कांग्रेस को न तो अपना घोषणा पत्र याद है और न ही योजना आयोग का वो 'शपथ पत्र'

    दिनांक 18-मई-2020   
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कोरोना काल में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज पर सवाल उठाने वाले कांग्रेसियों को यह याद नहीं रह गया कि मात्र वर्ष भर पहले अपने घोषणा पत्र में कांग्रेस पार्टी ने हर गरीब को 72 हजार रूपये प्रति वर्ष देने का वायदा किया था. राहुल गांधी ने इस योजना को गरीबी पर सर्जिकल स्ट्राइक बताया था. मगर ये नहीं बताया था कि इतनी भारी धनराशि की व्यवस्था कहां से होगी ? इस कोरोना के संकट में श्रमिकों को दी जा रही आर्थिक सहायता को पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम ने अपर्याप्त बताया है. वर्ष 2011 का सितम्बर माह उन्हें याद तो जरूर होगा तब वह मंत्री थे. उस समय योजना आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में शपथ पत्र दाखिल करके कहा था कि मेट्रो सिटी में रहने वाला अगर 33 रूपये और ग्रामीण 26 रूपये प्रतिदिन खर्च करता है तो उसे गरीब नहीं माना जाएगा. गरीबी की ऐसी परिभाषा गढ़ने पर उस समय भी चहुंओर आलोचना हुई थी.
कांग्रेसियों की समस्या ही यही है कि विरोध करते समय कब क्या कहा था ? ये इन लोगों को याद नहीं रहता है. कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला, कोरोना काल में 20 लाख करोड़ के आर्थिक पैकेज पर सवाल उठा रहे हैं मगर इन कांग्रेस के नेताओं को अपनी ही पार्टी का घोषणा पत्र याद नहीं है. जिस घोषणा पत्र को बमुश्किल एक वर्ष ही बीता है. कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनाव में जारी किए गए घोषणा पत्र में कई वायदे किये थे. उसमे नौवां वायदा ‘न्याय योजना’ का था. ‘न्याय योजना’ जिसे राहुल गांधी “गरीबी पर सर्जिकल स्ट्राइक” बताते घूम रहे थे. उस योजना में कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि उनकी सरकार अगर केंद्र में बनती है तो गरीबों के खाते में 72 हजार रूपया वार्षिक, जमा कराया जाएगा. उसमें साफ़ लिखा गया था कि “ यह सच है कि तीव्र और व्यापक आधार वाला विकास, गरीबी को कम करेगा और मध्यम या दीर्घावधि में गरीबी को खत्म कर देगा. दूसरी तरफ निर्णायक और लक्ष्य केन्द्रित हस्तक्षेप, एक दशक के भीतर गरीबी को पूरी तरह समाप्त कर सकता है, इसलिए कांग्रेस 2030 तक गरीबी उन्मूलन का लक्ष्य निर्धारित कर रही है. कांग्रेस का मानना है कि भारत की जी.डी.पी. का आकार और कुल व्यय (राज्य और केन्द्र सरकार को मिलाकर) हमें इजाजत देता है कि हम देश के सबसे गरीब लोगों को, राजकोषीय लक्ष्यों से विचलित हुए बिना, नकद हस्तांतरण की महत्वाकांक्षी योजना चला सकते हैं.” उस समय पी. चिदम्बरम से यह पूछा गया था कि " इतनी बड़ी धनराशि का इंतजाम कहां से होगा ? तब उन्होंने कहा था कि सरकार बन जाने पर रूपयों का इंतजाम भी हो जाएगा.
इस कोरोना काल में उत्तर प्रदेश सरकार की अगर बात करें तो रिकार्ड स्तर पर राशन का वितरण किया जा चुका है. अभी भी राशन वितरण किया जा रहा है. एक – एक हजार रूपये की क़िस्त दो बार सीधे श्रमिकों के खाते में भेजी जा चुकी है. इसके अतिरिक्त भी कई प्रकार की सहायता प्रदेश सकरार द्वारा की जा रही है, बावजूद इसके पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदम्बरम को यह लगता है कि यह सहायता नाकाफी है तो यह उल्लेखनीय होगा कि जब यूपीए-2 की सरकार थी तब योजना आयोग (अब नीति आयोग) ने सुप्रीम कोर्ट में एक मुक़दमे की सुनवाई के दौरान शपथ पत्र दाखिल किया था. वर्ष 2011 में दाखिल उस शपथ पत्र में योजना आयोग ने उल्लेख किया था कि मेट्रो सिटी (दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरू या चेन्नई ) में अगर चार लोगों का परिवार एक महीने में 3,860 रुपये से ज्यादा खर्च कर रहा है तो उसे गरीब नहीं माना जाएगा. इस हिसाब से चार सदस्यों के परिवार में एक आदमी अगर 33 रुपये प्रतिदिन खर्च कर रहा था तो उसे गरीब मानने से इनकार कर दिया गया था. गरीबों के लिए संचालित होने वाली उन सभी सरकारी सुविधाओं से ऐसे परिवार को वंचित किया गया था.