नई सुबह की राह

    दिनांक 19-मई-2020
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उमेश्वर कुमार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा करते हुए देश को स्वावलंबन की तरफ ले जाने के सूत्र दिये। स्वावलंबन का आधार होगा- स्वदेशी और स्थानीयकरण। सरकार ने कुटीर, लघु, सूक्ष्म और मध्यम क्षेत्र के उद्योगों के लिए पैकेज की घोषणा की, इसके लागू होते पर देश में कारोबार और रोजगार का परिदृश्य बदल जाएगा

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भारतीय उद्योगों को अब अपने काम में और कुशलता तथा गुणवत्ता लाकर उत्पादों को वैश्विक स्तर का बनाना होगा।
 
वैश्विक महामारी कोरोना दुनिया के लिए एक नई अर्थव्यवस्था की रूपरेखा तैयार कर रही है। भारत में इसका आधार होगा स्वावलंबन। भारत भी तेजी के साथ स्वदेशी की राह पर चलने का एक नया उत्साह जगा है। हालांकि बीते कुछ साल पहले ही इस प्रक्रिया की शुरुआत हो गई थी, लेकिन कोरोना संकट काल में इसकी उपादेयता खुलकर सामने आ गई है और उसी हिसाब से इसमें गति भी आ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 लाख करोड़ रुपये के आर्थिक पैकेज की घोषणा के साथ जितनी भी बातें कीं, वे सभी देश को स्वावलंबन की तरफ ले जाएंगी। स्वावलंबन का आधार होगा स्वदेशी और स्थानीय बाजार। कुछ साल पहले सरकार ने एक देशव्यापी मुहिम चलाई थी, जिसमें यह देखा जा रहा था कि किस जिले में क्या खास उत्पाद या उपज है, जो जरा हटकर है। इसकी पहचान की मुहिम तेज हुई। कहीं का खास उत्पाद टेक्सटाइल निकला तो कहीं कोई फसल। किसी का हस्तशिल्प अद्भुत मिला तो कहीं मिली कोई खास स्थानीय औषधि। अभी इन सभी पर काम चल ही रहा था कि कोरोना के वैश्विक संकट ने एक नई तरह की समस्या खड़ी कर दी, जिसके निदान भी सामने आ रहे हैं।
 
कोरोना संकट समूची दुनिया की व्यवस्था को बदल कर रख देगा। अभी करीब तीन दशक पहले दुनिया में एक नई व्यवस्था की शुरुआत हुई थी। इसमें पूरी दुनिया के लिए किसी एक देश में केंद्रीकृत उत्पादन का चलन शुरू हुआ था और देखते-देखते चीन समूची दुनिया का उत्पादक देश बन गया। लोकल और ग्लोबल का सामंजस्य बना और देखते-देखते ‘ग्लोकल’ की अवधारणा दुनिया में छा गई। अमेरिका जैसे कथित विकसित देशों की आपूर्ति चीन के हाथों में चली गई। इन सामानों में खाद्य पदार्थ, दवा की आपूर्ति से लेकर युद्ध के सामान तक शामिल हो गए। इस तरह से तमाम देशों की नकेल एक तरह से चीन के हाथ चली गई। भारत भी इससे अछूता नहीं था।
 
अपने पैरों पर खड़े हम
लेकिन समय रहते सरकार को इस बात का अहसास हो गया था, मोदी सरकार ने ‘मेक इन इंडिया’ की मुहिम शुरू की। इसी का परिणाम है कि एक तरह से हम मोबाइल हैंडसेट बनाने से लेकर अन्य कई क्षेत्रों में स्वावलंबी हो गए हैं। कोरोना ने अब उस ‘ग्लोबल’ विश्व व्यवस्था के खात्मे की घोषणा कर दी है। एक के बाद एक विश्व व्यवस्था के सिद्धांत असफल हो रहे हैं। इससे पहले साम्यवाद और पूंजीवाद के ध्रुवीकरण का सिद्धांत असफल हो गया और रूस का साम्राज्य बिखर गया। प्रजातंत्र की खाल में चीन में अब पार्टी अधिनायकवाद भी ज्यादा चलने वाला नहीं। चीन की अर्थनीति के अमानवीय होने से दुनिया के मंच पर इसकी पोल खुल चुकी है और यह भुक्तभोगी देशों के निशाने पर आ गया है। अमेरिकी पूंजीवाद ने घोर व्यक्तिवाद को बढ़ावा दिया, जिसकी खामियां अब एक-एक कर सामने आ रही हैं। इस तरह से पूंजीवाद में व्यक्तिवाद और सामाजिक समानता में साम्यवाद असफल हो चुके हैं। ऐसे में दुनिया के सामने भारत के पास विकल्प है जिसकी अवधारणा पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानववाद में की थी, जिसमें समाज, देश और काल का ध्यान रखते हुए परिस्थितिजन्य आवश्यकता के अनुसार नीति बनाने की बात कही गई है। इसमें स्वदेशी, स्थानीयकरण, समाजमूलक, पर्यावरण के साथ भारत के चारों पुरुषार्थ का ध्यान रखा गया है। महात्मा गांधी, पंडित राधाकृष्णन जैसे मनीषियों ने भी कुछ इसी तरह की अवधारणा दी है।
 
