‘देश में स्वदेशी मॉडल सफलतापूर्वक काम कर रहा है’

    दिनांक 19-मई-2020
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पाञ्चजन्य ब्यूरो
पाञ्चजन्य और आर्गनाजर साप्ताहिक पत्रिकाओं ने गत 11 मई को ‘भारतीय अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण: अवसर और चुनौतियां’ विषय पर एक वेबिनार आयोजित किया। इसमें ‘तुगलक’के संपादक सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री तथा आर्थिक-राजनीतिक विषयों के लेखक एस. गुरुमूर्ति ने विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि वर्तमान आर्थिक दृष्टिकोण स्वदेशी मॉडल के अनुरूप नहीं है, इसे बदलना होगा

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वेब सेमिनार के दौरान विचार रखते वक्ता एस. गुरुमूर्ति। कार्यक्रम की शुरूआत आॅर्गनाइजर के संपादक प्रफुल्ल केतकर (ऊपर) ने और सवाल-जवाब सत्र का संचालन पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर (नीचे) ने किया। 
 
पाञ्चजन्य और आॅर्गनाइजर साप्ताहिक पत्रिकाओं की ओर से 11 मई, 2020 को शाम 5 बजे विभिन्न राष्ट्रीय मीडिया पोर्टल के सहयोग से एक वेब सेमिनार आयोजित किया गया। ‘भारतीय अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण: अवसर और चुनौतियां’ विषय पर आयोजित इस सेमिनार में तुगलक के संपादक, अर्थशास्त्री तथा आर्थिक व राजनीतिक विषयों के लेखक श्री एस. गुरुमूर्ति ने अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर बात की। आॅर्गनाजर के संपादक श्री प्रफुल्ल केतकर ने कहा कि कोई भी समाज या कार्यक्षेत्र चीन से उभरी वैश्विक महामारी कोविड-19 के हानिकारक असर से अछूता नहीं है। इस महामारी ने कई लोगों की जिंदगी छीन ली, लेकिन उस दुख को झेलते हुए हमें अर्थव्यवस्था के पुनरुद्धार, आजीविका और जीवन को वापस पटरी पर लाने की चुनौती का सामना करना है। लॉकडाउन ने जहां दुनियाभर के उद्यमों और श्रमिकों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है, वहीं कोविड-19 महामारी न केवल सार्वजनिक स्वास्थ्य पर लगातार घात लगाए बैठी है, बल्कि अर्थव्यवस्था और श्रम बाजारों को भयंकर नुकसान पहुंचा रही है। सभी के मन में भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने खड़ी चुनौतियों को लेकर चिंता है कि इसे जल्द संभाल लिया जाएगा या संघर्ष लंबा चलेगा। किन क्षेत्रों में ज्यादा नुकसान की संभावना है? ऐसे कई सवाल सब के मन को मथ रहे हैं, क्योंकि हम देख चुके हैं कि वैश्विक पूंजीवाद और साम्यवाद, दोनों के मॉडल टिकाऊ रोजगार का विकल्प देने में नाकाम रहे हैं। कोविड-19 संकट के दौरान यह उलझन और दुष्कर हो गई है। चीन वैश्विक विनिर्माण केंद्र के तौर पर अपनी विश्वसनीयता खोने लगा है। ऐसे में भारत के सामने इसका लाभ उठाकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने का सुनहरा अवसर है। इसे लेकर कुछ महत्वपूर्ण सवाल हैं। क्या भारत बदलते वैश्विक समीकरणों और परिस्थितियों का लाभ उठाने की स्थिति में है? आने वाले समय में भारत और दुनिया के लिए कौन-सा रास्ता सही होगा?
 
अपने विचार करते हुए श्री गुरुमूर्ति ने कहा कि भारत को किसी बाहरी मानक पर गढ़े गए मॉडल के साथ सामन्जस्य स्थापित करने की बजाय अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप आर्थिक मॉडल तैयार करना चाहिए। कोविड-19 जैसी स्थितियां दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल देती हैं। इस संकट में तीन बातें उभर कर आई हैं-
 
  1. ‘सबके लिए एक-ही-आकार’ का वैश्विक मॉडल अब पुराना पड़ गया है।
  2. औपनिवेशिक, वाणिज्यिक व्यवस्था, मार्क्सवाद, वैश्वीकरण जैसे ढांचे भी ध्वस्त हो रहे हैं। लेकिन कुछ ऐसी आचार पद्धतियां हैं जो शाश्वत हैं, हमें उन्हें पहचानना है और संजोना है।
  3. वैश्वीकरण कभी भी स्थायी रहने वाला विचार नहीं था, बल्कि यह शुरू से ही अव्यावहारिक था। अर्थशास्त्रियों ने इसका स्वरूप बुना और दुनिया को इसी पटरी पर चलाया। इसी वैश्वीकरण मॉडल से जन्मा विश्व व्यापार संगठन आज मरणासन्न है। विवाद निपटान प्रणाली का अस्तित्व समाप्त हो चुका है।
 
