भारत पर टिकी दुनिया की उम्मीद

    दिनांक 19-मई-2020
Total Views |
प्रो. हर्ष वी. पंत
 
कोरोना वायरस से उबरने के बाद विश्व में भू-राजनीतिक समीकरण बदलने तय हैं। दुनिया को वायरस के संकट में डालने वाले चालाक चीन से विश्व के राजनेताओं का भरोसा उठता जा रहा है। अमेरिका ने अपनी साख खोयी है और यूरोपीय देशों में असमंजस की स्थिति है। ऐसे में भारत विश्व को नेतृत्व देने में सक्षम दिख रहा है

a_1  H x W: 0 x
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प (फाइल चित्र)
चायनीज कोरोना वायरस महामारी से जूझते हुए दुनिया हर दिन एक के बाद एक बुरे पड़ावों से गुजर रही है। ऐसे में चीन की प्रतिक्रिया ज्यादातर बहसों और विमर्श के केंद्र में है। शुरुआती सप्ताहों में इस संकट से निपटने में चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की अपारदर्शिता, समस्या की ओर ध्यान आकृष्ट करने वाले 'व्हीसिलब्लोअर' के साथ कठोरतापूर्ण व्यवहार, सूचनाओं का राजनयिक लाभ के साधनों की तरह इस्तेमाल और फिर संकट से उबरने पर खुद को इस महामारी के कारण संकट में फंसे देशों के 'रक्षक' के रूप में पेश करने की उसकी कोशिश ने एक तीखी वैश्विक बहस को जन्म दिया है।
 
किंतु ये विमर्श ऐसे समय पर भी चल रहा है जब अमेरिका और उसके राजनीतिक नेतृत्व ने खुद को वायरस के प्रसार से पैदा हुए अपने घरेलू संकट और इसके वैश्विक प्रभाव को संभालने में पर्याप्त अक्षम साबित कर लिया है। अतीत के हर वैश्विक संकट के समय मदद की आखिरी उम्मीद माना जाता रहा यह देश द्वितीय विश्व युद्ध के बाद विश्व के सामने आए इस सबसे गंभीर संकट के समय अपेक्षानुरूप आचरण नहीं कर सका। इस संकट से बाहर निकलते हुए अमेरिका की विश्वसनीयता क्षीण हो चुकी है, भले ही इस गंभीर स्थिति से जुड़ी बाहरी अपेक्षाएं संभालने की उसकी क्षमता कम न हुई हो।
 
हफ्तों तक राष्टÑपति ट्रम्प ने इस महामारी के प्रति अपेक्षित रूप से गंभीर रवैया नहीं अपनाया। वास्तव में लम्बे समय तक वह अमेरिका में मौतों के शुरुआती आंकड़ों पर यह कहते रहे कि यह संख्या 'फ्लू से मरने वालों या सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों से भी कम' है। देश को लॉकडाउन की जरूरत नहीं है, यह समझाने के क्रम में ट्रम्प तर्क दे रहे थे कि 'हर साल हमारे हजारों लोगों की मौत फ्लू से हो जाती है।'
 
अमेरिकी कांग्रेस ने महामारी से तहस—नहस हुई अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने के लिए दो ट्रिलियन डॉलर का कोरोना वायरस राहत विधेयक पारित किया है, जो देश के इतिहास में सबसे बड़ा प्रोत्साहन पैकेज है। इस दुर्लभ दोतरफा नीति के चलते एक और विधेयक आधारभूत संरचनाओं में निवेश और अतिरिक्त स्वास्थ्य रक्षा लाभों के बारे में आ सकता है, लेकिन इसमें राजनीतिक तनाव साफ दिखाई दे रहे हैं।
 

a_1  H x W: 0 x 
फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल मैक्रॉ के साथ प्रधानमंत्री मोदी (फाइल चित्र) 
 
