‘हिम्मत वतन की हम से है...’

    दिनांक 19-मई-2020   
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हमारे देश में कोरोना के बढ़ते आंकड़ों के बीच भी आम नागरिकों को इस संकट में संभाले रखने का काम कर रहे हैं हमारे सुरक्षाकर्मी, डाक्टर, अस्पतालों के अन्य कर्मी, आवश्यक चीजों की दुकान चलाने वाले, सैनिक, शिक्षक, पुलिसकर्मी। योद्धा ही तो हैं ये तो देश को सुरक्षित रखने के लिए खतरों के बीच अपने कर्तव्य पर डटे हैं
 
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लॉकडाउन के दौरान मरम्मत, रखरखाव और नवीनीकरण के वर्षों से लंबित काम निपटाने के
हर दरवाजे तक पहुंचकर कोरोना संक्रमितों की मदद कर रहे हैं कोरोना योद्धा (फाइल चित्र)
 
भारत में इन पंक्तियों को लिखे जाते वक्त 74 हजार से ज्यादा पहुंच चुकी है चायनीज वायरस कोरोना से पीड़ितों की संख्या। और हर 24 घंटे के आंकड़े संख्या में एक बड़ा इजाफा दिखा रहरे हैं। दुनिया के अन्य देशों, विशेषकर अमेरिका और यूरोपीय देशों की बात करें तो वहां के आंकड़े और भी परेशान करने वाले दिखते हैं जबकि वहां नागरिक सुविधाएं और अन्य सहूलियतें भारत के मुकाबले कहीं ज्यादा और कहीं आधुनिक हैं। वहां अस्पताल ज्यादा हैं, चिकित्सा की अन्य सुविधाएं ज्यादा हैं, उपकरण ज्यादा हैं और प्रति व्यक्ति डाक्टर ज्यादा हैं। लेकिन भारत में यह महामारी अभी भी नियंत्रण में है। इसके पीछे भारत में रहन-सहन और यहां की संस्कृति का बहुत बड़ा हाथ है। हमारे यहां शाकाहार पर ज्यादा जोर है, प्रकृति को पूजने का चलन है, जरूरत के हिसाब से भोगने की प्रवृत्ति है। और सबसे बढ़कर, संकट में सबके साथ खड़े होने और अपनी—अपनी जिम्मेदारी निभाने का जज्बा है।
 
भारत में संकट के इस काल में जिस तरह से लॉकडाउन के बावजूद डाक्टर, नर्स, अस्पताल के अन्य कर्मी, सफाईकर्मी, पुलिस, होमगार्ड, सेना के तीनों अंग, अर्द्धसैनिक बल सेवाभाव के साथ अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं वह असाधारण है। इन्हें ‘कोरोना वारियर्स’ यानी कोरोना योद्धा कहा जा रहा है तो वह स्वाभाविक ही है। यहां हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इन सबके भी परिवार हैं, महामारी की चपेट में आने का खतरा इन पर भी बना रहता है, आराम ये भी कर सकते हैं घरों पर, लेकिन भारत को इस संकट से उबारने के लिए सब कुछ भुलाकर ये मोर्चे पर डटे हैं। और आम नागरिक भी तकरीबन हर स्थान पर इन योद्धाओं के अभिनंदन में पीछे नहीं रह रहे हैं।
 