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला मॉडल, जिसके जरिए चीन जैसे तानाशाह ने मनमानी लूट मचाई, अब अंतिम सांसें ले रही है। तानाशाही में लोकतंत्र को समझने की क्षमता नहीं। वैश्विक सौदे दो लोकतंत्रों के बीच हो सकते हैं, किसी तानाशाह के साथ नहीं, क्योंकि इसमें पारस्परिक लाभ का संदेश जरूरी है। उपरोक्त तीन बातों को एक साथ रखकर आकलन करें तो महामारी के पहले की विश्व व्यवस्था के मुकाबले कोविड-19 के बाद एक नया वैश्विक-राजनीतिक-आर्थिक ढांचा उभरता दिख रहा है। पहले इस तथाकथित ‘वैश्विक’ ढांचे का हिस्सा बनने के लिए किसी भी देश को अपनी संस्कृति, दर्शन, जीवनशैली का त्याग करना पड़ता था। इसमें उनका प्रवेश तभी संभव था। जी-20 देशों ने घोषणा की है कि ‘सबके लिए एक जैसा’ ढांचा कारगर नहीं है। प्रत्येक देश को अपनी संस्कृति के अनुरूप मॉडल की आवश्यकता होती है। इसलिए हमें स्थानीय स्तर पर समाधान चाहिए।
 
2010 में संयुक्त राष्ट्र ने स्वयं महसूस किया कि ‘सबके लिए एक जैसा ढांचा’ कारगर नहीं होगा। नीति आयोग ने सबसे पहले कहा था कि ‘सबके लिए एक जैसा ढांचा’ उपयुक्त नहीं है। हमारे पास ऐसा मॉडल हो जो हमारे काम का हो। सैद्धांतिक रूप से नीति आयोग द्वारा खारिज करने के बाद भी आर्थिक संस्थान और नौकरशाह उसी पुराने पश्चिमी मॉडल के साथ काम कर हैं, जिससे भारत लंबे समय से बहुत नुकसान उठा रहा है। उदाहरण के लिए, आज भी भारत अपनी मुद्र्रा नहीं छाप सकता। साधारणतया डॉलर की आवक के अनुसार ही भारत में मुद्रा की छपाई होती है। अर्थशास्त्र के प्रकांड विद्वान भी 1930 की आर्थिक मंदी का कभी हल नहीं निकाल सके, इसलिए हमें उनसे सावधान रहना चाहिए।
 
 
 
जब लोग पूछते हैं कि क्या स्वदेशी मॉडल एक विकल्प है, तो मैं कहता हूं कि यह तो पहले से ही काम कर रहा है और पूरे भारत में विभिन्न समुदायों तथा परिवारों द्वारा प्रयोग किया जा रहा है। यह कारोबार को सुचारू रूप से चलाने में बेहद उपयोगी साबित हो रहा है।
 
शहरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संबंधों को और भी स्पष्टता के साथ परिभाषित करना होगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को शहरी अर्थव्यवस्था से अलग रखना होगा। शहरी अर्थव्यवस्था में पर्यावरण, कानून एवं व्यवस्था संबंधी खर्चे बहुत ज्यादा होते हैं, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त नहीं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था स्वतंत्र हो और खुद विकसित हो।
 
 
 
 
स्वदेशी मॉडल कितना जरूरी?
 
 
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देश में स्वदेश मॉडल का प्रयोग विभिन्न समुदायों तथा परिवारों द्वारा सफलतापूर्वक किया जा रहा है।
 
शेयर बाजार में सूचीबद्ध कंपनियां जीडीपी का करीब 5 प्रतिशत ही योगदान देती हैं, जबकि छोटी कंपनियां और मध्यम, लघु और अति लघु क्षेत्र के उद्योग सकल घरेलू उत्पाद का 50-60 प्रतिशत योगदान देते हैं। लेकिन ऐसी कई कंपनियों को गलत मानदंडों के कारण ऋण के लिए अपात्र घोषित कर दिया गया है। भारत उपयुक्त विवेकपूर्ण मानदंडों का पालन नहीं कर रहा। बैंकों को उन कंपनियों को पैसा देने की अनुमति नहीं है, जिन्हें धन की जरूरत है। नतीजा 5-6 महीने के बाद उनकी वित्तीय व्यवस्था चरमराने लगती है।
 
हमारा देश परंपरागत रूप से परिवार संस्थात्मक है। निस्संदेह बड़े कारोबार और उच्च वर्गीय जीवनशैली को झटका लगेगा, लेकिन भारतीय समाज उस संकट को संभालने में सक्षम है। विमुद्रीकरण के दौरान हमें इसका प्रमाण मिल चुका है। हमारा देश पश्चिमी देशों के विपरीत विश्वास पर टिका समाज है। जब लोग पूछते हैं कि क्या स्वदेशी मॉडल एक विकल्प है, तो मैं कहता हूं कि यह तो पहले से ही काम कर रहा है और पूरे भारत में विभिन्न समुदायों तथा परिवारों द्वारा प्रयोग किया जा रहा है। यह कारोबार को सुचारू रूप से चलाने में बेहद उपयोगी साबित हो रहा है।
 
 
हमें इसका पुनरीक्षण करने की जरूरत है। सामाजिक समायोजन, पारिवारिक सहयोग के कारण हम महामारी रूपी इस तूफान का सामना करने में सफल रहे हैं, लेकिन हमारा आर्थिक नजरिया स्वदेशी मॉडल के विकास के मार्ग में बाधक है। इसे बदलना होगा, क्योंकि दुनिया खुद सुरक्षात्मक मॉडल अपनाने की ओर बढ़ रही है।
 
कोविड-19 के आघात ने हमें अहसास दिलाया है कि हम अब तक जो कुछ कर रहे थे, अब उससे अलग कुछ ठोस करने की जरूरत है। राष्ट्र किसी और पर निर्भर रहने के बजाय अपना कोष खुद तैयार करने के लिए कमर कस कर तैयार है। भारत की एक संयमी और संतोषी संस्कृति रही है जो संयमित उपभोग, संतोषी जीवनशैली में विश्वास करती है। स्वदेशी मॉडल से लघु और मध्यम उद्योग प्रगति करेंगे। इससे भारत की आर्थिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त होगा।