यह देखते हुए कि यह चुनावी वर्ष है और ट्रम्प तथा डेमोक्रेट, दोनों का काफी कुछ दांव पर है, पक्षपाती राजनीति की अंतर्धाराएं ही इस संकट पर अमेरिकी राजनीतिक तंत्र की प्रतिक्रिया को आकार देंगी। हालिया मत सर्वेक्षणों में यह बात प्रतिबिम्बित होती है, जिनके मुताबिक 94 प्रतिशत रिपब्लिकन ने इस संकट से निपटने में ट्रम्प के तौर—तरीकों का समर्थन किया, जबकि 27 प्रतिशत डेमोक्रेट ने भी इन्हें ठीक माना। ट्रम्प के प्रति जनसमर्थन 49 प्रतिशत है जो अत्यंत ध्रुवीकृत घरेलू राजनीतिक भूदृश्य में उनके मानकों के हिसाब से काफी ऊंचा है।
 
परंतु, शेष विश्व के लिए अमेरिका के वैश्विक नेतृत्व के सवाल प्रतिदिन गंभीर होते जा रहे हैं। चीन अपनी सारी गलतियों के बावजूद खुद को ऐसे वैश्विक नेतृत्व का आदर्श दिखा रहा है जो दुनिया के एक बड़े हिस्से को बेहद लुभा सकता है, खासतौर पर तब जब वैश्विक रसूख पर अमेरिका का दावा प्रत्यक्षत: हर दिन पहले से ज्यादा संदेहास्पद होता जा रहा हो। जर्मनी और फ्रांस को जा रही चिकित्सीय आपूर्तियों को मूल खरीदार से ज्यादा कीमतों पर खरीदकर उन्हें अमेरिका ले जाने और अमेरिकी कम्पनियों को अस्पतालों में प्रयोग होने वाले एन-95 मास्क का निर्यात कनाडा और लातीनी अमेरिका को न करने देकर ट्रम्प निकट सहयोगियों के साथ तनाव पैदा करने में जुटे हैं। अमेरिकी नीति-निर्माताओं के लिए यह चिंता का कारण होना चाहिए कि बहुत कम ही देश महामारी के खिलाफ वैश्विक जवाबी कार्रवाई का प्रबंधन और नेतृत्व करने के लिए अमेरिका का आह्वान कर रहे हैं। वैश्विक व्यवस्था के साथ अमेरिका के संबंध चौराहे पर हैं और सभी के लिए इसके बड़े परिणामी प्रभावों के बावजूद शेष विश्व इस स्थिति के साथ तालमेल बिठाना शुरू कर चुका है।
 
हालांकि, अमेरिका-चीन संबंधों की गतिशीलता का सर्वाधिक प्रभाव यूरोप पर पड़ा है। पर कोरोना वायरस ने यूरोप को जितना अस्त-व्यस्त कर दिया है उतना द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से किसी भी संकट ने नहीं किया था। इसे महाद्वीप और यूरोपीय संघ के लिए क्षेत्रीय एकजुटता दिखाने और एकीकरण के लाभों के पक्ष में मजबूत तर्क पैदा करने का मौका बनना चाहिए था। लेकिन, इसके बजाय सभी देशों ने अपनी-अपनी सीमाओं के भीतर इसका सामना करने का नियम सा बना लिया और इसके प्रति कोई सुसंगत क्षेत्रीय प्रतिक्रिया का ढांचा विकसित करने में किसी तरह की भूमिका के अभाव में यूरोपीय संघ पीछे छूट गया। यूरोपीय देशों ने प्राथमिक रूप से अपनी नीतियां खुद बनाईं जबकि ज्यादातर क्षेत्रीय नेता प्रत्क्षत: किसी क्षेत्रीय कार्रवाई के लिए कोशिशें करते रह गए। दुनिया के कुछ सबसे अमीर देशों की स्वास्थ्य संबंधी कमजोरियां उजागर हो गईं।
 
