विकसित करनी होगी तकनीकी क्षमता

    दिनांक 19-मई-2020   
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पाञ्चजन्य और आर्गनाजर साप्ताहिक पत्रिकाओं ने गत 11 मई को ‘भारतीय अर्थव्यवस्था का पुनर्निर्माण: अवसर और चुनौतियां’ विषय पर एक वेबिनार आयोजित किया। इसमें ‘तुगलक’के संपादक सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री तथा आर्थिक-राजनीतिक विषयों के लेखक एस. गुरुमूर्ति ने विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखे। वेबिनार के अंतिम सत्र में एस. गुरुमूर्ति ने अनेक प्रश्नों के उत्तर दिए। इस सत्र का संचालन पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने किया। प्रस्तुत हैं कुछ चुनिंदा प्रश्नोत्तर-

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‘मेक इंन इंडिया’ कितना सफल रहा है? इसे बेहतर बनाने के लिए सरकार को क्या करना चाहिए?
 
‘मेक इन इंडिया’ तभी सफल होगा, जब इसके तहत उत्पादन में हमारे स्थानीय उद्योगों की भागीदारी ज्यादा होगी। कर में वृद्धि करके हम मोबाइल फोन उत्पादन बढ़ाने और दुनिया का आॅटोमोबाइल हब बनने में सफल रहे। हमें वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला ढांचों की पूर्ति करने के बजाय अपना मॉडल तैयार करना पड़ेगा। ‘मेक इन इंडिया’ बहुत ही अच्छा विचार है, लेकिन इसे नीतिगत तौर पर पर्याप्त मजबूती नहीं मिली है।
 
 
सोना खरीदने के संबंध में भारतीयों की मानसिकता को कैसे बदला जाए? भारत के लिए सोना कितना महत्वपूर्ण है?
 
वैश्विक शक्ति बनने के लिए सोने का सहारा लेना पड़ेगा। हम भारतीयों के पास लगभग 25,000-40,000 टन सोना है। ऐसी चल परिसंपत्ति के मामले में भारत सर्वाधिक संपन्न देश है। सरकार को एक बार किसी तरह की छूट वगैरह देने के बदले लोगों से स्वैच्छिक आधार पर यह सोना लेने पर विचार करना चाहिए। यह सोना विदेशी मुद्रा में बदल कर भारत के परिदृश्य को बदल सकता है। सोने के बारे में हमें भारतीय तरीके से सोचना चाहिए, न कि पश्चिमी तरीके से।
 
 
क्या बचत करने की भारतीय परंपरा मौजूदा अर्थव्यवस्था के लिए मददगार होगी? हमारे लिए सबसे अच्छा क्या होगा-सोना, विदेशी मुद्रा या शेयर बाजार?
 
विदेशी मुद्रा इस बात पर निर्भर करेगी कि चीन को दुनिया कैसे काबू करती है। सोना हमारे जीवन का हिस्सा रहा है। शेयर बाजार और वित्तीय अनुबंधों के जरिए होने वाली कारोबारी लेन-देन प्रक्रिया से बहुत कम लोग जुड़े हैं, ज्यादातर लोगों को इन शब्दों की जानकारी तक नहीं। हमारी परंपरागत तौर पर बचत करने की आदत हमें हमेशा मुश्किल समय से बाहर निकालती रहेगी।
 
 
यह मानते हुए कि आने वाले समय में स्वदेशी के प्रस्तावित मॉडल पर और जोर होगा, प्रवासी श्रमिकों की रोजगार की समस्या का समाधान कैसे होगा? वैश्वीकरण की नीतियों को नकारते हुए हम भारत में विनिर्माण कैसे बढ़ा सकते हैं?
 