3 मई 2020 को भारतीय वायुसेना ने इन कोरोना योद्धाओं पर आसमान से फूल बरसाए, इन्हें कृतज्ञ देश की ओर से सलाम किया। लेकिन क्या इतना भर काफी है? यह सवाल तब और खड़ा होता है जब इंदौर, दिल्ली, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, जम्मू—कश्मीर, प. बंगाल, महाराष्ट्, राजस्थान, बिहार जैसे राज्यों से जमाती तत्वों द्वारा इन योद्धाओं पर हमले करने के समाचार आते हैं। अपनी जान पर खेलकर हमारी जान बचाने की खातिर जी—जान से जुटे इन योद्धाओं पर हमले करने वाले बेशक, इंसान के भेस में पशु ही हो सकते हैं। पर संतोष है कि ऐसे दृश्य ज्यादा देखने में आ रहे हैं जिनमें लंबी ड्यूटी निभाकर अपने घर लौटी नर्स का फूलों से स्वागत हो रहा है, पीपीई किट और मास्क की घुटन सहते हुए भी कोई डाक्टर हमें सावधानी बरतने की सलाह दे रही है, पुलिसकर्मी को लोग अपने घर से खाना लाकर दे रहे हैं, सैनिकों को फूल भेंट कर रहे हैं आदि। चलिए, मिलते हैं ऐसे ही कुछ कोरोना योद्धाओं से और उन विशेषज्ञों से जो इन महकमों को नजदीक से जानते हैं, उनमें काम कर चुके हैं।
 
संयम और सेवा का अनूठा मेल
देशभर में पुलिस के जवानों का एक नया ही रूप सामने आया है इन दिनों। पुलिस के जवान लाठियां ही नहीं भांजते दिख रहे, बल्कि भूखे राहगीरों को भोजन, पानी भी देते नजर आ रहे हैं। कोई बुजुर्ग है तो उसके लिए बाजार से दवा वगैरह लाकर दे रहे हैं। असामाजिक तत्वों के साथ भी कमोबेश संयम से पेश आ रहे हैं, उन्हें लॉकडाउन का अर्थ समझा रहे हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक रहे विक्रम सिंह कहते हैं, ‘पुलिस विभाग को आपदा प्रबंधन का थोड़ा प्रशिक्षण तो दिया जाता है, परंतु ऐसी महामारी से निपटने का कोई उल्लेखनीय प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। इसके बावजूद जिस प्रकार पुलिसकर्मी संकल्प, अनुशासन के साथ जनता की सेवा में जुटे हैं वह अद्भुत है। कई जगह पुलिसकर्मियों पर हमलों के बारे में उनका कहना है, ‘पूरा देश जहां इस समस्या से निपटने के लिए कृतसंकल्पित है वहीं कुछ शरारती तत्व हमारे कोरोना योद्धाओं पर आक्रमण कर रहे हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है। सरकार ने अब कोरोना योद्धाओं पर हमले के विरुद्ध कड़े दंड का प्रावधान करके अच्छा काम किया है। महिला पुलिसकर्मियों तक के उपर आक्रमण हुए हैं। तब्लीगी जमात वालों ने अस्पतालों में शर्मनाक प्रदर्शन किया, पर तब भी पुलिस ने संयम बनाए रखा। एक जगह तो थानाध्यक्ष ने वांछित दूरी बनाए रखकर एक विवाह की रस्म पूरी करवायी और कन्यादान भी स्वयं किया।’ वे कहते हैं, ‘अपने पूरे सेवाकाल में इस प्रकार की चुनौती मैंने कभी नहीं देखी। पुलिसकर्मियों का ऐसा कठोर परिश्रम, अनुशासन, सेवाभाव और समर्पण अद्भुत है। इससे पुलिस की वर्दी के लिए जो सम्मान था वह कई गुना बढ़ गया है।’
 
सेना का संबल
हमारे तीनों सेना के जवानों ने भी इस दौरान देश के लिए सब कुछ न्योछावर किया हुआ है। एक तरफ हमारे जवान कश्मीर में घुसपैठियों और आतंकियों से लोहा ले रहे हैं, शहादत दे रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ देश में कोरोना काल की आपात स्थितियों को संभालने में भी जुटे हुए हैं। विंग कमांडर (से.नि.) अरुणेन्द्र नाथ वर्मा कहते हैं, ‘भारतीय वायुसेना के जेट लड़ाकू विमानों से लेकर विशालकाय परिवहन विमानों तक ने लेह से तिरुअनंतपुरम तक देश के कोने—कोने में उड़ानें भरकर आकाश के पटल पर जैसे अपनी वीरगाथा लिखी है। नौसेना के पोतों ने सागर के वक्ष पर अपना दृढ़ संकल्प साकार करके दिखाया है। ऐसे कठिन काल में भी शरारती दुश्मन के दांत खट्टे करने में हमारे थलसैनिकों की बहादुरी के कहने ही क्या हैं। घर—परिवार की चिंताओं को देश की चिंता के आगे गौण मानकर हमारे सैनिक रात—दिन अपने कर्तव्यक्षेत्र में डटे रहकर जिस संकल्प और साहस का परिचय दे रहे हैं, वह वंदनीय है।’ वे कहते हैं, ‘सशस्त्र सेनाओं द्वारा कोरोना योद्धाओं के प्रति आभार प्रदर्शन उनके योगदान की अद्भुत मिसाल है।’
 