राष्ट्रीय सरकारों द्वारा सीमाएं बंद करने और नियंत्रण बढ़ाने के बीच यूरोप में शायद ही कोई समन्वित प्रतिक्रिया की जा सकी। आर्थिक पक्ष पर भी, यूरोपीय परियोजना को अपनी कई मूल अवधारणों को भुलाना पड़ रहा है। यूरोपीय आयोग को अपनी कथित ‘सामान्य मुक्ति उपधारा’ का प्रयोग करते हुए कठोर व्यय नियमों को हटाने और संकट से निपटने के लिए देशों को बड़े बजटीय घाटों का उपयोग करने की अनुमति देनी पड़ी। यह आपातकालीन आर्थिक उपाय है जिसका यूरोपीय संघ के इतिहास में पहली बार उपयोग हुआ है। यूरोपीय संघ कठोर वित्तीय अनुशासन का निर्वाह करने पर गर्व करता रहा है। यूरो समूह के अध्यक्ष मारियो सेंटेनो के अनुसार, यूरोपीय क्षेत्र के इस संकट से बाहर आने पर उसके ऋणों का स्तर काफी ऊंचा होगा और यह बात यूरोपीय संघ के विखंडन की प्रक्रिया को तेज कर सकती है।
 
वास्तव में यह बहुत असाधारण बात है कि बड़ी शक्तियों की राजनीति का खुला खेल ऐसे समय में देखने को मिले, जिसे अधिकांश उदारवादियों के अनुसार अधिक से अधिक वैश्विक समन्वय के उदाहरण का समय होना चाहिए था। वैश्विक महामारियों को व्यापक रूप से गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों के रूप में देखते हुए, माना जाता रहा है कि ऐसी स्थितियां प्रमुख शक्तियों के बीच ज्यादा सहयोग को प्रेरित करती हैं, क्योंकि ये 'हम सब साथ हैं' वाली स्थितियां होती हैं, न कि प्रमुख शक्तियों के बीच तुलनात्मक लाभों की प्रतिस्पर्धा वाले क्षेत्रों के रूप में।
 
लेकिन दुनिया की आज की स्थिति में हमारी ये सारी भ्रमपूर्ण धारणाएं समाप्त हो जानी चाहिए। अगर कुछ है तो यह कि कोरोना वायरस संकट के कारण अमेरिका और चीन के बीच तनाव के बिन्दु पहले से ज्यादा मुखर हुए हैं। यद्यपि दुनिया का एक बड़ा हिस्सा चीन द्वारा शुरुआत में पर्याप्त सूचनाएं छिपाए जाने पर क्रुद्ध है, फिर भी वह अल्पावधि के लिए चीन द्वारा उपलब्ध कराई जा रही सहायता लेने के लिए बाध्य है। और, इसने चीन को उस महामारी के दौरान दुनिया की मदद करने की आड़ में अपने प्रभाव का विस्तार करने का मौका दिया है जिससे पैदा हुआ संकट प्रारंभिक अवस्था में उसके ही उत्तरदायित्वपूर्ण आचरण से बहुत कम हो सकता था।
 
नतीजतन, दुनिया उस स्थिति की ओर बढ़ती जाएगी जिसमें चीन और अमेरिका के बीच खींचतान बढ़ेगी। इसका सबसे बड़ा नुकसान वैश्विक शासन व्यवस्था को होगा, जिसे इस संकट ने काफी हद तक उत्तरदायित्व मुक्त कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन तक कोई भी वैश्विक संस्थान अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरा है। यह खाली स्थान किसी हद तक मध्यम स्तर की शक्तियों, जैसे भारत, जापान, आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया, फ्रांस और जर्मनी द्वारा भरा गया है जिनके पास अंतरराष्ट्रीय राजनीति के वस्तुगत और वैचारिक पक्षों को प्रभावित करने के लिए पर्याप्त क्षमता और इच्छा है। कोविड-19 महामारी को उनका प्रत्युत्तर और किन्हीं बड़ी शक्तियों के बीच समन्वय की अनुपस्थिति में उनकी परवर्ती क्षेत्रीय पहुंच न केवल उनके निकटवर्ती और विस्तारित पड़ोस में उनके हितों की रक्षा करने की क्षमता को रेखांकित करती है, बल्कि अमेरिका-चीन की द्विधारा पर निर्भर हुए बिना लोकहित प्रदान कर सकने की क्षमताओं को व्यक्त करती है। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में यह प्रवृत्ति उदीयमान क्षेत्रीय मध्यम शक्तियों की बढ़ती भूमिका को रेखांकित करती है।
 
