शिक्षा द्वारा समाज परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होता है: बाबासाहेब

    दिनांक 02-मई-2020
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हम लगातार आपको बाबासाहेब के जीवन से जुड़े कुछ अनछुए प्रसंगों को बताने का प्रयास कर रहे हैं। आगे भी यह प्रयास जारी रहेगा। ये प्रसंग “डॉ. बाबासाहब आंबेडकर राइटिंग्स एंड स्पीचेज”, “पाकिस्तान ऑर पार्टीशन ऑफ इंडिया”, “द सेलेक्टेड वर्क्स ऑफ़ डॉ. बी. आर. आंबेडकर”, “द डिक्लाइन एंड फॉल ऑफ़ बुद्धिज़्म” आदि पुस्तकों से लिए गए हैं. बाबासाहेब को जानें भाग 26 :-

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डॉ. आंबेडकर ने अपनी शिक्षा विषयक नीति क्रमबद्ध रूप से ग्रंथित नहीं की है। इस संदर्भ में उनके विचार अलग-अलग माध्यमों द्वारा व्यक्त हुए हैं। उनके संपादित किए नियतकालिक (पीरियॉडिकल), स्थापित की हुई सामाजिक और शिक्षा संस्थाओं के ध्येय और नीतियां, इनके माध्यम से वे व्यक्त हुए हैं। उन्होंने अन्यान्य शासकीय समितियों, आयोग, उनके सामने दिए साक्ष्य, प्रस्तुत किये पत्र-प्रपत्र इनके माध्यम से भी शिक्षा नीति का ऊहापोह उजागर किया। विविध परिषदों में, सम्मेलनों में, महाविद्यालयों तथा शिक्षण संस्थाओं में किए भाषणों द्वारा भी उनके विचार प्रस्तुत हुए हैं। बंबई विद्यापीठ सीनेट, शिक्षण संस्थाओं में किए भाषणों द्वारा भी उनके विचार प्रस्तुत हुए हैं। उन्होंने वैधानिक क्षेत्र अर्थात् बंबई विद्यापीठ सीनेट, बंबई विधिमंडल, महाराज्यपाल की मंत्रि परिषद, संविधान सभा, लोकसभा आदि में हुई चर्चाओं के जरिए अध्ययनपूर्वक सहभागी होते शिक्षा नीति के अनेक मुद्दे विशद किए हैं। उनके विस्तृत चिंतन में शिक्षा क्षेत्र की सामाजिक विषमताएं, उस पर उपाय, साक्षरता प्रसार और विकास की आवश्यकता, प्राथमिक शिक्षा, उच्च शिक्षा और संशोधन, व्यवसाय प्रशिक्षण, तंत्र शिक्षा जैसे विषय विविध स्तरों के संदर्भ में दिखाई देते हैं। यहां हम उनके व्यापक चिंतन में से कुछ विशेष मुद्दों का विचार कर रहे हैं।
1. केन्द्रीय सत्ता की परिकल्पित की हुई एकसूत्री राष्ट्रीय नीति से ही शिक्षा की समस्या- यह खंड खंड करके सुलझाने वाला प्रश्न नहीं है, बल्कि यह प्रश्न एकसूत्री नीति से ही सुलझ सकता है, क्योंकि शिक्षा एक निरंतर चलने वाली प्रदीर्घ प्रक्रिया है। वे कहते हैं कि शिक्षा क्षेत्र को सच्चे अर्थों में स्वतंत्र और स्वाधीन होना चाहिए, उस पर व्यक्ति की सत्ता होना धोखादायक है। शिक्षा की जिम्मेदारी स्थानिक स्वराज्य संस्थाओं के पास नहीं होनी चाहिए। यह मुद्दा स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं, शिक्षा की बात गटर साफ करने जैसी बातों से भिन्न है, यहां कारोबार उपयुक्त नहीं। इस प्रकार की चेतावनी भी वे देते हैं।
साक्षरता प्रसार और विकास तथा सार्वत्रिक शिक्षा के उद्देश्य पर बल देते हुए बाबासाहेब कहते हैं कि एक बार एक बच्चे ने प्राथमिक शाला में प्रवेश ले लिया, तो वह साक्षर हो गया ऐसा नहीं है। जब तक उसमें जीवनभर साक्षर रहने की क्षमता विकसित नहीं होती, तब तक वह प्राथमिक शाला या साक्षरता वर्ग न छोड़े। उनकी दृष्टि में शिक्षा अन्न के समान है, उसकी आवश्यकता जीवनभर होती है। उनका दृढ़ मत था कि इस संदर्भ में पूरी जिम्मेदारी शासन को ही उठानी होगी।