कष्ट सहकर भी कर्तव्य निभाया
इसी तरह दिन—रात जुटे हैं हमारे डाक्टर और अस्पतालों के अन्य कर्मी। कई दिन तक लगातार कोरोना मरीजों की तीमारदारी में जुटे रहना कोई आसान बात नहीं है, खासकर भारी-भरकम पीपीई किट और हर वक्त मुंह पर कसा हुआ मास्क लगाए जिसमें सांस भी खुलकर नहीं ली जा सकती। भारतीय चिकित्सक संघ से संबद्ध डॉ. शील वर्मा गाजियाबाद के जिला अस्पताल में कोरोना के संदिग्ध मरीजों की पड़ताल करते हैं और उनकी बीमारी की गंभीरता को देखते हुए तय अस्पताल में उनके इलाज की व्यवस्था करते हैं। इस काम की चुनौती के बारे में उनका कहना है, ‘यह ऐसी संकटपूर्ण स्थिति है जिसमें शत्रु अदृश्य है और आपके अत्यंत निकट है। जरा सावधानी हटी कि दुर्घटना घटी। आयु, वर्ण, जाति, पंथ, देश...इस सबसे बेखबर रहते हुए यह वायरस कभी भी किसी को भी संक्रमित करने की क्षमता रखता है। कोरोना वायरस की इंफेक्टिविटी/पॅथोगेनिसिटी यानी संक्रमित करने की क्षमता अब तक पाए गए अन्य तमाम वायरस से बहुत ज्यादा है। संक्रमित करने के बाद यह तेजी से शरीर में फैलता है, जिससे रोगी की जान को खतरा हो जाता है।'
 
लेकिन हमारे देश में विशाल आबादी की वजह से प्रति व्यक्ति डाक्टरों की कमी है। इस पर डॉ. वर्मा का कहना है कि इस महामारी ने स्वास्थ्य क्षेत्र की इस समस्या को और बढ़ा दिया है। किन्तु हमें अपने डॉक्टरों तथा अन्य चिकित्साकर्मियों पर गर्व है कि इस संकट की घड़ी में, अपनी जान की परवाह किए बगैर अपने कर्तव्य में लगे कर देश की जनता की सेवा कर रहे हैं। वे असामान्य स्थितियों में रोगियों की सेवा कर रहे हैं। कैप, मास्क, दस्ताने, चेहरे का आवरण, पीपीई वस्त्र पहनकर कार्य करना अत्यंत कठिन और कष्टदायक होता है। कहीं—कहीं पर इनका अभाव भी देखने में आया है। कई बार तो डॉक्टरों तथा स्टाफ को भोजन करने का अवसर भी नहीं मिल पाता है। लंबी ड्यूटी में ठीक से सोना और आराम करना तो भूल ही जाइए।’ अभी तक इस रोग का कोई इलाज नहीं है इससे समस्या और नाजुक बनी हुई है। डॉ. शील यह बात स्वीकारते हैं, 'इस वैश्विक महामारी का कोई टीका, औषधि अथवा चिकित्सा फिलहाल उपलब्ध नहीं है। मरीज का इलाज लक्षण देखकर ही किया जाता है। वेंटिलेटर पर रखने में अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है। कह सकते हैं कि रोगियों का उपचार करने की कोशिश किसी भीषण युद्ध से कम नहीं होती। हम यह युद्ध लड़ पा रहे हैं तो हमारे समर्पित डॉक्टरों, सहायक स्टाफ के साथ ही अस्पतालों में कार्यरत सफाई कर्मचारियों, आपूर्तिकर्ताओं, कैंटीन स्टाफ आदि की बदौलत।
 