वैश्वीकरण को दोराहे पर खड़ा बताना आज आम बात है। ब्रेक्जिट से लेकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के निर्वाचन तक, प्रवासन के विरुद्ध पश्चिमी देशों की प्रतिक्रिया से लेकर दुनिया भर में बढ़ती व्यावसायिक बाधाओं तक, विश्व राजनीति के इस काल को अ-वैश्वीकरण का काल कहा जा रहा है। कोरोना वायरस का खतरा हमारी दैनिक शब्दावली में आने के पहले से ही विश्व बदलाव के एक बहुत बड़े मोड़ पर था। 2008-09 के वैश्विक वित्तीय संकट का रैखिक संचरण मौजूदा वैश्विक अर्थव्यवस्था के छिन्न-भिन्न होने तक हुआ है। इस बीच के घटनाक्रम राजनीतिक और आर्थिक ताकतों द्वारा प्रभावी शासन और अभावग्रस्त लोगों की आकांक्षाओं के प्रबंधन की विश्वसनीयता पर सवालों की ओर ले जाते हैं। ताकत दिखाने की बड़ी राजनीति अब भी बेरोकटोक जारी रही है जब बहुत से लोग पहले से ज्यादा वैश्विक एकजुटता की अपेक्षा कर रहे हैं।
 
इस संकट के पहले से ही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था टूटन का शिकार हो रही थी और बड़ी शक्तियों की प्रतिद्वंद्विताएं वैश्विक ढांचे के समोच्च बिंदुओं को आकार देना शुरू कर रही थीं। कोविड-19 संकट ने इस प्रक्रिया को तेज कर दिया है। भारत जैसे देशों को इस चुनौतीपूर्ण वातावरण के बाह्य कारकों को दिशा देने के लिए तैयार हो जाना चाहिए। दुनिया के पहले से ज्यादा खंडित होने के क्रम में वैश्वीकरण पर नए सिरे से समर्थन की चुनौतियों का दबाव बढ़ेगा। भारत जैसे देश के लिए यह एक समस्या है जिसे वैश्वीकरण की ताकतों से लाभ मिला है। सूचनाओं, विचारों, धन, सेवा अवसरों और लोगों के निर्बाध प्रवाह ने भारतीयों को समृद्धि का अभूतपूर्व अवसर दिया है। लेकिन, वैश्विक दृश्यपटल के तेज परिवर्तन के साथ भारतीय नीति—निर्माताओं को विश्लेषण करना पड़ेगा कि उन नए अवसरों का सर्वाधिक लाभ कैसे लिया जाए जो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला के ध्वस्त होने और एक नई व्यापार तथा निवेश व्यवस्था के निर्माण के साथ पैदा हो रहे हैं।
 
पहले भी कई बार एगसा लगा है कि वैश्वीकरण अब नहीं बचेगा। लेकिन तय है कि यह मौजूदा हमले को भी झेल जाएगा। लेकिन, यह जिस रूप में बचेगा वह भी, जिस विश्व में हम रहते हैं उसके बारे में ज्यादा रचनात्मकता के साथ सोचने और पर्याप्त नीतिगत प्रतिक्रियाएं देने की चुनौतियां प्रस्तुत करेगा।
(लेखक नई दिल्ली स्थित आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में अध्ययन के निदेशक और सामरिक अध्ययन कार्यक्रम के प्रमुख हैं)