बहरहाल, कोरोना काल में यह सिद्धांत ही व्यावहारिक सिद्धांत बन गया है और सरकार भी इस पर तेजी से चल रही है। औद्योगीकरण में एक खास बात यह होती है कि उत्पादन केंद्र के आसपास उत्पादन से जुड़े श्रमबल का संकेद्रण होता है और वे मुख्य रूप से भारत जैसे परिवेश में गांवों और कस्बों से आते हैं। रोजी की तलाश में, एक बेहतर जिन्दगी के लिए, बच्चों की शिक्षा के लिए और समुचित स्वास्थ्य सेवा के लिए। अब कोरोना ने सीख दी है कि इस तरह के संकेंद्रण खास भूभागों तक सीमित न रह जाए, बल्कि देश के हर भूभाग में कुटीर, लघु, मध्यम उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण आदि के जरिए न सिर्फ रोजगार उपलब्ध हों, बल्कि वह सारी सुविधाएं भी हों। अभी इस लॉकडाउन में देश के कई राज्यों में किसान देसी तरीके से खाद्य प्रसंस्करण का काम कर रहे हैं। आंध्र के एक क्षेत्र में वाहनों की दिक्कत से जब टमाटर बाजार तक नहीं पहुंच पाए तो किसानों ने उन्हें छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर और सुखाकर रखना शुरू किया है। जाहिर है उन्हें इसका अधिक लाभ मिल पाएगा। जो बड़े उद्योग हैं, जिनका स्थानांतरण संभव नहीं, वे इस तरह की नई व्यवस्था करेंगे जिसमें श्रमिक उनके परिसर में ही रहें और वे उनकी सभी आवश्यकताओं का ध्यान रखें। इसके लिए एक खास समन्वित कारोबारी योजना बनाने की जरूरत होगी।
 
 
 
रेल से घूम रहा है विकास का पहिया

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लॉकडाउन के दौरान मालगाड़ियों का परिचालन होता रहा ताकि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित न हो।
 
कोरोना वैश्विक महामारी से उपजे लॉकडाउन के बाद देशभर से श्रमिक अपने-अपने गांव और घरों की ओर लौटने लगे हैं। श्रमिकों को उनके घर पहुंचाने में भारतीय रेल बड़ी भूमिका निभा रही है। श्रम दिवस के अवसर पर देश में श्रमिक ट्रेनें चलाई गईं और इस खबर के लिखे जाने तक करीब 366 श्रमिक एक्सप्रेस गाड़ियों के जरिए चार लाख से भी अधिक श्रमिक अपने परिवारजनों के पास पहुंच पाए हैं।
 
इन ट्रेनों में कोविड-19 के मद्देनजर सफाई का खास ध्यान रखा जा रहा है और खाने-पीने की खास व्यवस्था की जा रही है। रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष विनोद कुमार यादव के अनुसार अगले सप्ताह 700-800 रेलगाड़ियां और चलेंगी। इन रेलगाड़ियों के परिचालन के लिए गृह मंत्रालय ने एक प्रोटोकॉल जारी किया है जिसके तहत श्रमिकों को भेजे जाने वाले राज्य और श्रमिकों के पहुंचने वाले राज्य के बीच सहमति बनती है और वे अपनी मांग रेलवे को देते हैं, तब रेलवे परिचालन का समय अवधि निश्चित करता है। जिस राज्य से श्रमिक को जाना है उनको वहां पंजीयन कराना होता है। अब सरकार की कोशिश है कि सभी श्रमिकों को उनकी क्षमता के अनुरूप उनके आस-पास के इलाकों में काम मिले। स्वदेशी के तहत स्थानीयकरण पर सरकार का ध्यान गया है। विनोद कुमार यादव ने यह भी बताया कि लॉकडाउन के दौरान रेलवे की मालगाड़ियों का परिचालन होता रहा जिससे कि आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित नहीं हुई।
 
