आफत की काट आत्मनिर्भरता

    दिनांक 18-मई-2020   
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संवाद की शैली क्या होगी, यह इस पर निर्भर करती है कि यह किनके बीच हो रही है। ताली-थाली पीटना, बत्ती बुझाना, दीया और मोमबत्ती जलाना, यह भी संवाद का तरीका था-एक संवेदनशील नेतृत्व वाली सरोकारी सरकार और उस पर अटूट भरोसा करने वाले समाज के बीच। कोरोना से दो-दो हाथ करते हुए आज जो पूरा देश कदमताल कर रहा है, उसका भरोसा उसी संवाद ने दिया था। जिन्हें संवाद की यह भाषा समझ में नहीं आई, उन्हें तो पहले भी नहीं आती थी। अच्छी बात यह है कि इस संकट काल में जिनके बीच संवाद होना चाहिए था, हुआ और पुरजोर तरीके से हुआ और यही सहबद्धता भारतीयता के सहज-स्वाभाविक और सांस्कृतिक मूल्यों पर आधारित स्वर्णिम कल की आशा जगा रही है।
यह उसी संवाद की शक्ति थी कि प्रधानमंत्री कदम-दर-कदम ‘लॉकडाउन’ की राह पर आगे बढ़ने और हर चुनौती से निपटने के संकल्प को अभिव्यक्त करने के साथ यह स्थापित कर सके कि यह देश त्रासदी से लड़ने के लिए पूरी तरह से एकजुट और संकल्पित है। उन्होंने राष्ट्र को संबोधित करते हुए इस बार जिस 20,00000 करोड़ रुपए के आर्थिक ‘पैकेज’ की घोषणा की और जिसका विस्तृत ब्योरा वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले कुछ दिनों में दिया है, वह कई मामलों में अभूतपूर्व है। ‘पैकेज’ की मांग उठ रही थी, परंतु भारत अपने सकल घरेलू उत्पाद के मुकाबले इतनी बड़ी राशि जारी करेगा, यह किसी ने सोचा नहीं था। कहा जा रहा था कि रिजर्व बैंक की ओर से इससे पूर्व में जो राहत दी गई है, वह अपर्याप्त है, परंतु अब ये सवाल बेमानी हो गए हैं, क्योंकि कोरोना से मुकाबले की राशि के दोनों हिस्सों को जोड़ दें तो इससे मिलने वाली राहत आंकड़ों के किसी भी पहाड़ से ज्यादा बड़ी हो जाती है।
भारतीय समाज की संवेदनशीलता और सरकार की सक्रियता ने इस बात को लगातार रेखांकित किया है कि दुनिया इस आपदा से जूझ रही है, परंतु भारत इस आपदा को अवसर में बदलने के लिए प्रतिबद्ध है। बड़ी बात यह कि सरकार केवल किसी ‘पैकेज’ की बात नहीं कर रही, एक बड़े नीतिगत बदलाव का रास्ता भी कोरोना काल की सीख से होकर निकलता दिख रहा है और यह रास्ता है- आत्मनिर्भरता का, स्वदेशी का। समाज के बिखरे तारों को जोड़ने का। इस देश के मजदूर, किसान, उद्यमियों और सूक्ष्म तथा मध्यम उद्योगों को मजबूत करने का।
स्वदेशी के आह्वान तथा वृहद् ‘पैकेज’ के अतिरिक्त भी आर्थिक, सामाजिक मोर्चे पर नीतिगत बदलावों से जुड़े दो बिंदु बहुत महत्वपूर्ण हैं। पहला, सरकार ने लघु और मध्यम उद्योगों की परिभाषा को वास्तविक फैलाव दिया है। इससे 45,00000 से भी ज्यादा इकाइयों वाला भारतीय उद्योग जगत का इंजन अपनी असली रफ्तार पकड़ सकेगा। पूर्व की परिभाषा में अति सीमित निवेश और आकार रखने की बाध्यता के चलते बढ़ने की क्षमता और संभावना होने पर भी यह ‘छुक-छुक’ गति से ही चलने को अभिशप्त था।
सरकार का दूसरा महत्वपूर्ण कदम है कर्ज देने में भय, झिझक तथा एहसान जताने वाले भाव को खत्म करना। बिना गारंटी 3,00000 करोड़ रुपए का कर्ज इस क्षेत्र को दिया जाने वाला है और खास बात यह है कि एक साल तक मूलधन भी नहीं चुकाना होगा। यह पहल सच्ची उद्यमिता का वास्तविक पुरस्कार है।
ये दोनों कदम भारतीय अर्थतंत्र को नई दिशा देने का वैसा ही काम करेंगे जैसा 1991 में खुले बाजार की नीति अमल में आने के बाद हुआ था।
यह न मानने का कोई कारण नहीं कि पिछले छह वर्ष में भारत में सरकार के कामकाज का तरीका आमूलचूल तौर पर बदला है और इसके चलते ही हम आज इस त्रासदी से देश को मुकाबला करते पा रहे हैं। कल्पना कीजिए कि देश उसी ढर्रे पर चल रहा होता, घपले-घोटालों की वही कहानियां आ रही होतीं और ऊपर का पैसा नीचे तक नहीं जाने का वही रोना आज भी रोया जा रहा होता, तो आज स्थिति क्या होती। सोचिए,
-यदि किसी ने ‘डिजिटल’ भारत का सपना ही न देखा होता!
