‘जिसे अब आप अपना सबकुछ मानते हैं वहकितने रूपों में चलकर आपके पास पहुंचा है!’

    दिनांक 18-मई-2020
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(ताबिश सिद्दिकी की फेसबुक वॉल से)
अरब के लोग दैवीय सहायता के लिए पत्थर को पूजते थे। सांप को वे जिन्न कहते थे जो उनके लिए अल्लाह का ही एक रूप होता था। अरबों के लिए ‘अल-इलाह’ कोई भी हो सकता था। किसी के लिए देवी उज्जा सब कुछ थीं तो किसी के लिए देवता हुबल। किसी के लिए वे इलाह होते थे तो किसी के लिए अल-इलाह।

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ऊल्लाह अरबों के लिए सबसे बड़ा देवता था। अल यानी बड़ा और इलाह मतलब देवता। मतलब सबसे बड़ा देवता। अरब के लोग अपने सबसे बड़े देवता को ‘अल-इलाह’ यानी ‘अल्लाह’ कहते थे। यह शब्द इतिहास या किसी पुरानी मजहबी किताब या कहीं और प्रयुक्त नहीं हुआ है। न ईसाइयों की बाइबिल में और न यहूदियों के तौरेत में। जाहिर है यह अरबों का अपना शब्द था, उनके देवता के लिए।
 
सबसे बड़े देवता के बाद भी अरबों के अपने निजी देवता होते थे। कुल देवता होते थे। अरब के लोग ठीक उसी तरह से पत्थरों की पूजा करते थे, जैसे आज भारत के लोग करते हैं। कहीं भी सफर में दूर जाने पर अरबों को जब किसी दैवीय सहायता की जरूरत होती थी तो वे अच्छे-अच्छे गोल पत्थर चुनकर उसे एक घेरे में लगाते थे तथा पानी व ऊंट के दूध से उसकी पूजा करते थे, बिल्कुल हिंदुस्थानियों की तरह। ऐसे पत्थरों को वे इलाह या अल-इलाह बुलाते थे।
 
अरब के लोग सांपों को भी इलाह यानी देवता के रूप में मानते थे। वे सांपों को जिन्न कहते थे जो उनके हिसाब से उनके इलाह का ही एक रूप होता था। जिन्न अरबों की अपनी निजी खोज थी। इसीलिए इनका जिक्र किसी दूसरे मजहब की किताब में नहीं मिलता है। रेत के बड़े-बड़े तूफान को अरब के लोग जिन्न बोलते थे और उससे बचने के लिए सांपों की पूजा करते थे। अरबों के लिए ‘अल-इलाह’ कोई भी हो सकता था। जैसे यहां किसी के लिए शिव सबकुछ हैं तो किसी के लिए कृष्ण, वहां भी ऐसा ही था। किसी के लिए देवी उज्जा सबकुछ थीं तो किसी के लिए देवता हुबल। किसी के लिए वे इलाह होते थे तो किसी के लिए अल-इलाह।
 
एक छोटी-सी घटना का जिक्र करना चाहूंगा। मुहम्मद साहब के बचपन की बात है। काबा की हालत बहुत खस्ता हो गई थी और अरब के लोग उसकी मरम्मत कराना चाहते थे, मगर उसमें एक सांप रहता था। वह रोज काबा से निकलकर धूप सेंकने के लिए दीवार से सटकर पड़ा रहता था। अरब उसी के सामने सब चढ़ावा चढ़ाते थे। अरब यह सोचते थे कि इलाह का यह रूप काबा की हिफाजत कर रहा है, इसलिए हम काबा की अभी कोई मरम्मत नहीं कर सकते। फिर एक दिन एक बाज उड़ता हुआ आया और उस सांप को चोंच में दबा कर उड़ गया।
 
अरबों ने इसे इलाह की तरफ से इशारा समझा और यह माना कि अब उनको काबा की मरम्मत करने की इजाजत मिल गई है। उनके हिसाब से उनके अल-इलाह ने अपने ही एक रूप (जिन्न को) बाज द्वारा उठवा कर यह संदेश दिया कि अब तुम लोग मरम्मत करो। इसके बाद काबा की मरम्मत हुई। इस प्रकरण के बाद काबा से सांप वाले इलाह जिन्न का एपिसोड खत्म हो गया। इन सारी आस्थाओं और अरबों की अपनी समझ के रास्ते से तय हुई एक ‘घटना’ ने आपको अपने वर्तमान ‘खुदा’ का रूप और नाम दिया। मुझे यह सिर्फ इसलिए लिखना पड़ रहा है कि आप समझ पाएं कि जिसे अब आप अपना सबकुछ मानते हैं वह कितने रूपों में चलकर आपके पास पहुंचा है।
 
किस तरह से चांद, सूरज, पत्थर से लेकर सांप की यात्रा करते हुए वह निराकार बन गया। इसलिए बस थोड़ी सी समझ और इतिहास पढ़ाई की जरूरत होती है ताकि सारा खेल समझ सकें। जिस दिन आप यह समझ गए, आपके सामने ही सारी नफरतें ताश के पत्ते की तरह ढेर हो जाएंगी। ल्ल