उदाहरण के लिए उन्होंने बताया कि दक्षिण भारत के रामगुंडम में दूध का उत्पादन जरूरत से अधिक था तो उसे रेलवे ने दिल्ली पहुंचाया। इसके अलावा रेलवे ने अपनी सुरक्षा के बहुत से वैसे लंबित काम पूरे कर लिए जिनको पूरा करने के लिए रेल परिचालन को रोकना आवश्यक होता। कोविड-19 से जंग के लिए रेलवे ने 17 कोविड अस्पताल तैयार किए हैं, जबकि 35 अस्पतालों में कुछ खंड कोविड के लिए तय किए गए हैं। रेलवे के 5,000 कोच को ‘कोविड केयर’ के लिए तैयार किया गया है, जिसमें 80 हजार बिस्तरों की व्यवस्था है। देश के जिस भाग में इनकी आवश्यकता होगी, उन्हें भेज दिया जाएगा। इसके अलावा, 12 मई से 15 जोड़ी विशेष रेलगाड़ियों का परिचालन शुरू कर दिया है। धीरे-धीरे इनकी संख्या बढ़ाई जाएगी।
 
 

‘लोकल’ को ही पेप्सी ने बनाया ब्रांड
 
अमेरिकी कंपनी पेप्सी को क्या पता था कि भुजिया क्या होती है? लेकिन देखते-देखते इसने भारत में भुजिया और नमकीन का साम्राज्य खड़ा कर लिया। पेप्सी के इस कारोबार में उतरने का किस्सा दिलचस्प है। भुजिया किस तरह की हो, इसके लिए पेप्सी ने भारत के कई शहरों की नमकीन की दुकानों से नमूने लेकर उनके स्वाद का देशव्यापी सर्वेक्षण कराया। राजस्थान की ख्यात दुकानों से भी नमूने लिए गए थे। पेप्सी में मार्केटिंग के तत्कालीन भारत प्रमुख ने बताया था कि काफी मशक्कत के बाद दिल्ली के करोलबाग की दुकान बीकानेरवाला का नमूना पास हुआ और उससे कारोबारी सौदा कर उसकी भुजिया उत्पादन की प्रक्रिया को पेप्सी ने अपनाया और बीकानेरवाला की इस भुजिया की ब्रांडिंग ‘लहर’ के रूप में देशभर में कर दी। आज भी देश के कोने-कोने में संभावनाओं का समुद्र है, जिसे स्वदेशी अवधारणा के तहत फैलाने की जरूरत है। हमारे ‘लोकल’ में ग्लोबल ब्रांड बनने का दम है। आज हमारे पास तकनीक भी है और मार्केटिंग के गुर भी। इस दिशा में वैसे सफलता की कुछ कहानियां सामने आने लगी हैं, जिनमें से एक है इंदौर की स्नैक्स फूड कंपनी प्रताप नमकीन। 2003 में शुरू हुई यह छोटी सी कंपनी नमकीन के छल्ले बनाती है और आज इसका सालाना कारोबार करीब 850 करोड़ रुपये का है। देशभर में इसके चार कारखाने हैं और 24 राज्यों में 168 स्टोर और 2,900 वितरकों का एक विशाल नेटवर्क है।
 
 
 
