केजरीवाल जी सिर्फ प्रचार न करो कोटा में फंसे छात्रों की भी सुध ले लो ...

    दिनांक 02-मई-2020   
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कहते हैं काम दिखता है, लेकिन केजरीवाल सरकार के सिर्फ विज्ञापन दिखते हैं। केजरीवाल सरकार ने राजस्थान के कोटा से छात्रों को वापस लाने की घोषणा क्या की, उनकी सोशल मीडिया टीम प्रचार में जुट गई। #KejriwalHelpKota जैसे हैशटैग चलाए जाने लगे

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल धरातल पर भले कुछ न करें, लेकिन मीडिया में उनका काम जमकर बोलता है। ताजा उदाहरण राजस्थान के एजुकेशनल हब कोटा शहर से इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी करने पहुंचे छात्रों की घर वापसी का है। लॉकडाउन-1 लागू होते समय कोटा शहर में करीब-करीब सभी राज्यों के डेढ़ लाख से ज्यादा बच्चे फंस गए थे। तब परिजनों को उम्मीद थी कि 21 दिन बाद लॉकडाउन खुलने पर बच्चे घर आ जाएंगे, लेकिन जब सरकार ने लॉकडाउन-2 लागू किया तो बच्चों के साथ परिजनों की बेचैनी बढ़ गई, अब फिर से दो सप्ताह के लिए लॉकडाउन बढ़ा दिया गया है। ऐसे में बच्चों और उनके परिजनों का चिंतित होना लाजमी है।
बच्चों और परिजनों की परेशानी को सर्वप्रथम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समझा। उन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के साथ बातचीत करके उत्तर प्रदेश के छात्रों को निकालने पर रजामंदी बनाई। उस समय इस बात का विरोध भी हुआ, लेकिन उत्तर प्रदेश ने 300 से ज्यादा बसों को लगाकर अपने 11 हजार बच्चे सकुशल घरों तक पहुंचाए। जब यह सबकुछ हो रहा था, तब अरविंद केजरीवाल मौन धारण किए हुए थे, जबकि दिल्ली से कोटा मात्र 8 घंटे की दूरी है।
उत्तर प्रदेश की दिखाई राह के बाद तो मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड, पंजाब, चंडीगढ़, असम, छत्तीसगढ़, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, दमन-दीव और दादर नागर हवेली अपने बच्चों को कोटा से निकाल चुके हैं। अब तक इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के 23 हजार से ज्यादा बच्चे घर पहुंच चुके हैं। कमाल की बात यह है कि इनमें से किसी राज्य के मुख्यमंत्रियों ने बच्चों को निकालने का ऐसा ढिंढोरा नहीं पीटा, जैसा अरविंद केजरीवाल पिट रहे हैं। हाल में अरविंद केजरीवाल सरकार ने भी दिल्ली के बच्चों को कोटा से निकालने का निर्णय लिया तो उनकी सोशल मीडिया टीम प्रचार में जुट गई। #KejriwalHelpKota जैसे हैशटैग चलाए जाने लगे। आम आदमी पार्टी का पूरा प्रचार तंत्र चीजों को यूं पेश कर रहा है, मानों दिल्ली की सरकार ने सर्वप्रथम ऐसा काम किया है।
लॉकडाउन-1 की शुरुआत से अरविंद केजरीवाल सरकार की नाकाबिलियत साफ झलकने लगी थी। सबसे पहले निजामुद्दीन मरकज में तब्लीगी जमात को लेकर केजरीवाल सरकार की पोल खुली। आज तब्दीगी जमात के कारण देश के कई राज्यों में सैकड़ों चीनी वायरस (कोरोना) के केस हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश के प्रवासी श्रमिकों के साथ अरविंद केजरीवाल सरकार का दुर्व्यवहार खुलकर सामने आया। किस तरह उन्होंने श्रमिकों की बिजली-पानी काटे। राशन न मिलने का डर दिखाया। डराने वाले संदेश कराए। पूरा षड़्यंत्र रचकर डीटीसी बसों से श्रमिकों को उत्तर प्रदेश-दिल्ली सीमा पर छुड़वा दिया। उस समय लाखों श्रमिकों की भीड़ देखकर पूरा देश स्तब्ध रह गया था। तब भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 3000 से ज्यादा बसों को लगाकर श्रमिकों को घरों तक पहुंचाया था। हद तो यह थी कि मीडिया के एक बड़े वर्ग ने तब अरविंद केजरीवाल से सवाल पूछने के बजाय योगी सरकार को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश की थी। लाखों गरीबों को फ्री राशन उपलब्ध कराने के उनके दावों को पोल कई बार खुल चुकी है।
दरअसल, आई.आर.एस अधिकारी से एक्टिविस्ट और फिर नेता बने अरविंद केजरीवाल ने मीडिया की विज्ञापन वाली नस को अच्छी तरह पकड़ा हुआ है। जब से वो दिल्ली के मुख्यमंत्री बने हैं, विज्ञापनों पर करोड़ों रुपए खर्च कर रहे हैं। 2019 के एक आरटीआई से विज्ञापनों पर खर्च के जो आंकड़े आए थे, वो चौंकाने वाले थे। आरटीआई के जवाब में बताया गया था कि 2015 से 2019 तक अरविंद केजरीवाल सरकार ने 311.78 करोड़ रुपए खर्च किए, जो पूर्ववर्ती शीला दीक्षित सरकार से चार गुना अधिक है। तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने के बाद भी केजरीवाल की विज्ञापन नीति बदस्तूर जारी है।
जब आप दिल्ली की सड़कों को घूमेंगे तो आपको करीब-करीब हर जगह केजरीवाल सरकार के संस्तुति गान करते विज्ञापन मिल जाएंगे। न्यूज चैनलों और एफ.एम रेडियो पर उनके विज्ञापनों का अंबार लगा हुआ है। आप को दिल्ली के अखबारों में दिल्ली सरकार के विज्ञापनों की भरमार मिलेगी। अपने पिछले कार्यकाल में तो उन्होंने दिल्ली ही नहीं केरल, राजस्थान, पंजाब समेत लगभग सभी राज्यों के अखबारों में फुल-फुल पेज के विज्ञापन दिए थे। आज भी यह खेल जारी है। भले अरविंद केजरीवाल तीसरी बार मुख्यमंत्री बन गए हैं, लेकिन उनके चेहरे से नकाब उठ चुका है।