भारतीय रेल: युद्ध विषाणु के विरुद्ध हमारी रेल सेवा

    दिनांक 19-मई-2020   
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कोरोना के विरुद्ध लड़ती आ रही है। लॉकडाउन के दौरान वर्षों से लंबित सिग्नल, ट्रैक, पुल आदि की मरम्मत और पुनरुद्धार आदि काम निपटाने में भी जुटी रही है। इस कायाकल्प के बाद न केवल रेल सुरक्षित होंगी, बल्कि परिचालन क्षमता भी बेहतर होगी
 
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लॉकडाउन के दौरान मरम्मत, रखरखाव और नवीनीकरण के वर्षों से लंबित काम निपटाने के बाद भारतीय रेल सेवा के लिए तैयार है।
 
भारतीय रेलवे के 167 वर्ष के इतिहास में पहली बार इतने लंबे समय के लिए ट्रेनों का परिचालन बंद हुआ है। लेकिन लॉकडाउन को जीवन में सिर्फ एक बार मिलने वाला अवसर मानते हुए रेलवे ने अपने सारे लंबित, रखरखाव और मरम्मत के छोटे-बड़े काम निपटा लिए। दो चरणों के लॉकडाउन में 12,270 किलोमीटर ट्रैक का रखरखाव का काम पूरा किया गया। इससे ट्रेनों की लेटलतीफी तो दूर होगी ही, रेलवे की परिचालन क्षमता भी बढ़ जाएगी। इसके अलावा, रेलवे चायनीज वायरस के विरुद्ध लड़ाई में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। फिलहाल उत्तर रेलवे के जिन वर्कशॉप में रेल डिब्बों के रखरखाव का काम बंद है, वहां बड़े पैमाने पर पीपीई किट, मास्क और सैनिटाइजर बन रहे हैं। साथ ही, रेल के डिब्बों को आइसोलेशन वार्ड में बदला गया है। लॉकडाउन के दौरान भारतीय रेलवे ने जिस तरह से काम किया है, उसे देखते हुए लग रहा है कि देश की जीवन रेखा की कायापलट करने की तैयारी है।
 
एक तरफ रेलवे वर्षों पुराने लंबित काम पूरे कर समस्याओं से छुटकारा पा रही थी, वहीं 28 दिनों के लॉकडाउन के बाद रेलवे ने कपूरथला रेल कोच फैक्ट्री (आरसीएफ) में 23 अप्रैल से उत्पादन भी शुरू कर दिया। यहां 3,744 कर्मचारियों को काम शुरू करने की अनुमति दी गई है जो आरसीएफ परिसर टाउनशिप के अंदर रह रहे हैं। निर्माण के लिए संसाधनों की सीमित उपलब्धता के बावजूद आरसीएफ कपूरथला ने सिर्फ दो कार्य दिवस में ही दो कोच तैयार कर लिए। इनमें एक एलएचबी हाई कैपेसिटी पार्सल वैन और लगेज कम जेनरेटर कार शामिल हैं जो क्रमश: 23 अप्रैल और 24 अप्रैल को तैयार की गई हैं। इसके अलावा, प्रशासनिक कार्यालयों में सभी अधिकारी काम पर लौट आए हैं। सामाजिक दूरी का ख्याल रखते हुए 33 प्रतिशत कर्मचारियों को रोटेशन रोस्टर के आधार पर ड्यूटी पर बुलाया जा रहा है।
 
100 साल पुराना पुलस हटाया
40 दिनों के लॉकडाउन के दौरान रेलवे ने कहीं 50 साल बाद ट्रैक के नीचे लगी लकड़ी के स्लीपर बदल दिए तो कहीं 100 साल पुराना फुट ओवर ब्रिज (एफओबी) तोड़ दिया। अधिकारियों के अनुसार, सुरक्षा एवं परिचालन क्षमता बेहतर करने के लिए भारतीय रेलवे ने लॉकडाउन के दौरान यार्ड पुनरुद्धार और सीजर्स क्रॉसओवर के नवीकरण के अलावा वर्षों से लंबित पुलों व पटरियों के रखरखाव का प्रमुख काम पूरा कर लिया, रखरखाव का बाकी काम 17 मई तक पूरा कर लिया जाएगा। देशभर में रेलवे के कई ऐसे छोटे-छोटे पुल हैं, जो 100 साल से ज्यादा पुराने हो चुके हैं, जिन्हें मरम्मत की जरूरत थी या नए निर्माण की।
 
कहां क्या किया?
पटरियों की मरम्मत : काजीपेट यार्ड (तेलंगाना) और विजयवाड़ा यार्ड (आंध्र प्रदेश) में ट्रैक के नीचे लगी लकड़ियों के स्लीपर को बदला गया। ट्रैक में लकड़ी के स्लीपर 1970 में लगाए गए थे। इसी तरह, मैसूर छोर पर ट्रेनों का एक साथ आवागमन के लिए बेंगलुरु सिटी यार्ड (कर्नाटक) का पुनरुद्धार किया गया, जो बीते दस से भी अधिक वर्षों से लंबित था। इसके कारण सामान्य दिनों में भी 60 मेल/एक्सप्रेस ट्रेनों को रद्द या निरस्त करना पड़ता था।
 
