जबरन कब्जाए गए गिलगित-बाल्टिस्तान में चीन की कठपुतली मात्र है पाकिस्तान

    दिनांक 19-मई-2020
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डॉ. शिव पाठक
पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी गिलगित बाल्टिस्तान में चुनाव करवाने का आदेश पारित किया है वहीं भारत सरकार ने सीधा व सख्त शब्दों में पाकिस्तान के राजनयिक को बुलाकर संदेश दिया कि पाकिस्तान सरकार व उसके न्यायालय को इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार के भौतिक बदलाव' का अधिकार ही नहीं है

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17 मई को पाकिस्तान के राष्ट्रपति आरिफ अल्वी गिलगित बाल्टिस्तान में चुनाव करवाने का आदेश पारित किया है जिसका लक्ष्य गिलगित बाल्टिस्तान में चुनाव की तैयारी के लिए वहां अंतरिम सरकार बनाना व पाकिस्तान के चुनाव अधिनियम 2017 को इस क्षेत्र में लागू करवाना है । इसके पहले 30 अप्रैल को पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट भी इसी प्रकार के निर्देश पाकिस्तान सरकार को दिया था ।
इसकी प्रतिक्रिया में भारत सरकार ने सीधा व सख्त शब्दों में पाकिस्तान के राजनयिक को बुलाकर संदेश दिया कि पाकिस्तान सरकार व उसके न्यायालय को इस क्षेत्र में किसी भी प्रकार के भौतिक बदलाव' का अधिकार ही नहीं है । इसके आगे बढ़ते हुए भारतीय विदेश मंत्रालय की विज्ञप्ति में पाकिस्तान से इस क्षेत्र से सेना हटाने के लिए भी कहा गया। यह सख्त संकेत अब भारत के इस क्षेत्र में बदले रुख को स्पष्ट करता है ।इसके पहले भी 22 फरवरी 1994 को भारतीय संसद के दोनो सदनों ने एक मत में गिलगित- बाल्टिस्तान सहित पूरे जम्मू कश्मीर को भारत का अभिन्न के रूप में स्वीकार किया था। इस अधिकृत भाग को वापस लेने का संकल्प पारित हुआ था ।
गिलगित बाल्टिस्तान में पाकिस्तान ने 1947 से अवैध रूप से कब्जा कर रखा है ।जबकि भारत का यह हिस्सा उसी समय हो गया था जब महाराजा हरिसिंह नें 26 अक्टूबर 1947 को जम्मू- कश्मीर का भारत पर अधिमिलन किया; क्योंकि जम्मू, कश्मीर, लद्दाख़,गिलगित व बाल्टिस्तान, मीरपुर व मुज्जफराबाद उनकी रियासत के अंग थे। हरी सिंह द्वारा भारत में यह अधिमिलन पूर्ण, वैधानिक व अटल है । 1947 से पाकिस्तान के अवैध कब्जे के बावजूद भारत ने कभी भी इस क्षेत्र से न तो अपने वैधनिकता के दावे को छोड़ा न ही अपने सांस्कृतिक सूत्र को ।
कोविड 19 के दौरान ही पाकिस्तान द्वारा गिलगित बाल्टिस्तान के शोषण की एक बानगी देखिए, अभी अपने जनंसख्या के अनुपात में सर्वाधिक कोविड पॉजिटिव गिलगित बाल्टिस्तान में पाए गए । जबकि वहां टेस्ट नही हो रहें क्योंकि न तो टेस्ट लैब है, न कोई मेडिकल कॉलेज है , न कोई नर्सिंग कालेज। पाकिस्तान सरकार इस क्षेत्र के पूरे आर्थिक व जल संसाधन का अपने राज्यों के लिए उपयोग करते हुए भी न तो फंड दे रही है, न अन्य कोई मदद । 72, 971 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्रफल वाले इस इलाके में मात्र 15 वेंटिलेटर है। साथ में पाकिस्तान अपने प्रान्तों के मरीजों को गिलगित बाल्टिस्तान के होटलों व अन्य जगह में शिफ्ट करके स्थानीय लोगों की जान जोखिम में डाल रहा है। ईरान से आए हुए लोगों को पाकिस्तान ने गिलगित- बाल्टिस्तान में क्वारंटाइन कर रहा है ।
पाकिस्तान ने गिलगित बाल्टिस्तान को कभी वैधानिक रूप से इसे अपना हिस्सा नही माना । उसका संविधान में इस प्रान्त का जिक्र नहीं है। पाकिस्तान का अनुच्छेद एक उसके चारों प्रान्तों को तो दिखाता है, पर इसमें न तो गिलगित -बाल्टिस्तान है, न ही मीरपुर- मुज्जफराबाद । न ही यहां के व्यक्ति पाकिस्तानी संसद के वोटर होते हैं।
पाकिस्तान को गिलगित बाल्टिस्तान में चुनाव करने के परिप्रेक्ष्य को समझना होगा । यह न तो वहां के निवासियों के स्वायत्तता के लिए है, न किसी प्रकार के विकास के लिए। जबकि वास्तविकता में इसका मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र में अपनी राजनीतिक व आर्थिक शोषण को वैधानिकता प्रदान करना है। और परोक्ष रूप से इसे पाकिस्तान का पांचवा प्रान्त बनना है । इस पांचवें प्रान्त को बनाने का दबाव भी चीन के द्वारा आ रहा है ।
