हिंदू धर्म का तत्वज्ञान समानता की दृष्टि से श्रेष्ठतम है: बाबासाहेब

    दिनांक 18-मई-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 36:-

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डॉ. बाबासाहेब समाजपुरुष थे। उनका जीवनध्येय व्यक्तिनिष्ठ नहीं बल्कि समाजनिष्ठ था। अस्पृश्यता निर्मूलन का कार्य अगर मुझसे नहीं भी होगा तो भी उसे सारे विश्व के सामने लाने का कार्य मुझे करना होगा। अस्पृश्यता की समस्या हिमालय जैसी है तो भी मैं उससे टकराकर अपना सिर लहूलुहान कर लूंगा ताकि मेरा रक्तलांच्छित सिर देखकर मेरे सात करोड़ अस्पृश्य बंधु इस हिमालय को धराशायी करने हेतु एक पैर पर तैयार हो जाएंगे, ऐसा उनका विश्वास था। आरंभ से ही उन्होंने स्वयं को समूहमन से जोड़ लिया था। अस्पृश्यता यह हिंदू समाज का एक अंग है ऐसा माना गया था, इस लिए बाबासाहेब को धार्मिक लड़ाई लड़नी थी। महाड सत्याग्रह के समय अस्पृश्यता की रूढ़ि की डॉ़. बाबासाहेब ने विस्तारपूर्वक चिकित्सा की थी। महाड के तालाब पर हुए सत्याग्रह को उन्होंने ‘महाड का धर्मसंगर’ यह संज्ञा दी थी। यह केवल पानी पीने का अधिकार स्थापित करने की ही लड़ाई नहीं थी बल्कि अस्पृश्य हिंदू स्पृश्य हिंदुओं के समान ही योग्यता के अधिकारी हैं, यह डॉ़ बाबासाहेब निर्धारित करना चाहते थे। वे मानते थे कि हिंदू धर्म का तत्वज्ञान समानता की दृष्टि से श्रेष्ठतम है, मगर वह आचरण के स्तर पर बिल्कुल नहीं दिखाई दे रहा था। तत्व और व्यवहार का मेल बैठाना चाहिए, ऐसा उनका मत था। धर्म के दार्शनिक तत्व सामाजिक आचरण में कैसे प्रतिबिंबित हो सकते हैं और उनके अनुसार कैसे व्यवहार हो सकता है, इसीलिए डॉ. बाबासाहेब ने महाड का धर्मसंगर किया था। भारतीय संत परंपरा का एक अधूरा कार्य पूरा करने का प्रयास ही डॉ़ बाबासाहेब ने इस माध्यम से किया था। वे तो कहते ही थे कि, ‘जब जब धर्म के आचार उस धर्म के विचारों के विरोध में दिखाई देते हैं तब- तब धार्मिक आचारों में बदलाव कर उसे धार्मिक विचारों से सुसंगत कर लेना अत्यंत आवश्यक होता है।’