डाक्टरों का सम्मान बढ़ाता है मनोबल
मुम्बई के ग्रांट मेडिकल कॉलेज में रेजीडेंट डाक्टर डॉ. गौरी भारद्वाज भी कुछ इसी तरह का अनुभव साझा करती हैं। वे भी अपनी टीम के साथ सुबह से देर शाम तक कोरोना मरीजों की शुरुआती जांच करके उनमें संक्रमण की गंभीरता का पता लगाती हैं। उनके अस्पताल के ज्यादातर वार्ड कोरोना के इलाज या आइसोलेशन वार्ड में तब्दील कर दिए गए हैं। डॉ. गौरी बताती हैं, ‘काम बहुत ज्यादा है, लेकिन उसे संभालने वाले डाक्टर और सहायक स्टाफ कम है। सरकार का लॉकडाउन बढ़ाने का फैसला बहुत सही रहा है। भरोसेमंद जांच किट की कमी होने की वजह से यही तरीका है जिससे मृत्युदर को काबू में रखा जा सकता है। अग्रिम मोर्चे पर काम कर रहे हम जैसों के लिए पर्याप्त सुरक्षात्मक उपकरणों और वेंटिलेटर की तादाद भी कम है।’ वे उन लोगों के व्यवहार से आहत हैं जो कोरोना से लड़ रहे डाक्टरों, नर्सों के साथ रिहायशी इलाकों में गलत तरीके से पेश आ रहे हैं। लेकिन वे कुछ स्वयंसेवी संगठनों का धन्यवाद देना चाहती हैं जिन्होंने डाक्टरों के लिए पीपीई किट और भोजन का इंतजाम संभाला हुआ है। वे मानती हैं कि केन्द्र्र सरकार के समय रहते लॉकडाउन करने के फैसला से काफी राहत मिली है, नहीं तो मरीजों की तादाद काबू से बाहर हो सकती थी। पर इस स्थिति से कुछ लोगों में अवसाद की भावना पैदा हो सकती है जो हालात को और गंभीर बना सकती है, खासकर उनमें जिनके रोजगार छिन गए हैं। भारत में महामारी ‘कम्युनिटी स्प्रैड’ के चरण में है जिसमें, डॉ. गौरी के अनुसार, लोगों को जागरूक करना और संसाधनों का सही निस्तारण बेहद जरूरी है। वे कहती हैं, ‘देशवासियों को एकजुट होकर इस महामारी से लड़ रहे डाक्टरों के साथ खड़े होकर उनका मनोबल बढ़ाए रखना होगा।’
 
स्वच्छता सर्वोपरि
 
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सफाईकर्मी ब्रह्मपाल और साथ में श्यामाबाद भारतीय रेल सेवा के लिए तैयार है।
 
हम सब जब अपने घरों में बंद हैं तब गलियों और सड़कों को बुहारकर साफ—सफाई रखने वाले भी कोरोना योद्धा ही हैं। हमने बात की, सफाईकर्मी ब्रह्मपाल और श्यामा से। नगर निगम, गाजियाबाद से संबद्ध ये दोनों सफाईकर्मी कोरोना योद्धा रोजाना अपने घरों से 20—30 किमी. दूर आकर कम संसाधनों के बावजूद पूरी निष्ठा से ड्यूटी को अंजाम दे रहे हैं। भीषण गर्मी में भी रिक्शे में कूड़ा इकट्ठा करके दूर डालने जाते हैं। ब्रह्मपाल के दो लड़के हैं जो कॉलेज में पढ़ रहे हैं, तो श्यामा के पांच बच्चे भी स्कूल जाते हैं। क्या उन्हें रोग का भय सताता है, यह पूछने पर श्यामा बताती हैं, ‘भय किसे नहीं सताता, पर ड्यूटी है तो काम करना ही है। अपनी तरफ से सावधानी बरतते हैं हम।’ ब्रह्मपाल बताते हैं,'आजकल कूड़ा इकट्ठा करने वाली गाड़ी नहीं आ रही है इसलिए रिक्शा लेकर ही हम पूरी कालोनी का कूड़ा जमाकर करके फेंकने जाते हैं। नगर निगम की जैकेट पहने दोनों एक से दूसरी गली को साफ करते हुए दोपहर 12 बजे तक ही ड्यूटी दे पाते हैं जिसके बाद उन्हें सड़क पर रहने की इजाजत नहीं है।
 