शिक्षा क्षेत्र में सामाजिक विषमता के बारे में बाबासाहेब का मत अत्यंत स्पष्ट है। सन् 1927 में बंबई विधिमंडल में दिए भाषण में उन्होंने प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा में विषमता की जो सांख्यिकी प्रस्तुत की, वह अत्यंत चिंताजनक है। उसके निष्कर्ष चौंकानेवाले हैं- समूचे हिन्दू समाज में निरक्षरता 82.5 प्रतिशत है, वहीं पिछड़े समाज में 98 प्रतिशत। माध्यमिक और उच्च शिक्षा के स्तर पर पिछड़े वर्ग की अवस्था अत्यंत दयनीय है। शैक्षिक विषमता की जड़ सही मायने में सामाजिक और आर्थिक विषमता में है।
इसका उपाय बताते हुए वे कहते हैं कि असमान बर्ताव तत्व को स्वीकार कर कुछ वर्गों को विशेष सहूलियतें देने की आवश्यकता है। जो निम्नस्तरीय हैं, उन्हें विशेष दर्जा और सहूलियत देने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है। इस सूत्र को अधिक स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं, ‘केवल छात्रवृत्ति देकर पिछड़े वर्ग की समस्या सुलझ नहीं पाएगी। छात्रावास, अभ्यासगृह, बालवाडी, संस्कार केन्द्र आदि की योजना करके उनके लिए उचित, प्रेरणादायी सामाजिक वातावरण का निर्माण करना आवश्यक है। आगे चलकर भारतीय संविधान में शामिल हुई आरक्षण विषयक नीति के बीज उनके इस भाषण में मिलते हैं।
समाज परिवर्तन एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। शिक्षा द्वारा समाज परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त होता है। बाबासाहेब कहते हैं कि परिवर्तन की इस प्रक्रिया को गति देने के लिए समाज मानस में परिवर्तनवादी विचार दृढ़ होना आवश्यक है। व्यापक एवं सार्वत्रिक शिक्षा द्वारा ये विचार समाज में दृढ़ बन सकते हैं। शिक्षा का सामाजिक आशय कभी भी आंख से ओझल नहीं होना चाहिए। शिक्षा की संकल्पना के अंतर्गत ‘पढ़ो और पढ़ाओ’ की प्रक्रिया अभिप्रेत होती हैं। उसी से समाज की प्रगति संभव होती है। शिक्षा के बिना किसी समाज में संवेदनशीलता प्रतीति या सजगता निर्मित नहीं होगी तथा बिना जागृति के समाज की उन्नति भी नहीं होती। शिक्षा का आशय खासकर ऐहिक होना चाहिए। समाज में जो-जो विषमताएं है, वे शिक्षा के माध्यम से दूर हों, ऐसी व्यावहारिक अपेक्षाएं वे व्यक्त करते हैं। वे एक आदर्शवादी विचार भी सामने रखते हैं कि शिक्षा किसी के व्यक्तित्व में सनी हुई सुप्त शक्तियों को मुक्त करती है और मनुष्य को पशुता से मनुष्यत्व की ओर ले जाती है। वे यह कहने से भी चूकते कि शिक्षा का हेतु व्यक्ति का सामजिकीकरण और नैतिकीकरण करना है, क्योंकि सभ्यता और संस्कृति की बुनियाद शिक्षा ही है।
बाबासाहेब की अभिप्रेत ज्ञान की संकल्पना बड़ी ही व्यापक और आदर्शमय है। वे कहते हैं कि विद्या, प्रज्ञा, करुणा, शील और मित्रता, इन पंचतत्वों के अनुसार प्रत्येक को अपना चरित्र निर्माण करना चाहिए। विद्या के साथ शील भी चाहिए, शील के बिना विद्या व्यर्थ है। विद्या तलवार के समान है इसीलिए जो उसे धारण करे, उस पर उसकी महत्ता अवलंबित है। बुद्धि और चतुराई को सदाचार अर्थात् शील का साथ मिलना चाहिए। बगैर शील के अगर शिक्षित लोग निर्मित होने लगेंगे, तो उनकी शिक्षा से राष्ट्र और समाज का नाश होगा। ज्ञान और प्रज्ञा का सुचारु मेल माने शिक्षा। ऐसी शिक्षा मनुष्य का निर्माण करती है। व्यक्ति को स्वत्व की प्रतीति कराना शिक्षा का कार्य है। शिक्षा मूल्याधिष्ठित माने व्यक्ति में नैतिक आचरण निर्माण करने वाली है। ऐसे शिक्षाविषयक सूत्र उन्होंने हमारे सामने रखे हैं।