पुल की मरम्मत : कर्नाटक के मैसूर डिवीजन में तुंगा नदी पर एक महत्वपूर्ण पुल है। 20 मीटर ऊंचे इस पुल में लोहे के 15 गार्डर (शहतीर) लगे हैं, जो मानक स्तर के नहीं हैं। इनकी जगह 25 टन की भार क्षमता वाले शहतीर लगाए गए हैं। इसी तरह, चेन्नई स्टेशन के पास एक असुरक्षित आरओबी को तोड़ा गया। आंध्र प्रदेश के राजामुंदरी-विशाखापत्तनम तथा तांगुतुरु-सिंगरायाकोंडा के बीच बॉक्स पुल का निर्माण किया गया। महाराष्ट्र के भुसावल डिवीजन में 6 एफओबी का निर्माण किया जा रहा है, जो भुसावल, बोडवाड, अकोला, न्यू अमरावती, चंदर बाजार और नंदूरा स्टेशन पर हैं। वहीं, पंजाब में लुधियाना स्टेशन पर 100 साल पुराने एफओबी को तोड़ा दिया गया। 2014 से ही इसका उपयोग बंद था। कोलकाता टर्मिनल स्टेशन पर भी एक असुरक्षित आरओबी को तोड़ा गया।
 
महामारी से लड़ाई में सबसे आगे
कोविड-19 के विरुद्ध लड़ाई में भी रेलवे सबसे आगे है। रेलवे ने 7 अप्रैल से अपनी कार्यशालाओं, कोच डिपो एवं रेलवे अस्पतालों में पीपीई किट, दोबारा उपयोग में लाए जाने वाले मास्क और हैंड सैनिटाइजर का उत्पादन शुरू किया। इस दौरान करीब 6 लाख मास्क और 40,000 लीटर से अधिक हैंड सैनिटाइजर का उत्पादन किया। साथ ही, लॉकडाउन के दौरान जरूरी एवं अन्य वस्तुओं की आपूर्ति बनाए रखने के लिए 24 घंटे माल ढुलाई जारी रखा। रेलवे ने स्वास्थ्यकर्मियों के लिए अप्रैल में 30,000 पीपीई किट बनाए, जबकि मई तक 1,00,000 पीपीई किट बनाने का लक्ष्य है। अप्रैल में जहां रोजाना 1,000 किट बनते थे, मई में इसे रोजाना 2,000 तक पहुंचाने का लक्ष्य है। ग्वालियर स्थित डीआरडीओ प्रयोगशाला ने रेलवे द्वारा निर्मित पीपीई किट को उच्च गुणवत्ता वाला माना है। देश में पीपीई किट की किल्लत के मद्देनजर उत्तर रेलवे की जगाधरी कार्यशाला ने इस दिशा में पहल की थी। खास बात यह कि रेलवे ने वैश्विक स्तर पर कच्चे माल की भारी किल्लत के बावजूद ने यह उपलब्धि हासिल की। रेलवे द्वारा निर्मित पीपीई किट की कीमत बाजार के मुकाबले आधी है। उत्तरी जोन के जगाधरी वर्कशॉप ने एक दिन में 1003 पीपीई किट बनाकर रिकॉर्ड भी बनाया है।
 
30 लाख से अधिक को नि:शुल्क भोजन
संकट काल में रेलवे ने स्टेशनों और इसके आसपास जरूरतमंद लोगों का ख्याल भी रखा है। सीआरपीएफ और रेलवे से जुड़े गैर सरकारी संगठनों के साथ भारतीय रेलवे ने एक टीम की तरह काम किया। भारतीय रेल ने 28 मार्च को पहले दिन 74 स्थानों पर 5,419 लोगों से भोजन मुहैया कराया। आईआरसीटीसी बेस किचन से 30 मार्च से 30 अप्रैल तक रेलवे 30 लाख से अधिक लोगों को भोजन उपलब्ध करा चुकी है। ये बेस किचन उत्तरी, पश्चिमी, पूर्वी, दक्षिणी और दक्षिण-मध्य में स्थित हैं। फिलहाल देशभर में करीब 300 स्थानों पर रोजाना औसतन लगभग 50,000 लोगों को आरपीएफ द्वारा भोजन दिया जा रहा है।
 
डिब्बों को बनाया आइसोलेशन वार्ड
देश में कोरोना संक्रमण के बढ़ते मामलों के मद्देनजर रेलवे ने यात्री डिब्बों को आइसोलेशन वार्ड में भी बदला है। पूर्व रेलवे ने तो अपने जोन के सभी कोचिंग डिपो में पुराने आरसीएफ कोच को आइसोलेशन वार्ड बना दिया। पहले स्लीपर श्रेणी के डिब्बों के बीच के बर्थ को हटाकर कोच तैयार किया गया था, लेकिन बाद में द्वितीय श्रेणी या सामान्य श्रेणी के डिब्बों को भी आइसोलेशन वार्ड बनाया गया। राज्य की जरूरत को देखते हुए रेल मंत्रालय की योजना पहले 20,000 डिब्बों को आइसोलेशन वार्ड बनाने की थी, लेकिन राज्य सरकारों ने स्कूलों और कॉलेजों को क्वारंटीन सेंटर बनाया, क्योंकि उसमें पर्याप्त जगह है और वहां एक साथ 50 लोगों को रखा जा सकता है। इसलिए रेलवे ने 5200 रेल डिब्बों में बदलाव के बाद काम रोक दिया।