हुआ ये है कि गिलीगत बाल्टिस्तान में चीन की अर्थिक गतिविधियों के बढ़ने के कारण चीन पाकिस्तान पर दबाव बना रहा है कि यहां शान्ति व सुरक्षा को सुनिश्चित करें; व इस्लामबाद को गिलगित- बाल्टिस्तान से अपने वैधानिक रिश्ते को सही से परिभाषित करें । जिससे चीन के निवेश में श्रम, संसाधन व जमीन जैसे विषयों में एक स्पष्टता रहें। चीन का महत्वाकांक्षी प्रोग्राम चीन पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर यहां पर बन रहा है। काराकोरम हाईवे, वखान कॉरिडोर व सुस्त बंदरगाह के माध्यम से चीन इस क्षेत्र में सीधा जुड़ चुका है । उसका गिलगित बाल्टिस्तान के मेगा प्रोजेक्ट -बांधों व बहुमूल्य धातु खदानों में सीधा निवेश है ।
अभी 14 मई को ही पाकिस्तान ने चीन के साथ भाषा- डाइमर बांध, जिसकी लागत 442 बिलियन रुपए है, के लिए एक सन्धि की है। 4500 मेगावाट से पाकिस्तान तो अंधेरे से मुक्त हो जाएगा पर गिलगित बाल्टिस्तान का एक बड़ा हिस्सा डूब कर अंधेरे में खो जायेगा । दुःखद बात यह भी है की इन बांधों से होने वाली पूरी आमदनी पाकिस्तान के प्रांत ख़ैबर ख़ैबर पख्तूनख्वा को जाएगी, क्यों कि अधिकांश बांधों का ऑफिस उसी प्रान्त में है ।
पाकिस्तान इस तरीके के कई बड़े बांध बना रहा है, जिसका वहां के स्थानीय लोग व्यापक विरोध करते रहे हैं । पाकिस्तान इन चुनावों की आड़ से दुनिया व स्थानीय लोगों को खुदमुख्तार होने का ढोंग रचाना चाहता है । भारत के सामारिक हितों में भी ये बांध नहीं है।
जिस 2018 के गिलगित बाल्टिस्तान के ऑर्डर पर पाकिस्तान वहां चुनाव करवाना चाहता है, वह कुछ नही बल्कि गिलगित बाल्टिस्तान के लिए गुलामी पत्र है । क्योंकि 2018 के इस ऑर्डर के अनुसार निर्णय लेने की सबसे बड़ी शक्ति पाकिस्तान के प्रधानमंत्री की हो गई है। उसके अनुसार कभी भी पाकिस्तान का प्रधानमंत्री इस क्षेत्र के बारे में कोई भी निर्णय ले सकता है। पाकिस्तान सरकार किसी भी भूमि अधिग्रहित कर सकती है। इसके अलावा इस क्षेत्र का कोई व्यक्ति या राजनीतिक दल पाकिस्तान के खिलाफ कुछ बोल नहीं सकता । पाकिस्तान की सरकार को यहां पर कर लगाने की छूट मिल गई है । शरीयत कानून यहां भी लागू हो गया है। पाकिस्तान में सुप्रीम कोर्ट की अधिकारिता इस पूरे क्षेत्र तक पहुंच गई है। पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में भी इसी प्रकार के निर्णय के माध्यम से वहां पर पाकिस्तान के कब्जे को वैधानिकता प्रदान करना चाह रहा था । तब भी भारत सरकार ने व्यापक विरोध किया था । इस प्रकार से पाकिस्तान को क्षेत्र के वास्तविक विकास, मानवाधिकार या राजनीतिक स्वतंत्रता से इस ऑर्डर का कोई लेना देना नहीं है। और ये चुनाव सिर्फ पाकिस्तान के उपनिवेश को मजबूत करेगा व शोषण की प्रक्रिया तेज होगी । कितनी विडंबना है कि यहां के लोगों के पास न तो वोट का अधिकार है, न ही अन्य सिविल अधिकार पर पाकिस्तान इनसे कर वसूलता है।
पाकिस्तान एक रणनीति के तहत विभिन्न प्रदेशों से सुन्नी मुसलमानों को लाकर इस प्रान्त में बसा रहा है ताकि इस यहां की शिया आबादी अल्पसंख्यक हो जाए और वह अपने शोषण के खिलाफ आवाज न उठा पाए। राज्य प्रायोजित सुन्नी आतंकवाद से हर वर्ष सैकड़ों शिया मुस्लिम मारे जाते हैं, उनकी स्थानीय पुरानी भाषाओं की जगह उर्दू थोप दी जा रही है। पाकिस्तान अपने दमन से इस क्षेत्र में 1947 से ही 'शान्ति' स्थापित किए हुए हैं।
इस भाग में किसी प्रकार में भौतिक परिवर्तन के खिलाफ भारत हमेशा रहा है। अब भारत की समर्थ सरकार अपने इस भू भाग के लिए गंभीरता से सोचना शुरू किया है। प्रधानमंत्री मोदी 2015 में लालकिले से दिए गए अपने भाषण में गिलगित बाल्टिस्तान का जिक्र कर चुके हैं।
( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं )