लगे रहना पड़ा। ऐसे ही एक शवदाह गृह के बाहर हजारों लोगों की भीड़ की तस्वीर ट्विटर पर आई। चीन में संक्रमित व्यक्ति के शव को जलाया जाता है। वहीं, बॉडी बैग बनाने वाली ताईवान की एक कंपनी ने कहा कि उसे दुनिया भर से बॉडी बैग बनाने का ऑर्डर मिल रहा है और सबसे बड़ा ऑर्डर दो लाख बॉडी बैग का चीन से मिला है। इसके पहले उस कंपनी को इतने बॉडी बैग का ऑर्डर तब मिला था जब दक्षिण चीन सागर में सुनामी आई थी। जाहिर है, चीन में संक्रमण से मरने वालों की संख्या जितनी बताई जा रही है, उससे कहीं ज्यादा है। कितनी है, अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। और तो और चीन में संक्रमण से कितने लोग मरे, इसका ठीक-ठीक पता लगाने के लिए अमेरिका समेत तमाम देशों की खुफिया एजेंसियों को जुटना पड़ रहा हो, वहां क्या सरकार की मर्जी के खिलाफ कोई संवेदनशील खुफिया रिपोर्ट लीक हो जाएगी ?
रिपोर्ट के लीक होने का मतलब
दुनिया भर में चीन के खिलाफ गुस्सा है जो तरह-तरह से बाहर आ रहा है। कोई वायरस के स्रोत को खोजने की जांच की मांग कर रहा है, कोई चीन से हर्जाना मांग रहा है तो कोई मांगने की तैयारी कर रहा है, कोई चीन की कंपनियों के अवसरवादी अधिग्रहण के नलके को बंद कर चुका है तो कोई इसके चोर दरवाजों को खोजने में जुटा है। इन सबके बीच चीन से इस खुफिया रिपोर्ट के लीक होने की वजह है। यह दरअसल संदेश है- दुनिया को, अमेरिका और उसके सहयोगियों को, दक्षिण चीन सागर के देशों को, बेल्ट एंड रोड परियोजना में पड़ने वाले देशों समेत अपने मित्रों को और अपने देश की जनता को भी।
चीन अगर आज विश्व शक्ति है तो उसका कारण उसकी सैनिक ताकत नहीं, बल्कि आर्थिक ताकत है। लेकिन पिछले दो-तीन दशकों के दौरान चीन ने खुद को एक बड़ी सैन्य ताकत के रूप में विकसित किया है। बेशक सैन्य क्षमता के मामले में अमेरिका उसपर भारी पड़ता है लेकिन चीन अब पहले जितना कमजोर भी नहीं रहा। इसलिए जब वह यह कहता है कि अमेरिका और चीन के बीच का तनाव बढ़कर सैन्य टकराव तक पहुंच सकता है तो उसका संदेश अमेरिका समेत दुनिया को होता है कि यह टकराव इन दोनों देशों ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए बहुत ही खतरनाक होगा और दुनिया को इसे टालने की कोशिश करनी चाहिए। जब वह यह कहता है कि यह युद्ध एशियाई समुद्र में लड़ा जाएगा और पूरे एशिया में सुरक्षा का भारी संकट पैदा हो जाएगा तो वह दक्षिण चीन सागर से लगते देशों से लेकर भारत तक को आगाह कर रहा होता है कि अमेरिका के झांसे में आकर नई मुसीबत न खड़ा करें। जब वह यह कहता है कि चीन को बेल्ट एंड रोड परियोजना से जुड़े देशों के विरोध का सामना करना पड़ सकता है और इन देशों को अमेरिका आर्थिक और सैन्य सहायता दे सकता है तो वह इन देशों को संदेश देता है कि अमेरिका उन्हें बरगलाने की कोशिश कर सकता है, इसलिए उन्हें सावधान रहना चाहिए और अपने भरोसेमंद साथी चीन के साथ खड़ा रहना चाहिए। जब वह कहता है कि अमेरिका ऐसी कोशिश कर रहा है कि लोगों का भरोसा कम्युनिस्ट पार्टी पर से उठ जाए और ऐसा करके वह कम्युनिस्ट पार्टी को कमजोर करने का कुचक्र रच रहा है तो वह अपने देश के लोगों से मुखातिब है। वह अपने लोगों को समझा रहा है कि कम्युनिस्ट पार्टी को कमजोर न होने दें। वैसे भी, एक