अमेरिका का मोहभंग, स्वदेशी पर जोर
 
कोरोना ने वर्तमान विश्व व्यवस्था या कहें कि विश्व अर्थव्यवस्था से दुनिया का मोहभंग कर दिया है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। अमेरिका तक को समझ आ गया है कि अब उसे स्वावलंबी बनना होगा।
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार अभी हालत यह है कि अमेरिका अपनी जरूरत की अधिकांश दवाओं का आयात चीन से करता है। आम अमेरिकी को इस बात की जानकारी नहीं थी कि वे चीन के ऊपर किस हद तक निर्भर है। अमेरिका भारी मात्रा में अपने सैन्य साजो-सामान का भी आयात चीन से करता है। इन सामानों में मिसाइल गाइडिड प्रणाली, नाइट विजन यंत्र सहित कई तरह के उपकरण शामिल हैं। यहां तक कि कई खाद्य पदार्थ भी चीन से ही मंगाए जाते हैं। अब वहां के लोगों में मेड इन यूएसए, एक्ट फॉर अमेरिका की मुहिम चल रही है जिसमें पहले खाद्य, दवा और सैन्य सामान के स्वदेशीकरण पर जोर दिया गया है।
 
स्वावलंबन के पांच स्तंभ

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1 अर्थव्यवस्था- यह सिर्फ वृद्धिशील परिवर्तन ही नहीं, बल्कि लंबी छलांग सुनिश्चित करती है।
2 बुनियादी ढांचा- इसे भारत की पहचान बनाया जाना चाहिए।
3 प्रणाली यानी सिस्टम- नई व्यवस्था 21वीं सदी की प्रौद्योगिकी संचालित व्यवस्थाओं पर आधारित हो।
4 उत्साहशील आबादी- आत्मनिर्भर भात के लिए यह ऊर्जा का स्रोत है।
5 मांग- इसके तहत मांग और आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) की ताकत का उपयोग पूरी क्षमता से किया जाना चाहिए।
 
 
 
 
  
आयकर का सरलीकरण

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आम आयकर दाताओं के लिए रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तारीख बढ़कर 30 नवंबर की गई। चैरिटेबल ट्रस्ट, नॉन कॉरपोरेट कंपनियां, एलएलपी 30 नवंबर तक रिटर्न दाखिल कर सकेंगे।
विवाद से विश्वास योजना की तारीख बढ़कर हुई 31 दिसंबर 2020. आयकर विवाद निपटाने को मिला अधिक समय
टीडीएस कटौती में 25 प्रतिशत की कमी। इससे लोगों को 25 फीसदी अधिक मिल सकेगा भुगतान।
टीडीएस में रियायत से ठेकेदार, ब्याज पाने वाले लोग खास कर बुजुर्ग, किराए से आय, कंपनियों के लाभांश, ब्रोकरेज कमीशन पर मिलेगा लाभ।
टीडीएस के मद में कुल 50,000 करोड़ रुपये का करदाताओं को मिलेगा लाभ।
 
उद्योग के लिए बने भारत-केंद्रित नियम
 
सरकारी खरीद में एमएसएमई को तरजीह, 200 करोड़ रुपये तक की खरीद की निविदा में विदेशी भागीदारी प्रतिबंधित।
आॅनलाइन रहेगी निविदा प्रक्रिया जिससे न हो सके कोई गड़बड़ी।
सैन्य और अर्धसैनिक बलों की कैंटीन में विदेशी माल प्रतिबंधित, एक जून से बिकेंगे सिर्फ स्वदेशी सामान।
छोटे उद्योगों की सहायता के लिए सरकार करेगी वित्तीय टेक्नोलॉजी कंपनियों की व्यवस्था
 
 
 
उद्योग और श्रमिकों की सहायता के प्रावधान
 
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15,000 रुपये मासिक तक की आय वालों के लिए सरकार अगले तीन महीने (जून, जुलाई, अगस्त) तक 24 फीसदी खुद जमा कराएगी पीएफ।
सरकार के इस कदम से 72.22 लाख श्रमिकों को होगा फायदा।
3.67 लाख कंपनियों को होगा फायदा।
सरकार को करने होंगे 2,500 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च।
नियोक्ता के भाग को भी सरकार देगी, इससे उन्हें अपने श्रमिकों को जोड़े रखने में मिलेगी मदद।
इन्हें मिली रियायतें
नॉन बैंकिंग वित्तीय कंपनियों को कई तरह की रियायतें मिलीं ताकि बढ़े निवेशकों का भरोसा।
बिजली क्षेत्र के लिए 90,000 करोड़ रुपये की सहायता का प्रावधान।
रियल एस्टेट क्षेत्र को अपनी ‘रेरा’ पंजीकृत परियोजनाओं को पूरा करने के लिए मिला छह माह का अतिरिक्त समय।
 
 
 