आज समूचा विश्व कीमतें कम होने की बजाय सुरक्षा के बारे में विचार कर रहा है। चीन ने कम कीमत का विकल्प उपलब्ध कराया, लेकिन आज सभी बेहतर विकल्प के बारे में विचार कर रहे हैं। भारत में लगभग 30 करोड़ प्रवासी श्रमिक हैं और एक प्रदेश से दूसरे में जाकर काम करने वालों की संख्या करीब 3.3 करोड़ है। इनमें से केवल 15-20 लाख लोग वापस घर गए होंगे। सिर्फ वही प्रवासी मजदूर वापस लौट रहे हैं, जिनके पास कुछ भी नहीं। आने वाले समय में ऐसा कारोबारी ढांचा विकसित होगा जो इस तबके के मजदूरों के हितों का ध्यान रखे। हमें यह मानकर चलना होगा कि आने वाले समय में प्रवासी मजदूर सस्ते नहीं रहेंगे।
 
 
निर्यात बढ़ाने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
 
निर्यात कार्यनीति को दो भागों में बांटना होगा। हमें प्रौद्योगिकीय उत्पादों के निर्यात पर ध्यान देना होगा। सलाहकार कंपनियां सिर्फ अल्प अवधि के कामों के लिए बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली लोगों का इस्तेमाल करती हैं। भारतीय कंपनी जोहो ने 4जी चिप जारी की और सब हैरान हैं कि एक भारतीय कंपनी ने कैसे यह काम कर लिया। हमारे पास अपार संभावनाएं मौजूद हैं, लेकिन हमारी ऊर्जा रोजाना के कामों में ही उलझ कर व्यर्थ हो जाती है। अगर हम अपनी तकनीकी क्षमता को विकसित करने में 3-4 साल का समय दें तो भविष्य में प्रौद्योगिकीय उत्पादों को तैयार करने के मामले में हम अग्रणी देशों में होंगे। भारत के लिए भविष्य का एक और क्षेत्र है- नैनो टेक्नॉलोजी। भारत में नैनो टेक्नोलॉजी में भविष्य बहुत उज्ज्वल है।
 
 
कोविड-19 के कारण हमारे यहां शिक्षा, छोटे कारोबार और पर्यटन उद्योग पर क्या असर पड़ेगा?
 
छोटे कारोबार तो 4-6 माह में पटरी पर आ जाएंगे। लेकिन पर्यटन और होटलों में ठहरने से परहेज, परस्पर मिलने-जुलने और निजी समारोहों वगैरह में शामिल होने से परहेज, परस्पर दूरी बनाने जैसी नए सामाजिक व्यवहार का चलन पर्यटन उद्योग को बुरी तरह प्रभावित करेगा। सिनेमा और पर्यटन उद्योग को नई संरचना गढ़नी होगी। मॉल के लिए अपने अस्तित्व को बचाए रखना मुश्किल हो जाएगा।
 
 
सब्सिडी और कल्याणकारी मॉडल कब तक चलेंगे?
 
सब्सिडी मॉडल लंबे समय तक बना रहेगा और हमें इसके साथ ही रहना होगा। हालांकि अमेरिका जैसे देश अपने नागरिकों को जितनी सब्सिडी देते हैं, उसकी तुलना में हम नाममात्र ही दे रहे हैं। इसके लिए एक बेहतर मॉडल तैयार करना होगा।
 
 
कोविड-19 से उबरने के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था कैसे पुनर्जीवित होगी?
 
शहरी और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के संबंधों को और भी स्पष्टता के साथ परिभाषित करना होगा। ग्रामीण अर्थव्यवस्था को शहरी अर्थव्यवस्था से अलग रखना होगा। शहरी अर्थव्यवस्था, जिसमें पर्यावरण और कानून एवं व्यवस्था संबंधी खर्चे बहुत ज्यादा होते हैं, ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए उपयुक्त नहीं। ग्रामीण अर्थव्यवस्था स्वतंत्र हो और खुद विकसित हो। सरकार को इसे समर्थन देना चाहिए और ग्रामीण उद्योगों से उत्पादों को सीधे खरीदने की व्यवस्था करनी चाहिए। हमें यह समझना होगा कि ग्रामीण का मतलब पिछड़ापन नहीं, हमें ऐसे विचारों का त्याग करना होगा।