-गरीबों को भी बैंक खातों की जरूरत होती है, यह महसूस करते हुए जनधन खाते ही न खुले होते!
-सस्ते मोबाइल और सस्ते ‘डाटा’ की क्रांति का रास्ता इस तरह न खुला होता और इस सबसे आधार कार्ड को न जोड़ा गया होता तो आज इस आफत का आलम क्या होता?
गरीबों का पैसा कब किसकी जेब में चला जाता, यह कहने की जरूरत नहीं, क्योंकि 70 साल से बाढ़ और आपदा किनके पेट भरती रही है और गरीब किस हालत में रहे हैं, यह पूरे देश ने देखा है। यानी देश अब पारदर्शिता के उस दौर में है, जहां उसकी जनता, उसका समाज राजनीति से छले जाने और दलीय व्यवस्था के दलदल को कोसने की विवशता से आगे निकल आया है। समाज और ‘राज’ राष्ट्रभाव से प्रेरित है और यह जुड़ाव नया प्रवाह-प्रभाव जगाता दिख रहा है।
कुछ लोगों को इस बात में अतिशयोक्ति लग सकती है कि क्या पिछले छह वर्ष में ही देश में सब कुछ हुआ है? ऐसे तर्कों में आंशिक तथ्य हो सकते हैं, परंतु पूरी सचाई यही है कि गरीबों को वोटों के लिहाज से देखने की नजर तो भारतीय राजनीति के पास थी, परंतु उनके दर्द से भीग जाने वाली आंखें भारतीय राजनीति ने अब पाई हैं। हाशिए पर पड़ी भारत की बिसराई हुई ताकत को एकजुट कर आधारभूत ढांचे से उसे कैसे जोड़ा जा सकता है और कैसे इस वर्ग की पीड़ा हरी जा सकती है, इसकी पहल दिखने लगी है। देश की उद्यमिता के जागरण का आह्वान, नवोन्मेष की अलख, युवाओं को उत्साह का मंत्र देना, यह सब जिस गति और स्पष्टता से पिछले कुछ वर्षों में हुआ है, वह अपने आप में मिसाल है।
मास्क, पीपीई किट जैसी चीज भारत में पिछले 70 साल में नहीं बनती थी, किंतु 2 माह के भीतर भारत अपनी कमजोरियों को दूर करता और स्वदेशी नवाचार से, परंपरागत विचार से इस आपदा का मुकाबला करता दिखता है तो उसका एक बड़ा कारण यह भी है कि भाजपा सरकार और समाज में परस्पर विश्वास की संकल्पित लयबद्धता है। कौन हाथ आश्वासन का स्वांग लिए बढ़ा और कौन हाथ घाव पर मरहम लगा रहा, इसे देखने-समझने की दृष्टि समाज में बड़ी तेज होती है और यही कारण है कि समाज पूरी एकजुटता के साथ सरकार के साथ खड़ा है। वृहद्, विस्तृत और वर्गीकृत आर्थिक ‘पैकेज’ से अर्थव्यवस्था के अलग-अलग कोनों में भरोसे और उत्साह का वातावरण बना है। इसके साथ ही स्वदेशी के सूत्र में गुंथा आत्मनिर्भरता का मंत्र भारत को उसके मूल की ओर ले जाते हुए सबल करेगा और पूरी दुनिया को संबल देगा।
@Hiteshshankar