छोटे उद्योगों को बड़ी राहत

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एमएसएमई के लिए तीन लाख करोड़ रुपये का बिना गारंटी का ऋण, 45 लाख सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग को मिलेगा लाभ
संकटग्रस्त एमएसएमई के लिए 20,000 करोड़ रुपये की व्यवस्था
चीन से टक्कर लेने को लाभ में चलने वाले और बड़ा आकार पाने वाले एमएसएमई के लिए 50,000 करोड़ रुपये का प्रावधान
लघु उद्योग क्षेत्र के लाभ के लिए एमएसएमई की परिभाषा में बदलाव ताकि लघु उद्योग को न उठाना पड़े कर अदायगी में घाटा
उत्पादन और सेवा क्षेत्र के उद्यमों के लिए एक समान हुए नियम
 
 
श्रमिकों का बढ़ेगा मान
 
अभी देश में दो तरह के प्रवासी श्रमिक हैं। एक आकलन के अनुसार देश में करीब 30 करोड़ प्रवासी श्रमिक हैं। इनमें से करीब 3.3 करोड़ श्रमिक दूसरे राज्यों में जाकर काम करते हैं। इस श्रेणी के श्रमिक अमूमन लौटकर अपने गांव नहीं जाते और जहां काम करते हैं धीरे-धीरे वहीं बस जाते हैं। जबकि बहुसंख्य श्रमिक अपने राज्य में ही दूसरी जगह काम करते हैं और वे अपने निवास लौट जाते हैं। सरकार की नई योजना में इस चलन का खास ध्यान रखा गया है जिससे, स्थानीय आधार पर ही अधिकांश को रोजी मिल सके। सरकार ने कुटीर, लघु, सूक्ष्म और मध्यम क्षेत्र के उद्योग के लिए जिस तरह की पैकेज की घोषणा की है उसके लागू होते ही देश में कारोबार और रोजगार का पूरा परिदृश्य बदल जाएगा। देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए छोटे उद्योगों के लिए न सिर्फ तीन लाख करोड़ रुपये के बड़े फंड की व्यवस्था की गई है, बल्कि इस क्षेत्र के संरक्षण की भी
व्यवस्था है।
 
गांव के कुटीर उद्योग से लेकर मझोले उद्योग तक, बिना कोई चीनज गिरवी रखे, वे कर्ज ले सकेंगे। कर्ज चार साल के लिए होगा और इसमें पहले साल अदायगी से छूट है। सरकारी खरीद में 200 करोड़ रुपये तक की निविदा में विदेशी फर्मों को प्रतिबंधित कर दिया है। इससे एमएसएमई सेक्टर को संबल मिलेगा। केस के हिसाब से अगर किसी कंपनी का प्रोजेक्ट सरकार को अच्छा लगता है तो उसे और भी अधिक मदद मिलेगी। सरकार छोटे उद्योग को बड़ा बनाने का काम भी करेगी। इन सभी का नतीजा होगा देश के सभी भूभाग में नौकरी के अवसरों का बनना। सैन्य और अन्य बलों के कैंटीन में अब 1 जून से विदेशी माल नहीं मिलेंगे। वहां सिर्फ घरेलू उत्पाद की बिक्री होगी। सरकार के ये सारे कदम देश को स्वावलंबन की ओर ले जाएंगे। छोटे उद्योगों की सहायता के लिए ईपीएफ अंशदान में भी राहत की अवधि बढ़ा दी गई है।
 
इस तरह से कोरोना का प्रकोप समूची दुनिया का नजरिया बदल रहा है। भारत का लक्ष्य आत्मनिर्भर होना है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह भी साफ किया कि आत्मनिर्भर होने का मतलब खुद को दुनिया से काटना नहीं है। उदाहरण में उन्होंने बताया कि कोरोना से पहले हम पीपीई किट बनाते ही नहीं थे। एन 95 मास्क का उत्पादन भी बहुत कम था। लेकिन जैसे ही इसकी जरूरत लगी प्रतिदिन दो लाख पीपीई किट और मास्क बनने लगे हैं। मास्क भी प्रचुर मात्रा में बना लिया। दवा भी हमारे पास इतनी है कि हम इसका निर्यात कर सकें। आत्मनिर्भरता के साथ दुनिया के लिए मदद के लिए तैयार रहना हमारी परंपरा रही है।
(लेखक वरिष्ठ अर्थ विश्लेषक हैं)