सांसत में जान, पर काम को अंजाम
इसी तरह दिल्ली नगर निगम के स्कूलों और सर्वोदय विद्यालयों में पढ़ाने वाले शिक्षक भी कोरोना योद्धा से कम नहीं हैं। केजरीवाल सरकार बिना किसी पर्याप्त सुरक्षा साधनों के उनसे ‘रेड जोन’ के भयंकर संक्रमित इलाकों में और पका हुआ भोजन दो पालियों में बंटवा रही है। एक पाली में कम से कम 250-300 आदमी, औरतें और बच्चे राशन लेने आते हैं लेकिन कहने के बावजूद कुछ हाथों को न धोकर सबके लिए खतरा पैदा करते हैं। सिविल लाइंस इलाके में राशन बांटने गईं एक 45 साल की शिक्षिका श्रीमती बैकाली गत 18 अप्रैल को संक्रमित होकर अपनी जान गंवा चुकी हैं। उनके पति श्री रिपन भी कोरोना से संक्रमित होकर उनसे पहले सिधार गए थे। अब कालेज जाने वाले उनके दोनों बेटों को देखने वाला कोई नहीं है। इसी तरह वजीराबाद गांव के निगम विद्यालय के शिक्षक श्री हेमंत कोरोना संक्रमित पाए गए हैं। उनका इलाज जारी है।
 
पूर्वी दिल्ली के एक सर्वोदय विद्यालय के शिक्षक नाम न छापने की शर्त पर बताते हैं कि उन्हें सेवा से कोई परहेज नहीं है लेकिन राज्य सरकार को कम से कम हम शिक्षकों की सुरक्षा का ध्यान रखते हुए हमें आवश्यक दस्ताने, मास्क आदि उपलब्ध कराने ही चाहिए थे। उनका कहना है कि रेड जोन में रहने वाले नागरिकों को जब घरों से बाहर निकलने तक पर पाबंदी है तो ऐसे में केजरीवाल सरकार का शिक्षकों को बिना पूरी सुरक्षा किट के उन तक भेजने का फैसला समझ से परे है। शिक्षक समुदाय में इसे लेकर तीव्र आक्रोश है। इतना ही नहीं उन शिक्षक महोदय ने बताया कि शाम 5 से 7 बजे तक भोजन बांटने के बाद उन्हें बूथ स्तर अधिकारी के तौर पर तय मोहल्ले में घर-घर जाकर परिवार की सेहत के आंकड़े इकट्ठे करने होते हैं, एक फार्म भरना होता है। देर रात घर पहुंचकर देह में ताकत नहीं बचती। राज्य सरकार शिक्षकों से पढ़ने-पढ़ाने के अलावा हर तरह के अभियानों में जरूरत से ज्यादा काम लेती है। यह कहां तक सही है?
 
कुल मिलाकर, जीवट वाले हैं हमारे ये कोरोना योद्धा। जुटे हैं ताकि हम सब निरोगी रहें, कोरोना हमारा नुकसान न करे। इन पर फूल बरसाए गए, पूरे देश ने मोदी सरकार के आह्वान पर इनके लिए ताली, शंख बजाए। लड़ाई लंबी है। इन सब योद्धाओं का समाज पर जो उपकार है उसकी भरपाई असंभव है। लेकिन समाज इनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखे, इतनी अपेक्षा जरूर है।