पश्चिम बंगाल: स्कूलों की किताबों में भगवान राम को बताया जा रहा है आक्रमणकारी

    दिनांक 19-मई-2020   
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पश्चिमी बंगाल में कक्षा छह की इतिहास की पुस्तक में भगवान श्रीराम को लेकर न केवल गलत तथ्यों को पढ़ाया जा रहा है बल्कि बाल मनों में जहर भरा जा रहा है

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इतिहास की पुस्तक का कवर पेज
 
पश्चिम बंगाल में अबोध बालकों को न केवल गलत चीजें पढ़ाई जा रही हैं बल्कि उनके बाल मन में भारत के इतिहास के प्रति हीन भावना भरी जा रही है। दरअसल पिछले दिनों सोशल मीडिया पर बांग्ला भाषा की पाठ्य पुस्तक का एक पेज वायरल हो रहा था। इस पेज में भगवान श्रीराम के बारे में गलत तथ्य दिए जा रहे थे। हमने इस बारे में जब खोजबीन करनी शुरू की तो पाया कि राज्य सरकार के “मध्य शिक्षा परिषद्” यानी बंगाल सेकेण्डरी एजुकेशन बोर्ड जो 5 से 10 कक्षा तक की पाठ्य पुस्तक, पाठ्यक्रम का निर्माण व परीक्षाओं का आयोजन करता है, उसी बोर्ड की कक्षा 6 की इतिहास की पाठ्य पुस्तक में पिछले कई वर्षों से झूठा और बाल मनों में जहर भरने वाला इतिहास पढ़ाया जा रहा है। इस पुस्तक में जहां रामायण के काल को नाकारा गया है वहीं यह भी लिखा है कि राम भारत के मूलनिवासी नहीं थे। वे एक घुमंतू कबिले के सरदार थे। राम शब्द रोमिंग शब्द से आया। भगवान श्रीराम के बारे में यह पुस्तक उन्हें आक्रमणकारी तक बताने से नहीं चूकती। साथ ही रावण को व उसके मित्रों को असुर तो कहा गया लेकिन उन्हें भद्र पुरुष बताया गया। सबसे बड़ी बात यह है कि इस पुस्तक का संपादक शरीन मसूद है। यह वही कटृटरपंथी मसूद जिसने क्रांतिकारी खुदीराम बोस को आतंकवादी तक कहा था।
पुस्तक या झूठ का पुलिंदा

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भगवान श्री राम को आक्रमणकारी बताते हुए यह किताब रावण को भद्र पुरुष बताती है 
 
पुस्तक में अथर्व वेद के बारे में लिखा गया है कि यह कुछ नहीं बल्कि जादू के मन्त्रों का एक संग्रह है। इसी तरह से झूठ का पहाड़ खड़ा करते हुए पुस्तक का संपादक एक स्थान पर बताता है कि वैदिक काल में गाय का मांस खाया जाता था। इतना ही नहीं पुस्तक में लिखा गया है कि आजकल ब्राह्मण लोग जिस गोत्र की बात करते हैं, असल में गोत्र वह है जहां पर गाय को रखा जाता था। कालांतर में पूर्वजों ने इसे ही इतिहास को हथियार बना लिया और फिर भारत में जाति व्यवस्था को जन्म दिया। पुस्तक में रामायण व महाभारत काल के बारे में अनेक झूठ और दिग्भ्रमित करने वाले तथ्यों को पढ़ाया जा रहा है।
एक सोची समझी साजिश

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वैदिक समय में गाय का मांस खाने की इजाजत थी 
दरअसल यह पहली बार नहीं है जब पाठ्यक्रम में इस तरह की गलत और झूठी बातें लिखी गई हैं। इससे पहले भी देश की अलग-अलग राज्य सरकारों में इसी तरह से देश के महापुरुषों, स्वतंत्रता सेनानियों, देवी—देवताओं और इतिहास के अनेक प्रसंगों की न केवल गलत व्याख्या की
गई बल्कि झूठे और भ्रामक तथ्यों को पाठकों के सामने रखा गया है। दरअसल इस तरह के कुकृत्य के पीछे बड़ी साजिश काम कर रही होती है। यह भारत तोड़ो शक्तियों का एक बड़ा हथियार होता है, जिसे आसानी से वह बोलने और लिखने की स्वतंत्रता के नाम पर लेख या पाठ्य पुस्तकों में डाल देते हैं और इसके माध्यम से अपनी साजिश को अंजाम तक पहुंचाते हैं। जब छोटे—छोटे बच्चे इस तरह की सामग्री पढ़ते हैं तो बाल मन पर बहुत गलत असर पड़ता है और वह झूठी सामग्री उन्हें सच से दूर कर देती है। यकीनन जिस चीज को वह बचपन में पढ़ते हैं, फिर उसी पर आगे बढ़ते है।
वामंपथियों ने बोया है जहर

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 अथर्व वेद के बारे में लिखा गया है कि यह कुछ नहीं बल्कि जादू के मन्त्रों का एक संग्रह है
 
दरअसल पश्चिम बंगाल में 34 साल तक वामपंथियों का शासन रहा। इस दौरान वामपंथियों ने अपना एजेंडा चलाया और झूठे तथ्यों और कहानियों को गढ़कर भारत-विरोध और हिन्दू विरोध को हवा दी। इन वामपंथियों ने इस तरह के साहित्य के माध्यम से पिछली कई पीढ़ियों में जहर घोलने का काम किया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि समय—समय पर भारत में वर्ग संघर्ष की स्थिति दिखाई देती है। यही अराजक ताकतों का उदृदेश्य है।
बहरहाल, राज्य में भले ही 2011 में वामपंथियों की सत्ता चली गई हो और ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल की सरकार सत्ता में है, लेकिन ढांचा अभी भी सीपीएम का ही है। एक तरफ जहां सीपीएम ने इस तरह के साहित्य के माध्यम से भारत की नकरात्मक छवि बनाई तो वहीं राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुस्लिम तुष्टिकरण नीति को आगे बढ़ाते हुए इस तरह के साहित्य को जारी रखा है। उन्होंने इस पर प्रतिबंध लगाना तो दूर की बात बल्कि और ज्यादा जहर घोला है ताकि मुस्लिम खुश रहें। गौरतलब है कि मुस्लिम समुदाय ममता का एकमुश्त वोटबैंक है और कुल जनसंख्या का 35 प्रतिशत है। इसलिए वह कोई भी मौका नहीं चूकती जिससे मुसलमानों और कटृटरपंथियों को खुश न किया जा सके।