अनुमान के मुताबिक चीन में मार्च के शुरू तक ही वायरस के कारण 50 लाख लोगों की नौकरी चली गई थी और ऐसे लोगों की संख्या में इजाफा ही हुआ होगा। जाहिर है, इससे लोगों में गुस्सा होगा और अगर इसे फूटने का कोई रास्ता मिल गया तो बड़ी दिक्कत हो सकती है। पिछले एक दशक के दौरान हुए तमाम प्रदर्शनों का अनुभव बताता है कि अगर किसी कम्युनिस्ट देश में जनता का गुस्सा घनीभूत हो गया तो सत्ता बदलते देर नहीं लगती। और चीन को इसी बात से डर लगता है। शायद यही वजह है कि थ्येआनमन स्कावयर का नरसंहार होता है। इसलिए चीन की खुफिया रिपोर्ट का लीक होना चीन की नीति का ही एक हिस्सा है जो लक्षित उद्देश्य को पाने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाने से पीछे नहीं हटता।
चरित्र प्रमाणपत्र मांगता फिर रहा ड्रैगन
चीन वो सब कुछ कर रहा है जिससे उसके खिलाफ एकजुट होती दुनिया का नजरिया उसके प्रति बदल जाए। हाल के समय में चीन ने इस काम के लिए मेडिकल कूटनीति का सहारा लिया। वह तमाम देशों को पीपीई ,मेडिकल उपकरण और दवाएं दे रहा है और हाल में ऐसे कई मामले सामने आए जब चीन के घूम-घूमकर लोगों से चरित्र प्रमाणपत्र पाने की कोशिशों को पता चला। जर्मनी की सरकार ने शिकायत की है कि चीन के राजनयिक जर्मंनी के सरकारी अधिकारियों और निजी कंपनियों के प्रमुखों से इस आशय का पत्र देने का अनुरोध कर रहे हैं कि चीन ने कोविड-19 से लड़ने में उनकी मदद की। यही काम पोलैंड में हुआ। वारसा में अमेरिका राजदूत जॉर्जेट मॉसबैकर ने हाल ही में इस बात का खुलासा किया है कि पोलैंड के राष्ट्रपति ऐंद्रेज डुडा पर चीन की ओर से दबाव डाला गया कि वह चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग को फोन करके उनके देश को संक्रमण से लड़ने में दी गई मदद के लिए धन्यवाद कहें। लेकिन पोलैंड इसके लिए तैयार नहीं हुआ।
दक्षिण चीन सागर में तनातनी
दक्षिण चीन सागर में इन दिनों तनाव का माहौल है। चीन ने वहां लाइव युद्धाभ्यास किया। चीन ने इस युद्धाभ्यास में विमानवाहक पोत और लड़ाकू हवाई जहाजों ने भाग लिया। इसके अलावा चीन ने पनडुब्बी रोधी की गश्त भी लगा रहा है। गौरतलब है कि हाल ही में चीन ने हाल ही में वियतनाम की मछली पकड़ने वाली नौका को टक्कर मारकर डुबो दिया था और इंडोनेशिया के समुद्री क्षेत्र में घुसकर मछुआरों को धमकाया था। चीन की इन्हीं गतिविधियों को देखते हुए अमेरिका ने इस इलाके में अपने जंगी पोत को भेजकर यह संदेश देने की कोशिश की कि दक्षिण चीन सागर में इस तरह कब्जे की चीन की कोशिश पर वह चुप नहीं बैठेगा। दक्षिण चीन सागर के लेकर भी चीन का नजरिया एकाधिकारवादी रहा है और उसने वहां कई कृत्रिम टापू बनाकर उनपर कब्जा कर रखा है। एक ओर तो चीन वायरस फैलाकर दुनिया को तबाह किए हुए था और दूसरी ओर उसने दक्षिण चीन सागर के क्षेत्र को धीरे-धीरे अपने कब्जे में लेने का कुचक्र भी जारी रखा।